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रविश सिद्दीक़ी: वो शायर जिसने कश्मीर की वादियों को ग़ज़ल में पिरोया

कुछ शायर अपने लफ़्ज़ों में सिर्फ़ महबूब की तस्वीर नहीं उतारते, वो पूरी सरज़मीन को अपनी शायरी में बसा लेते हैं। रविश सिद्दीक़ी एक ऐसे ही शायर थे, जिन्होंने रूमानियत और वतनपरस्ती को इस ख़ूबसूरती से जोड़ा कि उनकी ग़ज़लें आज भी उर्दू अदब में अपना एक ख़ास मक़ाम रखती हैं।

ज्वालापुर की गलियों से शुरू हुआ सफ़र

रविश सिद्दीक़ी का असल नाम शाहिद अज़ीज़ था। उनकी पैदाइश 11 जुलाई 1911 को ज्वालापुर, ज़िला सहारनपुर (उस वक़्त के यूनाइटेड प्रोविंसेज़ ऑफ़ आगरा एंड अवध, आज का उत्तर प्रदेश) में हुई। उनके वालिद मौलवी तुफ़ैल अहमद ख़ुद भी शायर थे यानी शायरी उन्हें घुट्टी में ही मिली। घर के तालीमी और मज़हबी माहौल में परवरिश पाते हुए उन्होंने अरबी-फ़ारसी की तालीम हासिल की, और बाद में हिंदी व संस्कृत से भी वाक़फ़ियत हासिल की।

सख़्त जान-लेवा है सादगी मोहब्बत की
         ज़हर की कसौटी पर ज़िंदगी को कसती है

दिलचस्प बात ये है कि रविश सिद्दीक़ी एक ख़ुद-आमोज़ (self-educated) शख़्सियत थे उन्होंने किसी बाक़ायदा दरसगाह के बग़ैर उर्दू, अरबी, फ़ारसी, हिंदी, संस्कृत और अंग्रेज़ी। इन छह ज़बानों पर महारत हासिल कर ली। उनके कलाम में जो तसव्वुफ़ (सूफ़ी फ़िक्र) और वेदांत का असर नज़र आता है, वो दरअसल इसी वसीअ मुताला का नतीजा है। 

तक़सीम का दर्द और नया आग़ाज़

रविश तक़सीम-ए-हिंद तक ज्वालापुर में ही मुक़ीम रहे। मगर आज़ादी के साथ आई फ़िरक़ावाराना आग की लपटों ने ज्वालापुर को भी अपनी चपेट में ले लिया, और रविश को अपना घर छोड़कर मुरादाबाद का रुख़ करना पड़ा। 1955 में वो मुरादाबाद से दिल्ली आ गए, जहां उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) में मुलाज़मत इख़्तियार की।

आकाशवाणी का वो सुनहरा दौर

रविश सिद्दीक़ी ने जिस दौर में ऑल इंडिया रेडियो जॉइन किया, उस वक़्त वहां प्रेम नाथ डार, साग़र निज़ामी और सलाम मछलीशहरी जैसे नामचीन अदीब भी काम कर रहे थे यानी रेडियो का वो दफ़्तर उस दौर की उर्दू अदबी दुनिया का एक छोटा-सा मरकज़ बन गया था। रविश मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के भी क़रीबी दोस्तों में शुमार होते थे। 1959 में उन्होंने बेल्जियम में मुनाक़िद एक अदबी कान्फ़्रेंस में हिंदुस्तान की नुमाइंदगी भी की। एक ऐसा एज़ाज़ जो उस दौर के चंद ही शायरों को नसीब हुआ।

शायरी का रंग: रूमानियत से वतनपरस्ती तक

रविश की शायरी कई रंगों का हसीन इमतिज़ाज (मिश्रण) है। उन्होंने अख़्तर शीरानी के अंदाज़ में रूमानी नज़्में भी कहीं, तो दूसरी तरफ़ मुल्क और सियासत से जुड़े मसाइल को भी अपनी शायरी का मौज़ू बनाया। महात्मा गांधी पर लिखी उनकी नज़्म उस दौर की सबसे मक़बूल नज़्मों में शुमार होती है  शायद किसी और शायर की गांधी पर लिखी नज़्म को इतनी शोहरत नहीं मिली।

उर्दू जिसे कहते हैं तहज़ीब का चश्मा है
वो शख़्स मोहज़्ज़ब है जिस को ये ज़बां आ

मगर रविश की शायरी में सबसे ज़्यादा शोहरत उन नज़्मों को मिली, जो उन्होंने कश्मीर की वादियों की ख़ूबसूरती और वहां के लोगों पर लिखीं। इन्हीं नज़्मों का मजमुआ “ख़्यबान ख़्यबान” 1970 के दशक के आख़िर में शाया हुआ। उनकी ग़ज़लों का मजमुआ “महराब-ए-ग़ज़ल” 1956 में मंज़र-ए-आम पर आया और अपने वक़्त में बेहद मक़बूल हुआ।

रविश सिद्दीक़ी का इंतक़ाल 24 जनवरी 1971 को शाहजहांपुर में हुआ। उस वक़्त उनकी उम्र तक़रीबन साठ बरस थी। उनके पीछे उनकी वो शायरी रह गई, जो आज भी रूमानियत और वतनपरस्ती के दरमियान एक नाज़ुक पुल की तरह क़ायम है।

ये भी पढ़ें: सत्यपाल आनंद: चार ज़बानों में अपनी रूह की आवाज़ लिखने वाला शख़्स  

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