आगरा से बस 37 किलोमीटर दूर, उत्तर प्रदेश के पश्चिमी छोर पर बसा है फ़िरोज़ाबाद जो भारत का अपना ‘मुरानो’ है। ये छोटा-सा शहर दुनिया भर में अपनी कांच की चूड़ियों और बारीक कारीगरी के लिए (Firozabad: The City of Bangles) जाना जाता है। यहां की मिट्टी में वो बात है जो पीढ़ियों से चली आ रही कांच बनाने की हुनर को ज़िंदा रखे हुए है। फ़िरोज़ाबाद को ‘सिटी ऑफ ग्लास’ कहा जाए तो कोई हैरानी नहीं। यहां के कारीगर, जिन्हें ‘कांचकर’ कहा जाता है, कांच को गला-कर, खींच-कर, तराश-कर ऐसी चीज़ें बनाते हैं जो दिलों को छू लेती हैं।
अकबर के ज़माने में फ़िरोज़ाबाद में कांच की भट्टियां जलने लगीं
इस शहर की कहानी मुगल दौर से शुरू होती है। कहा जाता है कि 16वीं सदी में अकबर के ज़माने में यहां कांच की भट्टियां जलने लगीं। फारस और मध्य एशिया से आए कारीगरों ने यहां की मिट्टी और हुनर को पहचाना। बाद में शाहजहां की बेगम मुमताज़ ने भी इन कारीगरों को सरपरस्ती दी। अंग्रेज़ों के राज में इस उद्योग ने कारखानों का रूप ले लिया। रुस्तम उस्ताद जैसे कारीगरों ने मुंबई जाकर नई तकनीकें सीखीं और यहां लौटकर चूड़ी बनाने के ढंग ही बदल दिए। लकड़ी के बेलन की जगह लोहे का बेलन आया, रंगों की नई फ़िराक़ आई, और फ़िरोज़ाबाद (Firozabad) की चूड़ियों की चमक दूर-दूर तक फैलने लगी।

आजादी के बाद ये उद्योग कुछ थम-सा गया, लेकिन 20वीं सदी के आख़िरी दशकों में फिर रफ़्तार पकड़ी। आज यहां की हज़ारों छोटी-बड़ी इकाइयां देश के कांच उत्पादन का बड़ा हिस्सा अंजाम देती हैं। चूड़ियों के अलावा यहां शीशे के जार, कैंडल स्टैंड, फूलदान, झूमर और जानवरों की मूरतें बनती हैं। ब्लोइंग, मोल्डिंग, एचिंग, कटिंग, पॉलिशिंग और पेंटिंग जैसे हुनर यहां के कारीगरों की पहचान हैं।
फ़िरोज़ाबाद का कांच उद्योग कई मुश्किलों से जूझा
लेकिन हर चमक के पीछे एक साया भी होता है। पिछले कुछ सालों से फ़िरोज़ाबाद का कांच उद्योग कई मुश्किलों से जूझ रहा है। 1996 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने प्राकृतिक गैस के इस्तेमाल को ज़रूरी बना दिया, जिससे लागत कई गुना बढ़ गई। नोटबंदी, जीएसटी और महामारी ने भी कारोबार को हिला दिया। गैस की आपूर्ति में आई कमी ने तो कई भट्टियों को ठंडा कर दिया। कहा जाता है कि शहर की 120 चूड़ी इकाइयों में से आधे से भी कम चल पा रही हैं। कारीगरों का पलायन एक बड़ी चिंता बन गया है।

‘एक जनपद, एक उत्पाद’
इन मुश्किलों के बीच सरकार ने भी हाथ बढ़ाया है। उत्तर प्रदेश की ‘एक जनपद, एक उत्पाद’ यानी ODOP योजना के तहत फ़िरोज़ाबाद के कांच को ख़ास पहचान दी गई। इस योजना के तहत हज़ारों कारीगरों को ट्रेनिंग, मार्जिन मनी और मार्केटिंग सपोर्ट मिला है। कौशल विकास योजनाओं के ज़रिए भी कारीगरों को नए हुनर सिखाए जा रहे हैं ताकि वे बदलते वक़्त के साथ क़दम मिला सकें। सुप्रीम कोर्ट से भी उद्योगियों को बड़ी राहत मिली है, जिससे नई इकाइयां लगाने और पुरानी को शिफ्ट करने का रास्ता खुला है।

फ़िरोज़ाबाद की असली ताक़त उसके कारीगर हैं। यह वो लोग हैं जो आग की तपिश में खड़े होकर, पिघले शीशे से धागे जैसी पतली चूड़ियां खींचते हैं। सुहागनगंज, कोटला रोड, जैन नगर के बाज़ारों में रंग-बिरंगी चूड़ियों की ढेरियां आज भी हर आने-जाने वाले का ध्यान खींच लेती हैं। जैन ग्लास एंड हैंडिक्राफ्ट, फिरोजाबाद ग्लास एम्पोरियम या एंटीक ग्लास बाज़ार जैसी जगहें सैलानियों को यहां की कारीगरी से रूबरू कराती हैं।
फ़िरोज़ाबाद सिर्फ़ एक शहर नहीं, एक सदी पुरानी विरासत है। यहां की हर चूड़ी में एक कहानी बसी है। किसी उस्ताद की मेहनत, किसी परिवार की परंपरा, और किसी औरत के सपनों की। अगर ये उद्योग ज़िंदा रहा, तो यह शहर भी ज़िंदा रहेगा। और उसकी रोशनी सिर्फ़ भारत में नहीं, दुनिया के सौ से ज़्यादा देशों में फैलेगी
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