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ग़व्वासी: वो शायर जिसने फ़ारसी क़िस्सों को आम ज़बान में ढाल दिया 

“चुन उस गोहरां के समन्द का गम्भीर, है ग़वास इस दौर में बेनज़ीर”

क्या कोई शायर ख़ुद को अपने दौर में बेमिसाल कहने की हिम्मत रखता है? दक्कन के शायर ग़व्वासी ने यह दावा किया, और उनके कलाम ने इसे सच भी कर दिखाया। गोलकुंडा के रहने वाले ग़व्वासी क़ुतुब शाही दरबार के मशहूर शायर थे। सुल्तान अब्दुल्लाह क़ुतुब शाह के दौर में उन्हें इतना भरोसा मिला कि सुल्तान ने उन्हें अपना सफ़ीर बनाकर बीजापुर भेजा। फ़ारसी क़िस्सों को आसान दक्कनी ज़बान में ढालकर उन्होंने उर्दू अदब की शुरुआती तारीख़ को रौशन किया।

ग़व्वासी की असल पहचान उनकी मसनवियां हैं। उनकी सबसे मशहूर मसनवी “सैफ़-उल-मुलूक और बदीउल-जमाल” है, जो फ़ारसी क़िस्से का दक्कनी में तर्जुमा है और 1035 हिजरी में मुकम्मल हुई। कहा जाता है कि इसे मुल्ला ग़व्वासी ने मुहम्मद क़ुली क़ुतुब शाह के ज़माने में शुरू किया था, पर इसकी क़द्र अब्दुल्लाह क़ुतुब शाह के दौर में ज़्यादा हुई। दूसरी अहम किताब “तूती नामा” है, जो ज़ियाउद्दीन नख़्शबी की फ़ारसी किताब का दक्कनी तर्जुमा है और 1049 हिजरी में पूरी हुई। तीसरी मसनवी “चंदा और लोख” (मीना व सतवंती) भी फ़ारसी से तर्जुमा है और उन्हीं की मानी जाती है, हालांकि इसकी निस्बत पर थोड़ी बहस है।

“तूती नामा” की बुनियादी कहानी एक सौदागर, उसकी बीवी और उसके पालतू तोते के गिर्द घूमती है। सौदागर जब सफ़र पर निकलता है तो उसकी बीवी किसी और से मिलने के लिए बेचैन हो जाती है। तोता हर रात उसे एक दिलचस्प कहानी सुनाता है और कहानी को ऐसे मोड़ पर छोड़ देता है कि बीवी अगली रात का इंतज़ार करने लगती है। इस तरह तोता चतुराई से उसे बहकने से रोके रखता है, और यही सिलसिला कई रातों तक चलता है। यह तरीक़ा वैसा ही है जैसा बाद में “अलिफ़ लैला” में शहरज़ाद की कहानियों में मिलता है।

इस मसनवी की अहमियत कई वजहों से है। पहली बात यह कि यह हिंदुस्तानी क़िस्सों की रिवायत को फ़ारसी के रास्ते दक्कनी तक लाती है, यानी संस्कृत, फ़ारसी और दक्कनी तीनों अदबी रिवायतें इसमें मिलती हैं। दूसरी बात यह कि इसकी ज़बान सादा और हिंदी लफ़्ज़ों से भरपूर है, जिससे उस दौर की दक्कनी का असली रूप सामने आता है। तीसरी बात यह कि यह तर्जुमे की उस शुरुआती रिवायत की मिसाल है, जिसने आगे चलकर उर्दू में दास्तान और क़िस्सागोई की बुनियाद मज़बूत की।

उनके अंदाज़-ए-बयां में दो अलग रंग नज़र आते हैं। “सैफ़-उल-मुलूक” में वे अपनी खुलकर तारीफ़ करते हैं और दूसरे शायरों पर तंज़ भी कसते हैं, मगर किसी का नाम नहीं लेते। उनका दावा है कि शायरी बस उन्हीं की है। इसके उलट “तूती नामा” में वे आजिज़ी से बात करते हैं और ख़ुद को “दुनिया-दार” कहकर अफ़सोस ज़ाहिर करते हैं। उनकी ज़बान सादा है, उसमें हिंदी के लफ़्ज़ बहुत हैं और कोई पेचीदगी नहीं, इसी वजह से उनका कलाम आम पाठक को भी आसानी से समझ आता है। नमूने के तौर पर वे ख़ुद को मोतियों के गहरे समंदर का ग़ोता-ख़ोर (ग़वास) कहते हैं और इस दौर में बेमिसाल बताते हैं।

उनकी किताबों के मख़तूते (पांडुलिपियां) आज भी महफ़ूज़ हैं। “सैफ़-उल-मुलूक” और “तूती नामा” के कई मख़तूते यूरोप के संग्रहालयों में, अंजुमन तरक़्क़ी-ए-उर्दू में और निज़ाम कॉलेज के आग़ा हैदर हुसैन के पास हैं। “चंदा और लोख” अब तक छपी नहीं है; इसके चार मख़तूते स्टेट लाइब्रेरी हैदराबाद में और चार सालार जंग लाइब्रेरी में हैं। उनकी कुल्लियात, जिसमें ग़ज़लें, क़सीदे और मरसिये शामिल हैं, इदारा-ए-अदबियात-ए-उर्दू ने छापी है और यह आसफ़िया लाइब्रेरी, हैदराबाद में भी मौजूद है।

वजही की तरह ग़व्वासी की वफ़ात की सही तारीख़ भी मालूम नहीं। आम राय यह है कि वे 1060 हिजरी से पहले, सुल्तान अब्दुल्लाह क़ुतुब शाह के दौर में ही गुज़र गए। कुछ विद्वान उन्हें “बहाउद्दीन” भी कहते हैं, मगर यह बात पक्की नहीं है। कुल मिलाकर, ग़व्वासी ने फ़ारसी क़िस्सों को आसान दक्कनी ज़बान में ढालकर आम लोगों तक पहुँचाया, और इसी वजह से वे दक्कनी अदब और उर्दू की शुरुआती तारीख़ में एक अहम नाम हैं।

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