उत्तराखंड की देवभूमि में एक ऐसी यात्रा है जो सिर्फ़ पैरों से नहीं, आस्था से पूरी होती है। नंदा देवी राजजात यात्रा (Nanda Devi Raj Jat Yatra) जिसे लोग हिमालय का महाकुंभ (Mahakumbh of the Himalayas) कहते हैं। हर बारह साल में एक बार होने वाली ये यात्रा करीब 280 किलोमीटर का सफ़र है, जिसे श्रद्धालु नंगे पांव तय करते हैं । लेकिन इस यात्रा की सबसे अनोखी बात है कि इसका अगुआ कोई इंसान नहीं, बल्कि एक चार सींगों वाला मेढ़ा होता है, जिसे चौसिंग्या खाडू कहा जाता है।

यात्रा की शुरुआत और अंजाम
ये पवित्र जात चमोली के नौटी गांव से शुरू होती है। यहां मां नंदा देवी की स्वर्ण प्रतिमा की स्थापना होती है और रिंगाल की छंतोली की पूजा की जाती है। कांसुवा के राजपूत कुंवर यात्रा की सफलता के लिए पारंपरिक संकल्प लेते हैं । इसके बाद भक्त मां नंदा देवी को गहने, कपड़े, मिठाइयां और दूसरी चीज़ें अर्पित करते हैं और उन्हें हिमालय के लिए रुखसत करते हैं। करीब 18 से 22 दिनों तक चलने वाली इस यात्रा में चौसिंग्या खाडू सबसे आगे चलता है और हर रात मां नंदा देवी की पवित्र छतरी के पास ही आराम करता है।

चौसिंग्या खाडू: ख़ास क्यों है यह अगुआ?
चौसिंग्या खाडू को मां नंदा का सहायक माना जाता है। मान्यता है कि चार सींगों वाला मेढ़ा हर बारह साल में एक बार ही पैदा होता है, इसलिए यात्रा से पहले इसकी तलाश शुरू हो जाती है। 2014 में लाडोली गांव में एक काला मेमना पैदा हुआ था, जिसके बाद यात्रा की घोषणा हुई थी। यात्रा के दौरान मां के गहने, श्रृंगार का सामान और अन्य चढ़ावे इसकी पीठ पर लादे जाते हैं। हेमकुंड पहुंचकर इस मेढ़े की पूजा होती है और माना जाता है कि इसके बाद वह कैलाश की ओर चला जाता है, फिर कभी नहीं दिखता।

नंदा देवी की कथा
मान्यता है कि नंदा देवी हिमवंत और मैणा की सबसे छोटी बेटी थीं, जिनका विवाह कैलासवासी शिव से हुआ था। कहते हैं कि बारह साल तक जब पिता ने नंदा की ख़बर नहीं ली, तो उन्होंने माता-पिता को पुकारा। उनके आंसू धरती पर गिरे और पिता के देश में उथल-पुथल मच गई। नारद मुनि की सलाह पर हेमंत ऋतु में सौगात लेकर नंदा को मनाने की परंपरा शुरू हुई, और तभी से यह जात होने लगी। कुछ परंपराएं नंदा को पार्वती की बहन बताती हैं, तो कुछ उन्हें पार्वती ही मानती हैं। चमोली में पट्टी चांदपुर और श्री गुरु क्षेत्र को नंदा का मायका और बधाण क्षेत्र को ससुराल माना जाता है।

2026 की यात्रा
अब तक यह यात्रा 10 बार हो चुकी है- साल 1843, 1863, 1886, 1905, 1925, 1951, 1968, 1987, 2000 और 2014 में। और अब 2026 में ये पवित्र जात बारह साल के लंबे इंतज़ार के बाद फिर से शुरू हो चुकी है। चमोली के कुरुड़ नंदा धाम से मां कैलास के लिए रवाना हो चुकी हैं और चौसिंग्या खाडू इस 296 किलोमीटर की पैदल यात्रा की अगुआई कर रहा है।

यह सिर्फ़ एक यात्रा नहीं, यह आस्था, परंपरा और हिमालय की आत्मा का संगम है। जहां हर कदम पर मां नंदा की ममता और पहाड़ की करामात महसूस होती है।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, लोक परंपराओं और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है। नंदा देवी राजजात यात्रा से जुड़ी तिथियां, मार्ग और परंपराओं से जुड़ी समस्त आधिकारिक जानकारी के लिए उत्तराखंड सरकार या संबंधित धार्मिक समिति से जानें।
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