Wednesday, October 7, 2026
26.5 C
Delhi

National Teachers’ Day: स्मार्ट क्लास से ज़्यादा ज़रूरी हैं ‘स्मार्ट शिक्षक’, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने ऐसा क्यों कहा?

सुबह की घंटी बजती है। बच्चे क्लास में आते हैं। किताबें खुलती हैं, स्मार्ट बोर्ड ऑन होता है और पढ़ाई शुरू हो जाती है। लेकिन आज के शिक्षक के सामने सवाल सिर्फ़ ये नहीं है कि बच्चे को कितना पढ़ाया जाए। असली सवाल ये है कि बच्चे को समझा कितना जाए?

शायद यही वजह है कि इस साल शिक्षक दिवस पर देश के सर्वोच्च स्तर से निकली बातें सिर्फ़ शिक्षकों को सम्मान देने तक सीमित नहीं रहीं। इनमें आज के बच्चों, उनकी आदतों और आने वाले कल की शिक्षा की एक बड़ी तस्वीर भी दिखाई दी।

स्मार्ट क्लास से आगे की कहानी

नई दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 48 शिक्षकों को National Teachers Awards से सम्मानित किया। ये शिक्षक देश के 27 राज्यों, 7 केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्र सरकार के 6 संगठनों से आए थे। इनमें 26 पुरुष और 22 महिला शिक्षक रहे।

लेकिन इस सम्मान की ख़ासियत सिर्फ़ आंकड़ों में नहीं थी। हर सम्मानित शिक्षक की कहानी अपने आप में ये बताती है कि एक क्लासरूम सिर्फ़ पढ़ाने की जगह नहीं होता। यहां किसी बच्चे का आत्मविश्वास बन सकता है, किसी की झिझक टूट सकती है और किसी ऐसी प्रतिभा को पहचान मिल सकती है, जिसे शायद वो बच्चा खुद भी नहीं पहचानता।

कार्यक्रम के दौरान अवॉर्ड पाने वाले शिक्षकों के काम पर बनी छोटी डॉक्यूमेंट्री भी दिखाई गई। यानी मंच पर सिर्फ़ शिक्षक नहीं थे, बल्कि उनके पीछे खड़ी उन हजारों बच्चों की कहानियां भी थीं, जिनकी जिंदगी में इन शिक्षकों ने कोई न कोई बदलाव किया।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भी शिक्षा को सिर्फ़ ज्ञान हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि सम्मानजनक और बेहतर जीवन की बुनियाद बताया।

उनकी बात में एक ज़रूरी संदेश था-  स्कूल में स्मार्ट बोर्ड होना अच्छी बात है, लेकिन उससे ज़्याद ज़रूरी है स्मार्ट शिक्षक का होना। क्योंकि तकनीक ये बता सकती है कि बच्चे को क्या पढ़ना है, लेकिन ये समझना कि उस बच्चे को कैसे पढ़ाना है, अभी भी एक इंसानी हुनर है।

हर बच्चा एक जैसा नहीं होता

क्लास में 40 बच्चे हों तो ज़रूरी नहीं कि सभी 40 एक ही तरीके से सीखें। किसी को गणित आसानी से समझ आता है, किसी को कहानी सुनाकर समझाना पड़ता है। कोई बच्चा सवाल पूछने में आगे रहता है, तो कोई चुपचाप बैठकर भी बहुत कुछ सोच रहा होता है। कोई पढ़ाई में कमज़ोर दिख सकता है, लेकिन हो सकता है कि उसके भीतर संगीत, खेल, कला, तकनीक या किसी और क्षेत्र की ऐसी प्रतिभा हो, जिसे अभी तक मौक़ा ही न मिला हो।

इसी सवाल को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शिक्षकों के साथ बातचीत के दौरान सामने रखा। अगर कोई बच्चा पढ़ाई में बहुत अच्छा नहीं है, तो क्या शिक्षक उसके भीतर छिपे किसी दूसरे हुनर को पहचानने की कोशिश करते हैं?

यही सवाल आज की शिक्षा व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण है। क्योंकि बच्चे को सिर्फ़ उसके नंबरों से पहचानना आसान है। लेकिन उसके भीतर छिपी क्षमता को पहचानना एक शिक्षक की असली परीक्षा है।

जब स्क्रीन ने खेल का मैदान छोटा कर दिया

आज के बच्चों की दुनिया में एक और बदलाव आया है-स्क्रीन। मोबाइल, टैबलेट, गेमिंग, सोशल मीडिया और ऑनलाइन वीडियो ने बच्चों के लिए मनोरंजन और जानकारी की दुनिया को उनकी उंगलियों तक पहुंचा दिया है। लेकिन इसके साथ एक नई चुनौती भी आई है- स्क्रीन टाइम।

प्रधानमंत्री मोदी ने शिक्षकों से बातचीत में बच्चों की स्क्रीन की आदत पर चिंता जताई और खेलकूद को इसका एक महत्वपूर्ण विकल्प बताया।

ये बात सिर्फ़ मोबाइल कम इस्तेमाल करने तक सीमित नहीं है। मैदान में खेलना बच्चे को सिर्फ़ शारीरिक रूप से सक्रिय नहीं करता। वो हारना, जीतना, टीम के साथ काम करना, इंतजार करना और दोबारा कोशिश करना भी सीखता है। इसी तरह स्कूलों में रचनात्मक गतिविधियां सिर्फ़ सालाना समारोह का हिस्सा बनकर न रह जाएं, बल्कि बच्चों की रोजमर्रा की सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा बनें। 

क्योंकि बच्चे को हर वक्त स्क्रीन से हटाकर किताब के सामने बैठा देना समाधान नहीं है। उसे स्क्रीन के बाहर एक ऐसी दुनिया देना भी जरूरी है, जिसमें वो खेल सके, बना सके, सवाल पूछ सके, गलती कर सके और फिर से कोशिश कर सके।

बचपन मरने नहीं देना चाहिए

प्रधानमंत्री की बातचीत में शायद सबसे ज़्यादा ध्यान खींचने वाली बात यही थी कि बच्चों को सिर्फ़ सिलेबस और किताबों तक सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने शिक्षकों से कहा कि बच्चों की असली ज़िंदगी में शामिल होना जरूरी है और “बचपन मरने नहीं देना चाहिए।”

बच्चों पर पढ़ाई, प्रतियोगिता और भविष्य की चिंता का दबाव बढ़ता जा रहा है। ऐसे में शिक्षक का काम सिर्फ़ अगला चैप्टर पूरा करना नहीं रह जाता। उसे ये भी देखना पड़ता है कि बच्चा कैसा महसूस कर रहा है, किस चीज में उसकी दिलचस्पी है और उसे आगे बढ़ने के लिए किस तरह के प्रोत्साहन की ज़रूरत है।

यहीं शिक्षक और बाकी डिजिटल संसाधनों के बीच सबसे बड़ा फर्क दिखाई देता है। एक वीडियो आपको कोई विषय समझा सकता है। एक ऐप आपकी गलतियां बता सकता है। लेकिन एक शिक्षक ये देख सकता है कि आप गलती क्यों कर रहे हैं और उस गलती के बाद आपको दोबारा कोशिश करने का हौसला कैसे दिया जाए।

बेटियों की पढ़ाई से लेकर आखिरी बच्चे तक

शिक्षा की चर्चा सिर्फ़ स्मार्ट क्लास और डिजिटल टेक्नोलॉजी तक सीमित नहीं है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने बेटियों की शिक्षा पर भी विशेष ज़ोर दिया। उनका संदेश साफ़ था कि एक बेटी की शिक्षा में किया गया निवेश सिर्फ़ एक व्यक्ति के भविष्य को नहीं बदलता, बल्कि पूरे परिवार और समाज के भविष्य को प्रभावित करता है।

उन्होंने शिक्षकों से कमज़ोर, संकोची और वंचित पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चों पर विशेष ध्यान देने की अपील भी की। शिक्षा की असली ताकत तब दिखाई देती है जब वो सिर्फ़ पहले से आगे चल रहे बच्चों को और आगे नहीं बढ़ाती, बल्कि पीछे छूट रहे बच्चे को भी आगे आने का मौका देती है।

“student” और “teacher” — एक दिलचस्प इत्तेफ़ाक़

आपने ध्यान दिया हो या नहीं, अंग्रेज़ी के शब्द “student” और “teacher” — दोनों में ठीक 7 अक्षर हैं। यह भाषा का एक मज़ेदार संयोग भर है, इसका कोई गहरा भाषाई या ऐतिहासिक कारण नहीं है। लेकिन इसे एक प्यारे नज़रिए से देखा जा सकता है मानो भाषा भी यह इशारा कर रही हो कि शिक्षक और छात्र का रिश्ता बराबरी का है। एक अच्छा शिक्षक सिखाते हुए खुद भी सीखता है, और एक जिज्ञासु छात्र अक्सर अपने गुरु को नए सवालों से सोचने पर मजबूर कर देता है। यानी यह रिश्ता एकतरफा नहीं, बल्कि आपसी सीख का है।

STUDENT

S – Sincere (ईमानदार)

T – Talented (प्रतिभाशाली)

U – Understanding (समझदार)

D – Dedicated (समर्पित)

E – Enthusiastic (उत्साही)

N – Noble (नेक)

T – Thoughtful (विचारशील)

TEACHER

T – Talented (प्रतिभाशाली)

E – Enthusiastic (उत्साही)

A – Adorable (स्नेही)

C – Caring (देखभाल करने वाला)

H – Helpful (मददगार)

E – Encouraging (प्रोत्साहित करने वाला)

R – Responsible (ज़िम्मेदार)

गुरु का महत्व सिर्फ़ क्लास तक सीमित नहीं रहता। स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई ख़त्म होने के बाद भी शिक्षक की कही कोई बात, दी गई कोई सलाह या छोटी-सी डांट कई बार ज़िंदगी के मुश्किल मोड़ पर रास्ता दिखाती है।

शिक्षक हमें सिर्फ़ पढ़ना नहीं, समझना सिखाते हैं।

सिर्फ़ सफल होना नहीं, अच्छा इंसान बनना सिखाते हैं।

और सिर्फ़ मुश्किलों से बचना नहीं, उनका सामना करना सिखाते हैं।

इसलिए शिक्षक दिवस सिर्फ़ शिक्षकों को धन्यवाद कहने का दिन नहीं है। यह उस रिश्ते को याद करने का दिन है, जिसने हमारी सोच, हमारे सपनों और हमारी ज़िंदगी को किसी न किसी रूप में दिशा दी है। क्योंकि किताबें हमें ज्ञान दे सकती हैं, लेकिन एक अच्छा शिक्षक उस ज्ञान को ज़िंदगी जीने की समझ में बदल देता है।

शिक्षक वह होता है जो आज के विद्यार्थी में आने वाले कल का नागरिक देखता है। शायद यही एक शिक्षक की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है।

ये भी पढ़ें: कृष्ण एक नाम, कई नज़रिए… जब उर्दू शायरों ने कान्हा को अपने अल्फ़ाज़ में उतारा

आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

महेंद्र नाथ: मेहनतकशों की आवाज़ और उर्दू कहानी का एक सच्चा क़लमकार

"तवाइफ़ीयत का मसला तवाइफ़ों को गाली देने से हल...

किन्हाल के खिलौने: लकड़ी में बसी एक सभ्यता की दास्तान

तुंगभद्रा नदी जब कर्नाटक की धरती से गुज़रती है,...

Cab Driver से आर्मी और फिर Rower, Salman Khan कैसे पहुंचे Asian Games तक?

जिस खेल का नाम तक उन्होंने कभी नहीं सुना...

तिब्बत पहुंचने वाली पहली विदेशी महिला

अपने सौवें जन्मदिन पर जब उसने अपना पासपोर्ट रिन्यू...

मीराजी: हिंदुस्तानी फ़िज़ा में रची-बसी एक अनोखी आवाज़ 

उर्दू शायरी के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं...

Topics

महेंद्र नाथ: मेहनतकशों की आवाज़ और उर्दू कहानी का एक सच्चा क़लमकार

"तवाइफ़ीयत का मसला तवाइफ़ों को गाली देने से हल...

किन्हाल के खिलौने: लकड़ी में बसी एक सभ्यता की दास्तान

तुंगभद्रा नदी जब कर्नाटक की धरती से गुज़रती है,...

Cab Driver से आर्मी और फिर Rower, Salman Khan कैसे पहुंचे Asian Games तक?

जिस खेल का नाम तक उन्होंने कभी नहीं सुना...

तिब्बत पहुंचने वाली पहली विदेशी महिला

अपने सौवें जन्मदिन पर जब उसने अपना पासपोर्ट रिन्यू...

मीराजी: हिंदुस्तानी फ़िज़ा में रची-बसी एक अनोखी आवाज़ 

उर्दू शायरी के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं...

 वर्ली पेंटिंग्स: सफ़ेद-काली लकीरों में छुपी हज़ारों साल पुरानी दास्तान 

क़बीलाई समाज हमेशा प्रकृति के सबसे क़रीब रहा है।...

आनंद नारायण मुल्ला: मैं मज़हब छोड़ सकता हूं, मगर मादरी ज़बान उर्दू नही…

हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब की जब भी बात होती...

Related Articles

Popular Categories