ढोल की तेज़ थाप, कमर में बंधी घंटियों की आवाज़, चारों तरफ़ पीले, काले और लाल रंग से सजे चेहरे और शरीर। कोई बाघ की तरह गुर्रा रहा है, तो कोई शिकारी बनकर उसके पीछे दौड़ रहा है। भीड़ तालियां बजा रही है और त्रिशूर की सड़कें इस अनोखे नज़ारे की गवाह बनी हुई हैं। ओणम के चौथे दिन केरल के त्रिशूर में कुछ ऐसा ही मंज़र दिखाई देता है। यहां इंसान कुछ घंटों के लिए बाघ का किरदार निभाते हैं और सड़कों पर उतरकर नाचते हैं।
इस लोक कला को कहा जाता है Pulikali (पुलिकली), यानी बाघ का नाच। कुछ जगहों पर इसे कडुवाकली भी कहा जाता है। Pulikali (पुलिकली) सिर्फ़ एक डांस नहीं है। ये रंगों, संगीत, मेहनत, पुरानी रस्मों और सबसे बढ़कर लोगों को एक साथ जोड़ने वाली सामुदायिक भावना है।
बाघ बनने में लगते हैं करीब 5 से 7 घंटे
सड़क पर बाघ बनकर नाचते कलाकारों को देखकर शायद आपको लगेगा कि ये बस रंग लगाने और नाचने का खेल है। लेकिन एक कलाकार को बाघ का रूप देने में घंटों की मेहनत लगती है। इन कलाकारों को पुलिकलिक्कर कहा जाता है। सबसे पहले उनके शरीर के बाल हटाए जाते हैं। इसके बाद शरीर पर पीले, काले और लाल रंग की मदद से बाघ की धारियां और धब्बे बनाए जाते हैं।
बाघ का रूप देने के लिए शरीर के पीछे बड़े धब्बों से शुरुआत की जाती है। जैसे-जैसे ये धब्बे आगे पेट की तरफ़ आते हैं, उनका आकार छोटा होता जाता है। वरायन पुली यानी बाघ के शरीर पर छह तरह तक की धारियां बनाई जा सकती हैं। एक पूरा बाघ जैसा रूप तैयार करने में करीब 5 से 7 घंटे तक लग सकते हैं। यानी सड़क पर दिखाई देने वाला कुछ मिनटों का डांस, कलाकारों की कई घंटों की मेहनत का नतीजा होता है।

जब ढोल की थाप पर थिरकते हैं बाघ
Pulikali (पुलिकली) की असली जान है इसका संगीत। केरल के पारंपरिक वाद्य यंत्रों से निकलती आवाज़ के बीच कलाकार बाघ की चाल और अंदाज़ में नाचते हैं। त्रिशूर के Pulikali (पुलिकली) की अपनी ख़ास ताल है, जिसे पुलिमेलम कहा जाता है। इस ताल को थोट्टुंगल रामनकुट्टी आसन ने तैयार किया था और इसकी परंपरा करीब 70 साल पुरानी बताई जाती है।
कलाकार कमर में घंटियां बांधकर इस तेज और जोशीली ताल पर नाचते हैं। ढोल की थाप, घंटियों की आवाज़ और लोगों की तालियां मिलकर ऐसा माहौल बनाती हैं कि देखने वाला भी इस जश्न का हिस्सा बन जाता है। पुलिमाडा, मेलाकोट, विय्यूर, कोट्टापुरम, अयंथोल, त्रिक्कुमारकुडम, पूनकुन्नम और कई दूसरे पुलिकली ग्रुप हर साल इस आयोजन में हिस्सा लेते हैं।
करीब 200 साल पुरानी है Pulikali की कहानी
Pulikali (पुलिकली) की कहानी करीब 200 साल पुरानी मानी जाती है। इसकी शुरुआत को कोचीन के महाराजा राम वर्मा शक्तन थंपुरन से जोड़ा जाता है। माना जाता है कि उनके दौर में बाघ का रूप धारण करके होने वाली इस प्रस्तुति को ओणम के जश्न से जोड़ा गया और धीरे-धीरे ये एक लोकप्रिय लोक कला बन गई। आज केरल के कई हिस्सों में बाघ के रूप में होने वाली ऐसी प्रस्तुतियां देखने को मिलती हैं, लेकिन त्रिशूर की पुलिकली को सबसे पुरानी और सबसे मशहूर शैली माना जाता है। लेकिन इसकी कहानी का एक और पहलू भी है, जो इसे और दिलचस्प बना देती है।
केरल पर्यटन विभाग के मुताबिक, त्रिशूर की Pulikali (पुलिकली) की शुरुआती परंपरा को पट्टानी मुसलमानों की एक ख़ास रस्म और उससे जुड़े जुलूस से भी जोड़ा जाता है। एक मशहूर मान्यता के मुताबिक, पट्टानी मुस्लिम समुदाय की ‘पंचा लेने की रस्म’ के दौरान एक जुलूस निकाला जाता था। ये जुलूस पोस्ट ऑफिस रोड से कोकोला नाम की जगह तक जाता था।
इसी जुलूस में बाघ बनकर होने वाला डांस लोगों को पसंद आने लगा और धीरे-धीरे ये एक बड़े जश्न का हिस्सा बन गया। हालांकि, इतिहास के इस हिस्से को एक पुरानी मान्यता के तौर पर देखना ज़्यादा सही है। इसे पूरी तरह साबित इतिहास की तरह पेश करना ठीक नहीं होगा। लेकिन ये मान्यता Pulikali (पुलिकली) की कहानी में एक दिलचस्प सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू ज़रूर जोड़ती है।

41 दिनों तक तैयारी
Pulikali (पुलिकली) की तैयारी डांस वाले दिन से बहुत पहले शुरू हो जाती है। कई Pulikali (पुलिकली) ग्रुप के कलाकार कार्किडकम महीने के पहले दिन से ओणम के चौथे दिन तक 41 दिनों का उपवास रखते हैं। नाच से एक रात पहले कलाकारों को बाघ का रूप देने की रस्म शुरू होती है। अगले दिन उनके पूरे शरीर पर रंग किया जाता है और शाम को वो त्रिशूर के स्वराज चौक की तरफ़ रवाना होते हैं।
लेकिन वहां जाने से पहले एक ख़ास रस्म निभाई जाती है। कलाकार वडक्कुनाथन मंदिर में भगवान गणेश को नारियल चढ़ाते हैं। इसके बाद बाघों का ये काफिला त्रिशूर की सड़कों पर उतरता है। दर्शकों के लिए जगह-जगह मंच भी बनाए जाते हैं, ताकि लोग इस पूरे नज़ारे को करीब से देख सकें।
वक़्त के साथ Pulikali (पुलिकली) में भी बदलाव आया है, लेकिन इसकी असली रूह आज भी वही है। अब कलाकार और आयोजक इसे और दिलचस्प बनाने के लिए नए तरीके आजमा रहे हैं। कहीं चमकीले रंगों से सजे बाघ नज़र आते हैं, तो कहीं बाघ के चेहरे वाले पारदर्शी छाते लोगों का ध्यान खींचते हैं। कुछ प्रस्तुतियों में तीन आयाम वाले बाघों की झांकियां भी देखने को मिलती हैं। यानी पुरानी लोक कला अब नए अंदाज़ और नए हुनर के साथ आगे बढ़ रही है, लेकिन उसकी पुरानी पहचान आज भी बरकरार है।

जब पूरा शहर बन जाता है एक जश्न
Pulikali (पुलिकली) की सबसे ख़ूबसूरत बात यही है कि इसमें सिर्फ़ कलाकार नहीं होते। स्थानीय दल, कलाकार, स्वयंसेवक और आम लोग सब मिलकर इसे ज़िंदा रखते हैं। ओणम के दौरान जब बाघ त्रिशूर की गलियों में उतरते हैं, तो शहर की पहचान कुछ देर के लिए बदल जाती है। ढोल की थाप पर थिरकते कलाकार, बाघ की तरह रंगे शरीर, शिकारी का किरदार और उन्हें देखने उमड़ी भीड़ सब मिलकर एक ऐसा मंज़र बनाते हैं, जिसे शब्दों में बांधना मुश्किल है।
शायद यही Pulikali (पुलिकली) की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती है। ये सिर्फ़ बाघ बनने की कला नहीं, बल्कि केरल की लोक विरासत, संगीत, हुनर और आपसी मेल-जोल का जश्न है। और जब ओणम आता है, तो त्रिशूर की सड़कें सिर्फ़ सजती नहीं हैं वो ढोल की थाप, घंटियों की झंकार और बाघों की दहाड़ से गूंज उठती हैं।
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