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बेग़म अख़्तर का शायर

श्रीनगर में अप्रैल 1969 की एक दोपहर जब बरसात हो रही थी, उसके घर का टेलीफोन बजा। उसके पिता की दोस्त बेगम अख्तर बोल रही थीं। उनकी फ़्लाइट कैंसिल हो गयी थी। थोड़ी ही देर में वे उनके घर पर थीं। रात को बेगम की सिगरेटें ख़त्म हो गईं। वह और उसका बड़ा भाई झटपट बाजार जाकर सिगरेट ले कर आये। बेगम केवल कैप्सटन ब्रांड पीती थीं। यह घनी स्मृति आगे जाकर उसकी एक कविता में उतरनी थी:

उनकी तस्वीर: वे मुस्कराती हैं: एक कैप्सटन सुलगाती हैं
लपट में नोकीला होता, उनका चेहरा घुलता है धुंएँ में

ये आगा शाहिद अली थे। बेगम अख्तर से पैंतीस साल छोटे अंगरेजी के इस बेहतरीन कवि को कुल 52 साल की जिन्दगी मिली। बेगम से हुई पहली मुलाक़ात के बाद से आगा की पूरी ज़िंदगी बदल गयी। यह अलग बात है कि इस मुलाक़ात के पांच साल बाद 1974 में बेगम अख्तर स्वर्ग सिधार गयी थीं।

1970 में आगा अपनी कॉलेज की पढ़ाई के लिए दिल्ली आ गए और उस के बाद से बेगम की हर नशिस्त में शामिल हुए. सन 1971 में प्रगति मैदान में हुई उनकी एक कंसर्ट आगा की कविता में यूं दर्ज हुई:

वह ऐसा था, जैसे कोहरा
काला पड़ जाए, एक पल जब आप सिर्फ किसी
खोये हुए समुद्र को सुन पाते हैं, एक वक़्त
जब आप हर एक परछाई को याद करते हैं
हर उस चीज को जो धरती से जुदा हो रही थी,
एक वक्त हर उस चीज के बारे में सोचने का
जिसे धरती और मैं खो चुके थे,
हर उस चीज के बारे में जिसे मैं खोऊंगा
हर उस चीज का जिसे मैं खो रहा था.

पारिवारिक जान-पहचान के चलते आगा को यह विशेषाधिकार हासिल था कि बेगम की ठीक बगल में बैठ कर उन्हें अपने टेप रेकॉर्डर पर रेकॉर्ड कर ले। एक संवेदनशील युवा मन पर बेगम की ऐसी कुर्बत का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और उसने ग़ज़ल नाम की विधा की तमाम बारीकियों को सीखना-जानना शुरू किया। आगा शाहिद ने इसके अलावा बेगम अख्तर की गायकी की खामोशियों और दोहरावों का गहन अध्ययन किया और खुद ग़ज़ल कहना सीखा।

बेगम के इंतकाल की रात को आगा शाहिद ने उन पर एक लम्बा मर्सिया लिखा, जिसका एक टुकड़ा यूं है:

आप मृतकों से सवाल-जवाब नहीं कर सकते
लेकिन मेरे पास मौके पर मौजूद सारे सबूत हैं, तुम्हारे रेकॉर्ड्स, तस्वीरें, टेप,
और मैंने एक लापरवाह गवाही पेश की है.

मैं चाहता हूँ अपने बचाव में कुछ कहने को तुम्हें बुलाऊँ
लेकिन कब्र सीली हुई और ठंडी है,
अब जब कि मल्हार बारिश को सीना चाहता है
तुम्हें अपने सुरों पर लपेट लेना चाहता है,
तुम चालाकी से पूरी तरह बच निकली हो

आगा शाहिद अली 1976 में अमेरिका चले गए जहाँ उन्होंने तमाम यूनिवर्सिटीज में अध्यापन किया। इस दौरान उन्होंने ग़ज़ल को एक बड़ी अन्तर्राष्ट्रीय साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित करते हुए बहुत सारा लेखन भी किया. फैज अहमद फैज, जो उनके पारिवारिक दोस्त थे, की कविता को उन्होंने अंगरेजी में अनूदित किया।

लेकिन इस सब से ऊपर आगा शाहिद अली की पहचान एक बड़े समकालीन अंगरेजी कवि के रूप में है। तमाम अन्तर्राष्ट्रीय सम्मानों से नवाजे जा चुके इस कवि की कविताओं के कुल नौ संग्रह छपे। स्मृति और निर्वासन उनके रचनाकर्म का तानाबाना है। उन्होंने अपनी कविता में भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक-सांगीतिक और साहित्यिक विरासत को खूब सारा स्पेस दिया है। उन्होंने कुंदन लाल सहगल पर भी एक जबरदस्त कविता लिखी है जिसमें वे इस नायाब गायक के बहाने अपने पुरखों की जड़ों तक पहुँचने की कोशिश करते हैं।

आगा शाहिद अली की कविता में उनका घर कश्मीर भी बार-बार आता है। उनकी कविता का कश्मीर फ़क़त भूगोल नहीं, स्मृति में बची हुई एक ऐसी जगह है जहाँ लौटना हमेशा संभव नहीं होता। उनकी कविताओं में झीलें, बर्फ, चिनार और पहाड़ धीरे-धीरे अनुपस्थित लोगों के चेहरे में बदल जाते हैं, घर एक पता नहीं, खो चुकी हुई आवाज़ हो जाता है। वे निर्वासन को किसी बड़े राजनीतिक शब्द की तरह नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की छोटी-छोटी चीज़ों में महसूस करते हैं – एक नाम के उच्चारण में, किसी पुराने शहर की गंध में, माँ की आवाज़ में, उस रास्ते में जो अब नक्शे पर तो है लेकिन स्मृति में धुँधला पड़ चुका है। उनके यहाँ दुख चीखता-चिल्लाता नहीं। वह बर्फ की तरह चुपचाप गिरता है और पूरी कविता को सफेद कर देता है।

शाहिद की सबसे बड़ी ताकत शायद यही है कि वे निजी शोक को सामूहिक स्मृति में बदल देते हैं। उनकी कविता में कश्मीर कभी-कभी एक खोया हुआ प्रेम है, कभी मृतकों की लंबी कतार, कभी बचपन का घर और कभी ऐसी भाषा जिसे बोलते-बोलते आदमी अपने ही भीतर से दूर होता जाता है। वे ग़ज़ल की परंपरा, उर्दू की नज़ाकत और अंग्रेज़ी कविता की आधुनिक बेचैनी को इस तरह मिलाते हैं कि उनकी पंक्तियों में दो दूरियाँ एक साथ सुनाई देती हैं – वतन से दूरी और भाषा से दूरी। इसलिए शाहिद को पढ़ना सिर्फ़ कश्मीर को पढ़ना नहीं है, यह उस मनुष्य को पढ़ना है जो अपने भीतर एक पूरा शहर लिए फिरता है और हर बार कविता लिखते हुए उसके दरवाज़े पर लौट आता है।

आगा शाहिद अली की कविता आधुनिक साहित्य के हर छात्र के लिए बेहद जरूरी है। उनके कमरे की दीवार पर टंगा रहने वाला बेगम अख्तर का एक बड़ा सा पोर्ट्रेट अपने जीवन की धारा को बदल देने वाली उस औरत के लिए उनकी मोहब्बत और सम्मान की गवाही देता था।

ये भी पढ़ें-   Maheshwari Fabric: रानी का ख़्वाब, बुनकरों की मेहनत और इतिहास का रेशमी सफ़र

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Ashok Pande
Ashok Pandehttp://kabaadkhaana.blogspot.com
अशोक पांडे चर्चित कवि, चित्रकार और अनुवादक हैं। उनका प्रकाशित उपन्यास ‘लपूझन्ना’ काफ़ी सुर्ख़ियों में रहा है। पहला कविता संग्रह ‘देखता हूं सपने’ 1992 में प्रकाशित। जितनी मिट्टी उतना सोना, तारीख़ में औरत, बब्बन कार्बोनेट अन्य बहुचर्चित किताबें। कबाड़खाना नाम से ब्लॉग kabaadkhaana.blogspot.com। अभी हल्द्वानी, उत्तराखंड में निवास।

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