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जमीलुद्दीन आली: दोहों से उर्दू अदब को नया रंग देने वाले शायर

उर्दू अदब की दुनिया में कुछ शायर ऐसे गुज़रे हैं जिन्होंने सिर्फ़ ग़ज़ल और नज़्म तक अपनी शायरी को महदूद नहीं रखा, बल्कि नए अंदाज़ और अलग-अलग अस्नाफ़ को अपनाकर साहित्य को एक नई आवाज़ दी। जमीलुद्दीन आली भी ऐसे ही बहुआयामी शायर थे। उनका असली नाम मिर्ज़ा जमीलुद्दीन अहमद था और अदबी दुनिया में वे अपने तख़ल्लुस ‘आली’ के नाम से मशहूर हुए। वे शायर होने के साथ-साथ लेखक, पत्रकार और साहित्यिक कार्यकर्ता भी थे। ख़ास तौर पर उनके दोहों ने उन्हें उर्दू अदब में एक अलग पहचान दी।

दिल्ली में हुई पैदाइश, जड़ें लुहारू से जुड़ीं

जमीलुद्दीन आली की पैदाइश 20 जनवरी 1925 को दिल्ली में हुई। उनका ताल्लुक़ लुहारू के नवाबी ख़ानदान से था। उनके पिता नवाब सर अमीरुद्दीन अहमद ख़ान थे। इस तरह आली को बचपन से ही एक ऐसे माहौल में परवरिश मिली, जहां इल्म, तहज़ीब और साहित्य की अपनी अहम जगह थी। बाद में यही माहौल उनके अदबी मिज़ाज की बुनियाद बना।

आली की ज़िंदगी उस दौर से गुज़री जब हिंदुस्तान की सियासत और समाज तेज़ी से बदल रहे थे। 1947 का बंटवारा उनकी ज़िंदगी का भी एक बड़ा मोड़ बना। वे पाकिस्तान चले गए और कराची को अपना ठिकाना बनाया। Dawn की रिपोर्ट के मुताबिक़ वे 13 अगस्त 1947 को अपनी पत्नी और छोटी बेटी के साथ दिल्ली से कराची पहुंचे थे।

सरकारी नौकरी से अदब तक का सफ़र

पाकिस्तान पहुंचने के बाद आली ने सरकारी सेवा में काम किया। उन्होंने CSS का इम्तिहान 1951 में पास किया और पाकिस्तान की टैक्सेशन सर्विस में शामिल हुए। बाद में वे इनकम टैक्स विभाग में ऊंचे ओहदे तक पहुंचे। यानी उनकी ज़िंदगी सिर्फ़ शायरी तक सीमित नहीं थी; उन्होंने प्रशासनिक ज़िम्मेदारियां भी निभाईं।

दिलचस्प बात यह है कि सरकारी नौकरी के साथ-साथ उनका अदबी सफ़र भी लगातार आगे बढ़ता रहा। उन्होंने बाद में L.L.B. की पढ़ाई भी पूरी की, और साहित्य तथा सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। वे पाकिस्तान राइटर्स गिल्ड की स्थापना से जुड़े अहम लोगों में शामिल थे।

दोहा बना आली की पहचान

आली की शायरी का सबसे ख़ास पहलू उनके दोहों में दिखाई देता है। दोहा भारतीय काव्य-परंपरा की एक पुरानी और लोकप्रिय विधा है, लेकिन आली ने इसे उर्दू के लहजे और अपने आधुनिक तर्जुबों के साथ पेश किया। उनके दोहों में ज़िंदगी, रिश्ते, समाज, मोहब्बत, उम्मीद, दुख और इंसानी फ़ितरत के कई रंग दिखाई देते हैं।

उनकी शायरी की ख़ूबी यह थी कि वे बड़ी बात को बहुत आसान और सादा शब्दों में कह देते थे।

कुछ छोटे-छोटे दुख अपने, कुछ दुख अपने अज़ीज़ों के
इन से ही जीवन बनता है, सो जीवन बन जाएगा

इन पंक्तियों में आली ज़िंदगी के छोटे-बड़े दुखों को एक साधारण लेकिन गहरी बात में बदल देते हैं। उनके यहां फ़लसफ़ा मुश्किल अल्फ़ाज़ में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी के एहसास में मिलता है।

इसी तरह उनका यह शेर भी रिश्ते और उम्मीद की एक नर्म तस्वीर पेश करता है।

तेरे ख़याल के दीवार-ओ-दर बनाते हैं
हम अपने घर में भी तेरा ही घर बनाते हैं

आली की शायरी में मोहब्बत सिर्फ़ इश्क़ की कैफ़ियत नहीं, बल्कि इंसानी रिश्तों और यादों की दुनिया भी है।

ग़ज़ल, गीत और देशभक्ति के नग़मे

आली ने सिर्फ़ दोहे नहीं लिखे। उन्होंने ग़ज़लें, गीत, नज़्में और दूसरे साहित्यिक रूपों में भी लिखा। उनकी किताब ‘ग़ज़लें, दोहे, गीत’ उनके इस बहुआयामी रचनात्मक सफ़र की मिसाल है। यह संग्रह पहली बार 1957 में प्रकाशित हुआ था।

उनके देशभक्ति गीतों ने भी उन्हें आम लोगों के बीच ख़ास पहचान दिलाई। ‘जीवे जीवे पाकिस्तान’, ‘ऐ वतन के सजीले जवानो’ और ‘मेरा पैग़ाम पाकिस्तान’ जैसे गीतों का ज़िक्र उनकी साहित्यिक विरासत के साथ किया जाता है। Dawn ने भी उन्हें इन लोकप्रिय देशभक्ति गीतों के लिए याद किया है।

उनकी आवाज़ में देश, समाज और इंसान से जुड़ी उम्मीद साफ़ दिखाई देती है।

ऐ वतन के सजीले जवानो
मेरे नग़मे तुम्हारे लिए हैं

पत्रकारिता और साहित्यिक ख़िदमत

आली की पहचान सिर्फ़ शायर के तौर पर नहीं थी। वे लंबे समय तक पत्रकारिता से भी जुड़े रहे। Dawn के मुताबिक उन्होंने अख़बार Jang में करीब 50 साल तक साप्ताहिक कॉलम लिखा, जो उर्दू पत्रकारिता के इतिहास में एक उल्लेखनीय रिकॉर्ड माना जाता है।

इस तरह उनका रिश्ता किताब, कलम और समाज—तीनों से रहा। उन्होंने साहित्य को सिर्फ़ किताबों तक महदूद नहीं रखा बल्कि आम पाठक और समाज के सवालों से भी जोड़ा।

प्रमुख किताबें और अदबी विरासत

जमीलुद्दीन आली की कई किताबें उर्दू अदब में अहम मानी जाती हैं। इनमें ‘ग़ज़लें, दोहे, गीत’, ‘लाहासिल’, ‘जीवे जीवे पाकिस्तान’, ‘तमाशा मेरे आगे’, ‘ऐ मेरे दश्त-ए-सुख़न’, ‘गुशा-ए-बिसात’, ‘हर्फ़-ए-चंद’ और ‘इंसान’ जैसी किताबें शामिल हैं। 

सम्मान और आख़िरी दौर

आली को उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए कई सम्मान मिले। 1989 का प्रेसिडेंट मेडल और 2006 का कमाल-ए-फ़न अवॉर्ड से नवाज़ा गया।

जमीलुद्दीन आली ने अपनी लंबी ज़िंदगी में उर्दू अदब, पत्रकारिता और साहित्यिक संस्थाओं के लिए काम किया। वे 23 नवंबर 2015 को कराची में 90 साल की उम्र में इस दुनिया से रुख़्सत हुए। उनके इंतक़ाल के बाद भी उनके गीत, ग़ज़लें और ख़ास तौर पर दोहे उन्हें उर्दू अदब की दुनिया में ज़िंदा रखते हैं।

आली की सबसे बड़ी ख़ूबी शायद यही थी कि उन्होंने मुश्किल बात को आसान ज़बान में कहने का हुनर हासिल किया। उनके कलाम में मोहब्बत भी है, ज़िंदगी का फ़लसफ़ा भी, समाज की तस्वीर भी और वतन से लगाव भी। उन्होंने दोहे जैसी पुरानी काव्य-विधा को उर्दू के लहजे में ढालकर उसे एक नया रंग दिया। यही वजह है कि जमीलुद्दीन आली का नाम उर्दू अदब में एक ऐसे शायर के तौर पर याद किया जाता है जिसने शायरी को कई रास्तों से होकर आम इंसान के दिल तक पहुंचाया।

ये भी पढ़ें: अमृता प्रीतम: मोहब्बत, तन्हाई और बंटवारे के दर्द की आवाज़

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