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Maheshwari Fabric: रानी का ख़्वाब, बुनकरों की मेहनत और इतिहास का रेशमी सफ़र

नर्मदा नदी के किनारे बसा माहेश्वर, मध्य प्रदेश का वो शहर जहा हथकरघा सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि सदियों की दास्तान बुनता है। यहां के साल्वी कम्युनिटी के बुनकर सदियों से रूई के धागे को जादू में बदलते आ रहे हैं। लेकिन असली रंग आया सन 1767 में, जब रानी अहिल्याबाई होल्कर ने इस शहर को अपनी राजधानी बनाया।

रानी अहिल्याबाई होल्कर (Image-Social Media)

रानी ने ना सिर्फ यहां बनने तैयार होने वाली माहेश्वरी बुनाई (Maheshwari Fabric) को संरक्षण दिया, बल्कि बुनाई को एक नई शक्ल भी। उन्होंने इसके लिए सूरत और मांडू से माहिर बुनकर बुलवाए,रूई के साथ रेशम (Silk) को मिक्स करवाया और वो एक ऐसा कपड़ा बन कर तैयार हुआ जिसकी अपनी ख़ास चमक थी। इतना महीन कि पानी की तरह लहराए और इतना मजबूत कि रोज़ के इस्तेमाल में आराम से पहना जा सके और इतना ख़ूबसूरत कि दूर से ही अपनी पहचान बता जाए। यही है माहेश्वरी सिल्क (Maheshwari Fabric)। 

आपको बता दें कि माहेश्वरी साड़ी की किनारी दोनों तरफ से एक जैसी नज़र आती है। इसके बीचों-बीच खड़ी धारियां और बिखरे छोटे-छोटे बूटे बूटी बने होते हैं।  

मुगलिया असर या मराठा अंदाज? क्या कहता है इतिहास

इतिहास की किताबें बताती हैं कि माहेश्वरी बुनाई पर मुगलों का असर है, लेकिन ये सच का सिर्फ आधा हिस्सा है।दिल्ली से दक्कन होते हुए मालवा तक आए उस ज्योमेट्रिकल बेलबूटे और चेक को मराठों ने अपने अंदाज़ में ढाला।रानी अहिल्याबाई ने उस परंपरा में अपनी सूझ-बूझ से फ़र्क़ डाला। 

Maheshwari Fabric (Image- Piaxels.com)

उन्होंने तकल्लुफ़ कम और पाइदारी ज़्यादा इसमें चाही। जहां फ़ारसी ज्योमेट्री भारतीय रेशम-रूई में ढली और एक हिंदू रानी ने उसे मुगलों के बाद अपना रंग बनाया। 

अंग्रेज़ी दौर और बुनकरों का संकट

19वीं सदी में जब मैनचेस्टर की मिलों का कपड़ा सस्ते दामों पर आने लगा,तो माहेश्वर के करघे ख़ामोश हो गए। बुनकरों की पीढ़ियां खेतों में काम करने लगीं या फिर शहर को छोड़ चली गईं। वो हुनर जो बाप-दादा से आंखों-आंखों सीखा गया था,लगभग गायब हो गया।  

Maheshwari Fabric (Image- Piaxels.com)

सैली होल्कर: जिसने करघे को दूसरी ज़िंदगी दी

1970 के दशक में अमेरिकी बहू सैली होल्कर ने माहेश्वर में आकर बचे-खुचे बुनकरों को इकट्ठा किया। उन्होंने रिहवा सोसाइटी बनाई, नई पीढ़ी को तालीम दी और बिचौलियों को हटाकर सीधा बाज़ार दिया। 2009 में जीआई टैग (Geographical Indication) आया तो नकल पर रोक लगी, लेकिन असली रूह तो रिहवा के उस अहद में थी जिसने करघों को फिर से बोलना सिखाया।

जब आप माहेश्वरी पहनते हैं तो आप सिर्फ कपड़ा नहीं पहन रहे, आप पहन रहे हैं सूरत के रेशम-व्यापार, मालवा की रूई, रानी की राजनीतिक चाहत, औपनिवेशिक उजाड़, और एक विदेशी महिला के प्यार को। इसका उल्टा-सीधा समान किनारा गर्मी में सर्दी का एहसास देता है, पांच धारियां प्रोडक्शन का मियार हैं, और रेशम-रूई का मिक्सचर दो दुनियाओं का मिलन है।

Maheshwari Fabric (Image- Piaxels.com)

ये कपड़ा हर धागे में इतिहास समेटे रखता है। जैसे नर्मदा का पानी सदियों की गवाही। इसे पहनना राजाओं और बुनकरों के उस सफ़र को सलाम करना है, जिसने एक कपड़े को जीती-जागती कहानी बना दिया। 

इस आर्टिकल में दी गई सभी इनफॉरमेंशन भरोसेमंद ऐतिहासिक सोर्स,सरकारी प्रकाशनों, शोध संस्थानों की रिपोर्ट्स के साथ लिखी गई है।  

ये भी पढ़ें-  बिहार की सुजनी कढ़ाई: कपड़े पर बुनती कहानियां, ख़्वाब और पहचान

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