प्रियंवदा सिंह की शायरी आज की उर्दू शायरी में एक अलग और दिल को छू लेने वाली आवाज़ के तौर पर सामने आती है। उनकी शायरी में पुरानी रवायतों की खूबसूरती भी दिखाई देती है और नए दौर की सोच भी। वह अपने अल्फ़ाज़ बहुत सोच-समझकर चुनती हैं, इसलिए उनके अशआर में जज़्बात के साथ-साथ गहराई भी महसूस होती है।
अगऱ प्रियंवदा सिंह की पैदाइश की बात करें तो साल 1991 में दिल्ली में हुयी । उन्होंने बायोटेक्नोलॉजी में मास्टर्स की पढ़ाई की और इसके बाद अंग्रेज़ी साहित्य में भी मास्टर्स डिग्री हासिल की।
उनकी शायरी में इश्क़, तन्हाई, इंतज़ार, अनकहे जज़्बात और रिश्तों की पेचीदगियां बार-बार सामने आती हैं। ख़ास बात यह है कि वह बड़े एहसासों को बहुत सादे और आसान अंदाज़ में कह देती हैं। यही सादगी उनके कलाम को आम पाठक और सुनने वाले के दिल तक पहुंचाती है।
प्रियंवदा ज़िंदगी के बारे में कहती है ज़िन्दगी बदलाव का नाम है, अगर ज़िंदगी में कोई रहनुमा न हो, तो इंसान कभी-कभी सही रास्ते से भटक भी सकता है। इसी लिए जो शख़्स हमारी नज़र और सोच का रुख़ हमेशा रौशनी की तरफ़ रखे, वही असल मायने में टीचर, उस्ताद या गुरु कहलाने का हक़दार है।
उर्दू शायरी में शागिर्द और उस्ताद की रवायत एक लंबे अरसे से चली आ रही है, दर अस्ल अदब और कला की हर सिन्फ़ में ये रवायत रही है चाहे वो फ़िलॉसफ़ी हो या मौसिक़ी या शायरी।
“तुम कभी मेरी तरह बरबाद होकर देखना,
मैंने जो इक उम्र देखा उसको पल भर देखना।”
वहीं, मोहब्बत को लेकर उनका अंदाज़ बेबाक भी है। वह कहती हैं कि अगर दिल में इश्क़ है, तो उसका इज़हार होना चाहिए, क्योंकि ज़िंदगी में मोहब्बत जैसा खूबसूरत काम भी होना चाहिए।
“कीजे इज़हार-ए-मोहब्बत चाहे जो अंजाम हो,
ज़िंदगी में ज़िंदगी जैसा कोई तो काम हो।”
प्रियंवदा की शायरी में जुदाई और इंतज़ार का दर्द भी बड़ी खूबसूरती से दिखाई देता है। कभी आंसू सितारों की तरह नज़र आते हैं, तो कभी किसी को अपना बनाने में पूरी उम्र लग जाने की बात सामने आती है।
“जो कहकशां सी नज़र आती हैं मेरी आंखें,
गुज़िश्ता शब के ये आंसू हैं जो सितारे हुए।”
“ज़रा सी बात नहीं है किसी का हो जाना,
कि उम्र लगती है बुत को ख़ुदा बनाने में।”
उनकी शायरी सिर्फ़ मोहब्बत की बात नहीं करती, बल्कि रिश्तों में मौजूद ख़ामोशी और अनकहे एहसासों को भी आवाज़ देती है। शायद यही वजह है कि उनकी पंक्तियां पढ़ने वाला अपने किसी पुराने एहसास, किसी अधूरी मोहब्बत या किसी ख़ामोश इंतज़ार से जुड़ जाता है।
प्रियंवदा सिंह की शायरी का सबसे खूबसूरत पहलू यही है कि उसमें जज़्बात की सच्चाई, अल्फ़ाज़ की सादगी और एहसास की गहराई साथ-साथ मिलती है। वह पुरानी शायरी की रवायत को अपने अंदाज़ में आगे बढ़ाते हुए आज के दौर की मोहब्बत और रिश्तों को नए लफ़्ज़ देती हैं।
उनका यह शेर शायद इसी एहसास को सबसे ख़ूबसूरत तरीके से बयान करता है।
“अलग बात है ये कि तुम सुन न पाए,
मगर हम ने तुम को पुकारा बहुत है।”
प्रियंवदा सिंह की शायरी उन आवाज़ों में शामिल है जो कम अल्फ़ाज़ में दिल की बड़ी-बड़ी बातें कह जाती हैं। उनकी शायरी में इश्क़ भी है, दर्द भी, तन्हाई भी और उम्मीद भी और यही रंग उसे आज के दौर के पाठकों के लिए ख़ास बनाता है।
ये भी पढ़ें: अमृता प्रीतम: मोहब्बत, तन्हाई और बंटवारे के दर्द की आवाज़
आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।



