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सफ़िया अख़्तर: मोहब्बत, तालीम और अदब की एक नायाब आवाज़

उर्दू अदब में सफ़िया अख़्तर का नाम एक ऐसी ख़ातून के तौर पर याद किया जाता है, जिनकी ज़िंदगी बहुत छोटी रही, लेकिन उनकी फ़िक्र और तहरीर का असर बहुत गहरा था। वह मशहूर शायर असरार-उल-हक़ ‘मजाज़’ की छोटी बहन, शायर जां निसार अख़्तर की शरीके-हयात और मशहूर लेखक जावेद अख़्तर और सलमान अख़्तर की वालिदा थीं। मगर सफ़िया की अपनी पहचान इससे कहीं बड़ी थी। वह एक ज़हीन टीचर, लेखिका, आलोचक और अदब की गहरी समझ रखने वाली ख़ातून थीं।

सफ़िया सिराज-उल-हक़ की पैदाइश उत्तर प्रदेश के रुदौली में हुई। उनका ताल्लुक़ एक पढ़े-लिखे परिवार से था। उनके वालिद चौधरी सिराज-उल-हक़ क़ानून की पढ़ाई कर चुके थे और अपनी बेटियों की तालीम को लेकर बेहद संजीदा थे। सफ़िया की शुरुआती तालीम घर पर ही हुई, जहां उन्हें उर्दू, फ़ारसी और अंग्रेज़ी पढ़ाई गई। उनके भाई मजाज़ भी उनकी पढ़ाई में मदद करते थे।

उस दौर में लड़कियों के लिए ऊंची तालीम हासिल करना आसान नहीं था, लेकिन सफ़िया ने इस मुश्किल को अपने रास्ते की रुकावट नहीं बनने दिया। पिता के तबादलों की वजह से उनकी पढ़ाई अलग-अलग शहरों में हुई। उन्होंने करामत हुसैन मुस्लिम गर्ल्स कॉलेज में पढ़ाई की और बाद में अलीगढ़ में अपनी तालीम जारी रखी। आगे चलकर उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की और तालीम के क्षेत्र में अपना करियर बनाया।

सफ़िया सिर्फ़ पढ़ने में ही होशियार नहीं थीं, बल्कि उनमें एक गहरी अदबी समझ भी थी। वह तरक़्क़ीपसंद ख़यालात रखती थीं और उस दौर में अपने पैरों पर खड़े होने वाली उन चुनिंदा औरतों में शामिल थीं, जिन्होंने नौकरी भी की और अपने घर-परिवार की ज़िम्मेदारियां भी निभाईं।

जां निसार अख़्तर से मुलाक़ात और निकाह

जां निसार अख़्तर, सफ़िया के भाई मजाज़ के दोस्त थे। अलीगढ़ के दौर में जां निसार  और सफ़िया की मुलाक़ात हुई। सफ़िया उनके शायराना मिज़ाज और शख़्सियत से मुत्तासिर हुईं, लेकिन दोनों के रिश्ते को मंज़िल तक पहुंचने में कुछ वक़्त लगा।

आख़िरकार दोनों के बीच ख़तों का सिलसिला शुरू हुआ और इसी के ज़रिए उनकी मोहब्बत और एक-दूसरे को समझने का रिश्ता गहरा होता गया। कुछ समय बाद दोनों का निकाह हो गया। यह रिश्ता सिर्फ़ मोहब्बत का रिश्ता नहीं था, बल्कि दो अदबी और ज़हीन शख़्सियतों की साझेदारी भी थी।

मोहब्बत के ख़त और जुदाई का दर्द

1949 में जां निसार अख़्तर फ़िल्मी दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए बंबई चले गए। सफ़िया वहीं रहकर अपनी नौकरी करती रहीं और अपने बच्चों की परवरिश के साथ-साथ पति की भी आर्थिक मदद करती रहीं। दूरी बढ़ी तो ख़तों का सिलसिला भी तेज़ हो गया।

सफ़िया जां निसार को अक्सर ख़त लिखा करती थीं। कभी एक हफ़्ते में कई-कई ख़त भी चले जाते। इन ख़तों में सिर्फ़ मोहब्बत नहीं थी, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी, बच्चों की परवरिश, नौकरी की परेशानियां, घर के हालात, उम्मीदें और कभी-कभी गहरा दुख भी शामिल था।

यही ख़त आगे चलकर सफ़िया की सबसे बड़ी अदबी पहचान बने। उनकी भाषा बेहद सादी, दिल को छू लेने वाली और पुरअसर थी। वह मामूली-सी बात को भी इस अंदाज़ में लिखती थीं कि वह एक अदबी तजुर्बा बन जाती थी।

एक औरत की जद्दोजहद

सफ़िया की ज़िंदगी को सिर्फ़ एक शायर की बीवी या मशहूर लेखकों की मां के तौर पर देखना उनके साथ नाइंसाफ़ी होगी। उन्होंने ऐसे दौर में अपनी पहचान बनाई जब औरतों के लिए तालीम हासिल करना और नौकरी करना भी आसान नहीं था।

उन्होंने अपनी पसंद से जीवनसाथी चुना, तालीम हासिल की, नौकरी की और अपने परिवार की ज़िम्मेदारियां उठाईं। जब जां निसार मुंबई में अपने अदबी और फ़िल्मी करियर को संवारने की कोशिश कर रहे थे, उस वक़्त सफ़िया ने घर और बच्चों को संभालने के साथ उन्हें आर्थिक सहारा भी दिया।

उनके दो बेटे जावेद और सलमान अख़्तर थे। जावेद अख़्तर ने बहुत कम उम्र में अपनी मां को खो दिया, लेकिन बाद की ज़िंदगी में उन्होंने कई बार अपनी वालिदा की ज़हीन और नायाब शख़्सियत का ज़िक्र किया।

सफ़िया की अदबी विरासत

सफ़िया अख़्तर को अपनी ज़िंदगी में अपनी अदबी सलाहियत दिखाने का बहुत ज़्यादा मौक़ा नहीं मिला। उनकी उम्र छोटी थी, लेकिन उनकी तहरीरों ने उन्हें उर्दू अदब में एक अलग मुक़ाम दिया।

उनके ख़त बाद में दो किताबों की शक्ल में सामने आए—‘हर्फ़-ए-आश्ना’ और ‘ज़ेर-ए-लब’। इसके अलावा उनका निबंध-संग्रह ‘अंदाज़-ए-नज़र’ भी उनकी अदबी सलाहियत की मिसाल है।

इन ख़तों में सफ़िया की शख़्सियत कई रंगों में सामने आती है। कहीं वह मोहब्बत करने वाली शरीके-हयात हैं, कहीं अपने बच्चों की फ़िक्र करने वाली मां, कहीं नौकरीपेशा औरत, तो कहीं अपने दौर और समाज को गहराई से समझने वाली एक ज़हीन लेखिका।

उनकी बहन हमीदा सलीम भी एक लेखिका थीं और उन्होंने अपने परिवार और भाई-बहनों की ज़िंदगी पर भी लिखा।

छोटी ज़िंदगी, बड़ा असर

सफ़िया अख़्तर एक गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं और 1953 में बहुत कम उम्र में उनका इंतक़ाल हो गया। उनकी ज़िंदगी भले ही लंबी नहीं रही, लेकिन उन्होंने जितना लिखा, उसमें उनकी फ़िक्र, जज़्बात और अदबी सलाहियत साफ़ दिखाई देती है।

सफ़िया के ख़त सिर्फ़ एक बीवी के अपने शौहर के नाम लिखे हुए ख़त नहीं हैं। ये एक ऐसी औरत के दिल की आवाज़ हैं, जो मोहब्बत करती है, अपने परिवार के लिए जद्दोजहद करती है, मुश्किल हालात का सामना करती है और फिर भी अपने ख़याल और क़लम को ज़िंदा रखती है।

‘हर्फ़-ए-आश्ना’ और ‘ज़ेर-ए-लब’ ने सफ़िया अख़्तर की उस आवाज़ को महफ़ूज़ कर दिया, जिसे शायद वक़्त ने बहुत जल्दी ख़ामोश कर दिया था। अगर उन्हें ज़िंदगी कुछ और मोहलत देती, तो मुमकिन था कि उर्दू अदब को उनकी क़लम से कई और नायाब तहरीरें मिलतीं। आज भी उनकी तहरीरों में मोहब्बत, हिम्मत, जुदाई और एक औरत की अपनी पहचान की तलाश एक साथ दिखाई देती है।

ये भी पढ़ें: अमृता प्रीतम: मोहब्बत, तन्हाई और बंटवारे के दर्द की आवाज़

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