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Komal Library: कश्मीर की मुफ़्त कम्युनिटी लाइब्रेरी, जो 3 दशक से कर रही सिख समुदाय की ख़िदमत

कभी पढ़ाई के लिए एक शांत कोना तलाशते हुए सेहज कौर Komal Library (कोमल लाइब्रेरी) पहुंची थी। शायद तब उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि ये जगह सिर्फ़ उनकी पढ़ाई का हिस्सा नहीं बनेगी, बल्कि उनकी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा बन जाएगी। श्रीनगर के बघाट बरज़ुल्ला में गुरुद्वारा शहीद बुंगा साहिब के परिसर में मौजूद ये लाइब्रेरी सेहज को एक पुरसुकून माहौल देती थी। यहां किताबें थी, पढ़ाई का सामान था और अपने समुदाय के दूसरे युवाओं से मिलने-बात करने का मौक़ा भी।

रोज़मर्रा की भागदौड़ से दूर, सेहज अक्सर अपना वक़्त यहीं गुज़ारती थी। एक साल बाद उनका इस जगह से रिश्ता सिर्फ़ एक मेंबर का नहीं रहा। उन्होंने वॉलंटियर के तौर पर काम करना शुरू किया। रीडिंग सेशन, कम्युनिटी प्रोग्राम और युवाओं के लिए होने वाली एजुकेशनल एक्टिविटीज में वो मदद करने लगी।

सेहज, जो आज साइकोलॉजी में बैचलर्स की पढ़ाई कर रही हैं, कहती हैं, “इस लाइब्रेरी ने मेरी दो तरह से मदद की। मुझे अपनी पढ़ाई के लिए ज़रूरी किताबें मिलीं और साथ ही कम्युनिटी सर्विस से जुड़ने का मौक़ा मिला। इन दोनों चीजों का मेरी ज़िंदगी में बहुत अहम रोल रहा है।” लेकिन Komal Library (कोमल लाइब्रेरी) की कहानी सेहज से कहीं पुरानी है। इसके पीछे एक विद्वान की याद और इल्म को आगे बढ़ाने की सोच है।

एक विद्वान की याद में शुरू हुआ इल्म का ये सफ़र

साल 1994 में शुरू हुई Komal Library (कोमल लाइब्रेरी) का नाम ज्ञानी करतार सिंह कोमल के नाम पर रखा गया था। वो कश्मीर के जाने-माने सिख विद्वान, लेखक और एडिटर थे। उर्दू अदब और पत्रकारिता में उनका अहम मुकाम था। 1960 के दशक में उन्होंने उर्दू अखबार करमवीर शुरू किया और उसके एडिटर रहे। 1992 में उनके इंतकाल के बाद सिख समुदाय के लोगों ने उनकी याद में एक पब्लिक लाइब्रेरी शुरू करने का फैसला किया। सोच साफ़ थी—एक ऐसे शख़्स को किताबों और इल्म से बेहतर श्रद्धांजलि और क्या हो सकती है, जिसने अपनी ज़िंदगी लिखने-पढ़ने में गुज़ारी हो।

Credit: DNN24/Amir Ali Bhat

लाइब्रेरी के मौजूदा इंचार्ज जगजीत सिंह कहते हैं, “लाइब्रेरी सिख समुदाय की खिदमत के लिए शुरू की गई थी। हमारा मक़सद था कि स्टूडेंट्स को किताबें मिलें और उनके पास पढ़ने के लिए एक पुरसुकून जगह हो।”उस दौर में कश्मीर मुश्किल हालात से गुज़र रहा था। एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स अक्सर बंद रहते थे और पढ़ाई का ज़रूरी सामान हासिल करना आसान नहीं था। ऐसे वक़्त में Komal Library (कोमल लाइब्रेरी) कई स्टूडेंट्स के लिए एक सहारा बन गई।

किताबों के बीच बैठे कई सपने आज हक़ीक़त हैं

इस लाइब्रेरी की सबसे ख़ूबसूरत कहानी शायद उन स्टूडेंट्स में छिपी है, जिन्होंने कभी यहां बैठकर अपने भविष्य के सपने देखे थे। जगजीत सिंह बताते हैं कि यहां पढ़ने वाले कई स्टूडेंट्स आज डॉक्टर, इंजीनियर, सिविल सर्वेंट, टीचर और दूसरे प्रोफ़ेशनल बन चुके हैं। कई भारत और विदेशों में काम कर रहे हैं। और जब ये लोग कश्मीर लौटते हैं, तो अपनी पुरानी यादों की इस जगह को भूलते नहीं। वो लाइब्रेरी ज़रूर आते हैं। शायद इसलिए क्योंकि कुछ जगहें सिर्फ़ जगह नहीं होती। वो आपकी ज़िंदगी के उस दौर को संभालकर रखती हैं, जब सपने छोटे थे, लेकिन उन्हें पूरा करने का हौसला बड़ा था।

Credit: DNN24/Amir Ali Bhat

मोबाइल के दौर में किताबों को बचाने की कोशिश

आज जब दुनिया की सारी जानकारी मोबाइल की स्क्रीन पर मौजूद है, किताबों से रिश्ता बनाए रखना आसान नहीं रहा। जगजीत सिंह कहते हैं, “बच्चों के पास आज जानकारी उनकी उंगलियों पर है, लेकिन वो किताबों को कम वक़्त देते हैं। लाइब्रेरी उन गिनी-चुनी जगहों में से हैं, जो पढ़ने की आदत को ज़िंदा रख सकती हैं।” इसीलिए Komal Library (कोमल लाइब्रेरी) सिर्फ़ किताबें रखने तक सीमित नहीं है। युवाओं को पढ़ने के लिए मोटिवेट करने के नए तरीके भी अपनाए जाते हैं।

पिछले साल ऐलान किया गया कि जो शख़्स एक साल में 15 किताबें पूरी पढ़ेगा, उसे कैश प्राइज दिया जाएगा। लेकिन असल मक़सद इनाम नहीं था। जगजीत कहते हैं, “हम चाहते थे कि स्टूडेंट्स लगातार पढ़ने की आदत डालें।” हर हफ़्ते होने वाला डिजिटल डिटॉक्स सेशन भी इसी कोशिश का हिस्सा है। कुछ घंटों के लिए स्टूडेंट्स से फोन अलग रखने को कहा जाता है। फिर किताबें पढ़ी जाती हैं, बातचीत होती है और लिखा जाता है। शुरुआत में ये बच्चों को मुश्किल लगता है, लेकिन सेशन के आख़िर तक उन्हें खुद महसूस होता है कि कुछ वक़्त स्क्रीन से दूर रहना कितना सुकून देता है।

जहां किताबों के साथ हुनर भी तलाशे जाते हैं

Komal Library (कोमल लाइब्रेरी) में सिर्फ़ पढ़ाई नहीं होती। यहां बच्चों को अपनी दूसरी खूबियां और हुनर पहचानने का मौका भी मिलता है। बैसाखी के दौरान हर साल एक हफ़्ते का खालसा वीक आयोजित किया जाता है। इसमें लेक्चर, फोटोग्राफ़ी कॉम्पिटिशन, पेंटिंग, निबंध लेखन, डिबेट, क्विज़ और स्पोर्ट्स जैसी कई एक्टिविटीज होती हैं। जगजीत सिंह कहते हैं, “हमारा मकसद युवाओं की बौद्धिक, व्यक्तिगत, रूहानी और जज़्बाती तरक्की में मदद करना है।”

सेहज खुद इस सफ़र का हिस्सा रही हैं। उन्होंने खालसा वीक में पहले एक स्टूडेंट के तौर पर हिस्सा लिया और फिर वॉलंटियर बनकर इन प्रोग्राम्स को आयोजित करने में मदद करने लगी। आज जब वो छोटे स्टूडेंट्स को इन एक्टिविटीज में हिस्सा लेते देखती हैं, तो उन्हें खुशी होती है।

Credit: DNN24/Amir Ali Bhat

जहां किताबों के साथ आत्मविश्वास भी मिलता है

सेहज के लिए Komal Library (कोमल लाइब्रेरी) की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती शायद इसकी किताबें नहीं, बल्कि यहां बने रिश्ते हैं। वो कहती हैं, “हम यहां किताबों, करंट अफेयर्स, सामाजिक मुद्दों और बहुत से दूसरे विषयों पर बात करते हैं। इन बातचीत ने मेरी सोच का दायरा बढ़ाया है और मुझे अपने विचार कॉन्फिडेंस के साथ रखने में मदद की है।” कोमल लाइब्रेरी की मेंबरशिप मुफ़्त है और ये पूरी तरह कम्युनिटी की मदद से चलती है। यहां पढ़ चुके कई पुराने स्टूडेंट्स, जो आज अपनी ज़िंदगी में कामयाब हैं, लाइब्रेरी के लिए पैसे देते हैं।

इसी मदद से नई किताबें, मैगज़ीन, अख़बार और एजुकेशनल मैटेरियल खरीदे जाते हैं। जगजीत सिंह ने DNN24 को बताया कि “ये लाइब्रेरी कम्युनिटी की है। यहां रखी हर किताब किसी की मदद और इस यकीन की निशानी है कि तालीम लोगों की ज़िंदगी बदल सकती है।” 1994 में रखी गई किताबों की ये दुनिया आज तीन दशक से ज़्यादा का सफ़र तय कर चुकी है। Komal Library (कोमल लाइब्रेरी) अब सिर्फ़ एक लाइब्रेरी नहीं, बल्कि उस सोच की ज़िंदा मिसाल है जिसमें एक किताब किसी एक इंसान की ज़िंदगी बदल सकती है, और एक लाइब्रेरी पूरी कम्युनिटी की।

ये भी पढ़ें: सरस्वती महल पुस्तकालय: एशिया की सबसे पुरानी लाइब्रेरी में से एक तमिलनाडु की विरासत का अनमोल ख़ज़ाना 

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Aamir Ali Bhat
Aamir Ali Bhat
आमिर अली भट कश्मीर में Banyan Infomedia के ब्यूरो चीफ और स्पेशल कॉरेस्पोंडेंट के तौर पर काम करते हैं।

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