एक छोटे से कमरे में टूटे कूलर और कबाड़ हो गयी चीज़ों के बीच बैठा एक आदमी है – हुलिए और वेशभूषा से वह आपको मोची, दरजी, सब्जीवाला – कुछ भी लग सकता है। फिर वह अपनी जुबान खोलता है. आप पाते हैं वह सुरों का विद्वान है। उसे संगीत के इतिहास की बाबत वह सब मालूम है जिस पर विश्वविद्यालयों के शोध कराये जाते हैं।
ध्रुपद की आदिम शुरुआतों के बारे में पूरे ऐतमाद से बात करता एक उस्ताद गवैया है जिसकी बातचीत में संस्कृत के शब्द आसानी से आवाजाही करते हैं। एक युवा लोकगायक है जो खानकाहों-दरगाहों में भटकता हुआ सूफी रहस्यवाद पर गहरी बातें करता है और मेहदी हसन की लगाई तानों-मुरकियों की जटिलता को भी समझता है।
ग्वालियर घराने का नब्बे साल का एक खलीफा गायक जब एक राग और उसके कंटेंट की तकनीकी तफसीलें बताने के बाद उसे परफॉर्म करता है तो आपके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। दिल्ली घराने का एक बहुत बड़ा गायक भगवान राम के लंका प्रयाण पर बनाई गयी बंदिश सुनाता है तो आप हैरत करने लगते हैं कि अभी और क्या-कितना है जो आपको नहीं मालूम।
फिर एक अंधी लड़की है जो ध्रुपद सीखने भोपाल आती है और बरसों अपने गुरु की संगत में साधना करती है– हड़प्पा-मोहनजोदाड़ो के खंडहरों के फोटोग्राफ स्क्रीन पर उभरते हैं और उसकी पकी हुई ईमानदार आवाज में गणेश वन्दना सुनाई देती है।
उस्ताद हैं, आलोचक हैं, संगीतमर्मज्ञ हैं, उस के इतिहासकार हैं और शास्त्रीय संगीत को पहनने-ओढ़ने वाले आम जन हैं जिनकी बातें पीर-औलियों के वचनों जैसी सुनाई पड़ती हैं। और ज़िक्र है बड़े गुलाम अली खान साहब का, नुसरत, नज़ाकत अली-सलामत अली का, फरीदा खानम-इकबाल बानो का और एक स्टूडियो में साजिंदों से घिरी बैठीं जहांआरा बेगम का जिनकी पकी हुई आवाज और नाक में जड़ी हीरे की कनी की चमकदार लपक के बीच फर्क करना मुश्किल हो जाता है कि कौन ज्यादा पायेदार है।
साल 2006 है और कराची के एक हॉल में शंकर-जयकिशन को खिराज-ए-अकीदत पेश की जा रही है – एक से एक खूबसूरत अमेच्योर स्त्री-पुरुष गायक हिन्दी फिल्मों के एक से एक नायाब गीत गा रहे हैं – “ओ दुनिया के रखवाले!”।
उस्ताद के साथ मौसीकी के शुरुआती सबक सीख रहा एक खूबसूरत किशोर है, अपने कद से दूनी लम्बाई का सितार बजा रहा एक और छोटा सा गायक बच्चा है जिसे लाख दुआएं देने की हसरत भी होती है और अपना बेटा कहने की भी।
आख़िर में सिगरेट पर सिगरेट फूंकने वाला एक बूढ़ा वकील है जिसकी किताबों की शेल्फों के बीच सरस्वती की प्रतिमा है, मकबूल फ़िदा हुसैन का बनाया एक चित्र और लेनिन की किताबें हैं। आपको बताया जाता है कि पैंतीस सालों से सागरवीणा नाम के एक साज़ को तैयार कर रहे इस खब्ती इंसान का साथ बिबली नाम की उसकी बेटी ने दिया है जिसके साथ वह अपने घर की वर्कशॉप में एक मशीन पर झुका सागरवीणा के चांदी और तांबे के तारों पर बजने वाले ‘सा’ को क्लीन कर रहा है। बिबली कोई बच्ची नहीं पके बालों वाली एक आलीशान स्त्री है जो बड़े-बड़े समारोहों में सागरवीणा परफॉर्म करती है। पन्द्रह-बीस मिनटों के वक्फे में यह बूढ़ा वकील आपको भारतीय शास्त्रीय संगीत की परम्पराओं-जटिलताओं और समस्याओं के बारे में इतना बता देता है कि आप छोटे-मोटे एक्सपर्ट की हैसियत से भाषण देने लायक हो जाते हैं।
साल 2007 में एक डॉक्यूमेंट्री रिलीज हुई थी ‘ख़याल दर्पण’. दिल्ली में रहने वाले स्वतंत्र फिल्मकार यूसुफ़ सईद की इस तारीखी फिल्म को मैंने ‘ला स्त्रादा’, ‘शोले’ और ‘गॉडफादर’ से भी अधिक दफा देखा है। विभाजन के कारण हमारे उपमहाद्वीप की सदियों पुरानी शास्त्रीय संगीत-परंपरा को कितने दचके-सदमे लगे और उसके बावजूद अभी क्या-क्या बचा हुआ है जिसे समेटा जा सकता है – ऐसे सवालों से रू-ब-रू कराती ‘ख़याल दर्पण’ अपने आप में एक मुकम्मल कविता की तरह रची गयी है।
यूसुफ़ सईद ने यह पूरी फिल्म पाकिस्तान जा कर शूट की, कितने ही लोगों के इंटरव्यू किये, दुर्लभ तस्वीरें और फुटेज हासिल कीं और एक मास्टरपीस रचा।
‘ख़याल दर्पण’ खुले हुए घाव पर धरा गया रुई का मुलायम फोहा है, एक रुलाई है जो हमारे सीनों-गलों में जाने कब से फांस की तरह अटकी हुई है। इन सबसे ऊपर यह फिल्म दुनिया को बदसूरत बनाने वाली हर कोशिश के मुंह पर जड़ा गया तमाचा है। अपने को इंसान समझने वाले हर जिम्मेदार नागरिक ने इस सुरीले आईने के लिए अपने जीवन से सौ मिनट निकालने ही चाहिए।
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