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किताबों से प्यार करने वाले एक अनपढ़ सम्राट की दास्तान

दुनिया का पहला छापाखाना 1440 में जर्मनी के एक सुनार योहान गुटेनबर्ग ने बनाया था। उसकी बनाई प्रिंटिंग मशीन एक दिन में करीब साढ़े तीन हजार पन्ने छाप सकती थी। उसके कुछ शताब्दी पहले से किताबों की नक़ल बनाने का काम हाथ की छपाई से होता था। इसकी मदद से दिन भर में चालीस पन्ने छपा करते थे। उसके पहले हाथ से लिख कर किताबों की नकलें बनाई जाती थीं। अच्छे नकलकार एक दिन में अच्छे हस्तलेख में आधे से लेकर एक पन्ने की नक़ल कर पाते थे। मानव इतिहास की सबसे शुरुआती किताबें इन्हीं नकलकारों की मेहनत के कारण बची रह सकीं।

आज से कोई बारह सौ साल पहले समूचे पश्चिमी यूरोप पर सम्राट शार्लेमेन यानी चार्ल्स प्रथम (742 -814 ईस्वी) का एकछत्र राज चलता था। उसे नेपोलियन से पहले यूरोप का महानतम शासक गिना जाता है।

पिता की मृत्यु के बाद वह फ्रैंक साम्राज्य का शासक बना और अगले चार दशकों में उसने पश्चिमी यूरोप के विशाल भूभाग को अपने अधीन कर लिया। उसके शासन में आज के फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम, नीदरलैंड्स, स्विट्ज़रलैंड, ऑस्ट्रिया तथा उत्तरी इटली के बड़े हिस्से शामिल थे। 25 दिसंबर 800 ईस्वी को रोम में पोप लियो तृतीय ने उसे रोमनों का सम्राट घोषित किया इस घटना को पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पुनर्जागरण का प्रतीक माना जाता है और यहीं से आगे चलकर पवित्र रोमन साम्राज्य की नींव पड़ी।

उसे अक्सर यूरोप का जनक कहा जाता है, क्योंकि उसके शासन ने मध्यकालीन यूरोप की राजनीतिक और सांस्कृतिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया। उसके जीवन का एक दूसरा दिलचस्प पहलू भी था।

अपनी विजय यात्राओं के दौरान शार्लेमेन का सामना अनेक तरह की संस्कृतियों और उनके साहित्य से हुआ। अनगिनत लड़ाइयां लड़ते-लड़ते पता नहीं कैसे उसके भीतर पुस्तकों के प्रति अनुराग पैदा हो गया। उसने अपने दरबार में किताबों की प्रतिलिपियां बनाने के उद्देश्य से अनेक पढ़े-लिखे लोगों को नियुक्त किया।

शुरू में शार्लेमेन ने नकलकारों को धर्मग्रंथों के अलावा व्याकरण और संगीत के ग्रंथों की नकलें बनाने को कहा। उसके बाद उसने इन ग्रंथों के स्थानीय भाषाओं में अनुवाद भी करवाए। बड़े पैमाने पर किये गए इस कार्य का परिणाम यह हुआ कि यूरोप की सभी उपलब्ध किताबें उसके दरबार की लाइब्रेरी का हिस्सा बन गईं। बाद में उसने कला, साहित्य, विज्ञान और दर्शन की तमाम किताबों की प्रतिलिपियां भी तैयार करवाईं। उसके उत्साह का परिणाम था कि यूरोप में व्यक्तिगत पुस्तकालयों का खूब चलन हो गया जहां से बड़ी रकम चुकाकर किताबें उधार ली जा सकती थीं।

शार्लेमेन का शासनकाल यूरोप की पहली सांस्कृतिक और शैक्षिक क्रान्ति का काल माना जाता है। उसका मानना था कि अच्छी शिक्षा से ही किसी समाज की तरक्की के दरवाजे खुलते हैं। शुरूआती जीवन से ही युद्धों में भाग लेते रहने के कारण वह खुद कभी शिक्षित न हो सका। पॉल एडुआर्ड और पी. डटन की किताब ‘शार्लेमेन्स मुस्टाश एंड अदर कल्चरल क्लस्टर्स ऑफ़ अ डार्क एज’ में जिक्र है कि उसने पचास साल की आयु में अपने लिए अध्यापक नियुक्त किये जो उसे व्याकरण, तर्कशास्त्र, खगोलशास्त्र और अंकगणित के पाठ पढ़ाते थे। जब भी समय मिलता वह अपने सेवकों से अपनी पसंदीदा किताबें पढ़कर सुनाने को कहता।

किताबों को यूरोप के जनजीवन का हिस्सा बना देने वाले अपनी तरह के इस इकलौते खब्ती बादशाह को आखिर तक न खुद लिखना आ सका, न पढ़ना।

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Ashok Pande
Ashok Pandehttp://kabaadkhaana.blogspot.com
अशोक पांडे चर्चित कवि, चित्रकार और अनुवादक हैं। उनका प्रकाशित उपन्यास ‘लपूझन्ना’ काफ़ी सुर्ख़ियों में रहा है। पहला कविता संग्रह ‘देखता हूं सपने’ 1992 में प्रकाशित। जितनी मिट्टी उतना सोना, तारीख़ में औरत, बब्बन कार्बोनेट अन्य बहुचर्चित किताबें। कबाड़खाना नाम से ब्लॉग kabaadkhaana.blogspot.com। अभी हल्द्वानी, उत्तराखंड में निवास।

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