18वीं सदी के बीच तक पंजाब के सिखों के पास कोई एक मज़बूत सियासी क़यादत नहीं थी। हालां कि तरना दल, बुढ़ा दल और दल खालसा ने सिखों को एक अलग पहचान और संगठन दिया था, लेकिन मिसल दौर में सिखों की सियासी एकता अब्दाली के हमलों के सामने ज़्यादा देर तक कायम नहीं रह सकी। अहमद शाह अब्दाली ने पंजाब पर आठ बार हमले किए। इन हमलों से पंजाब की ज़िंदगी और अर्थव्यवस्था बुरी तरह तबाह हो गई। छोटा घल्लूघारा और बड़ा घल्लूघारा इस बात के गवाह हैं कि उस दौर में पंजाब में सिखों का खुलेआम बड़े पैमाने पर क़त्लेआम किया गया।
ऐसे मुश्किल दौर में शुकरचकिया मिसल के सरदारों—बुद्ध सिंह, नौध सिंह, चढ़त सिंह, महासिंह और बाद में Maharaja Ranjit Singh (महाराजा रणजीत सिंह) ने पंजाब के अलग-अलग हिस्सों को एक साथ जोड़ने में अहम किरदार अदा किया। उन्होंने बिखरे हुए पंजाब को एक मज़बूत ताक़त में बदलने की कोशिश की। साल 1799 में Maharaja Ranjit Singh (महाराजा रणजीत सिंह) ने भंगी सरदारों को लाहौर से बाहर कर दिया और लाहौर को अपनी हुकूमत का केंद्र बनाया। इसके बाद उन्होंने गोबिंदशाही और नानकशाही सिक्के जारी किए और एक आज़ाद सिख हुकूमत की बुनियाद मज़बूत की।
इस तरह Maharaja Ranjit Singh (महाराजा रणजीत सिंह) ने अलग-अलग हिस्सों में बंटे पंजाब को एक साथ जोड़कर उसे एक मज़बूत सियासी ताक़त बनाने की तरफ़ बड़ा क़दम उठाया। Maharaja Ranjit Singh (महाराजा रणजीत सिंह) ने अपनी सियासी समझ और दूरअंदेशी से अलग-अलग मिसलों को एक साथ जोड़ा और पूरे पंजाब को अपनी हुकूमत के तहत लाने की योजना बनाई। उन्हें दुनिया भर में सिख साम्राज्य के संस्थापक, एक महान फौजी रणनीतिकार और माहिर हुक्मरान के तौर पर जाना जाता है।
लेकिन शिक्षा के मैदान में उनके काम की चर्चा बहुत कम होती है। पंजाब की आपस में लड़ने वाली मिसलों को एकजुट करके Maharaja Ranjit Singh (महाराजा रणजीत सिंह) ने एक मज़बूत और स्थिर हुकूमत कायम की। इससे न सिर्फ़ उनकी सियासी और फौजी ताक़त मज़बूत हुई, बल्कि लोगों की भलाई पर भी ध्यान दिया गया।

उनकी कम चर्चित खूबियों में से एक शिक्षा को बढ़ावा देने की कोशिशें भी थी। Maharaja Ranjit Singh (महाराजा रणजीत सिंह) का पक्का यक़ीन था कि शिक्षा लोगों की ज़िंदगी बेहतर बनाने का सबसे असरदार ज़रिया है। हालांकि खुद उन्होंने बहुत कम औपचारिक तालीम मिली थी। उन्होंने छोटी उम्र में ही जंग और हुकूमत की ज़िम्मेदारियां संभाल ली थी। इसके बावजूद वो इल्म और तालीम की ताक़त को अच्छी तरह समझते थे।
इतिहासकारों के मुताबिक, Maharaja Ranjit Singh (महाराजा रणजीत सिंह) के दरबार की सरकारी ज़बान फ़ारसी थी। लेकिन जब महाराजा कोई शाही फ़रमान जारी करते थे, तो वो पहले पंजाबी में लिखा जाता था। इसके बाद उनके दरबारी उस फ़रमान का फ़ारसी में तर्जुमा करते और फिर उसे पूरे राज्य में लागू किया जाता था। इससे पता चलता है कि उनकी दूरअंदेशी सिर्फ़ जंग और हुकूमत चलाने तक महदूद नहीं थी, बल्कि वो समाज में इल्म, तालीम और सोच-विचार को बढ़ावा देने को भी अहमियत देते थे।
जब Maharaja Ranjit Singh (महाराजा रणजीत सिंह) सत्ता में आए, उस वक़्त पंजाब में कोई बाक़ायदा तालीमी निज़ाम मौजूद नहीं था। पढ़ाई-लिखाई का इंतज़ाम ज़्यादातर राजघरानों, अमीर जागीरदारों और ऊंचे तबके तक ही सीमित था। उस दौर की मशहूर तालीमी संस्थाओं में से एक लाहौर का मियां वड्डा मदरसा था। ये मदरसा मशहूर मज़हबी शख्सियत मियां वड्डा के मकबरे से जुड़ा हुआ था। ये संस्था सिख हुकूमत से कई सदियां पहले कायम की गई थी।
यहां ज़्यादातर राजघरानों, अमीरों और असरदार खानदानों के बेटों को कुरआन की तालीम दी जाती थी। इस कमी को समझते हुए महाराजा रणजीत सिंह ने एक ऐसी तालीमी पॉलिसी अपनाई, जिसमें हर मज़हब और हर तबके के लोगों के लिए जगह थी। उन्होंने सरकारी मदद को किसी एक मज़हब तक महदूद नहीं रखा। उन्होंने मकतब, मदरसे, पाठशालाओं और सिख तालीमी मराकज़ को आर्थिक मदद दी।
इसके अलावा, उन्होंने विद्वानों और उस्तादों को जागीरें, वज़ीफे और दूसरी आर्थिक मदद भी दी, ताकि ये तालीमी संस्थाएं अच्छी तरह चलती रहें। उनके दौर में फ़ारसी, पंजाबी, संस्कृत, अरबी और गुरुमुखी जैसी ज़बानों की पढ़ाई को भी बढ़ावा दिया गया। इसके साथ ही, हुकूमत चलाने के लिए ज़रूरी दूसरे विषयों की तालीम पर भी ध्यान दिया गया। ये तालीमी पॉलिसी Maharaja Ranjit Singh (महाराजा रणजीत सिंह) की मज़हबी रवादारी और हर मज़हब को बराबर अहमियत देने वाली सोच को दिखाती है।

अलग-अलग मज़हबी समुदायों की तालीमी संस्थाओं को उनकी तरफ़ से मिलने वाली मदद इस बात का सबूत थी कि उनके राज्य में तालीम किसी एक मज़हब या तबके की जागीर नहीं थी, बल्कि आम लोगों की भलाई का ज़रिया थी। इस तरह महाराजा रणजीत सिंह की हुकूमत 19वीं सदी के पंजाब में तालीम के फैलाव और तरक़्क़ी की तरफ़ एक अहम क़दम साबित हुई।
महाराजा रणजीत सिंह के दौर की तालीम के बारे में हमें जो अहम जानकारी मिलती है, उसका बड़ा हिस्सा ब्रिटिश आलिम और मुसाफ़िर Gottlieb Wilhelm Leitner की मशहूर किताब History of Indigenous Education in the Punjab: Since Annexation and in 1882 से मिलता है। लैट्नर लिखते हैं कि पंजाब में स्कूलों और दूसरी तालीमी संस्थाओं को कायम करने और चलाने के लिए पैसों की कोई कमी नहीं थी। उनके मुताबिक, सिख हुकूमत से पहले पंजाब कई सदियों तक मुग़ल हुकूमत के अधीन रहा था। उस दौर में पंजाब की सबसे मशहूर तालीमी संस्थाएं मदरसे थी। यहां अलग-अलग मज़हबों के बच्चे और नौजवान तालीम हासिल करते थे।
इसी वजह से, महाराजा रणजीत सिंह खुद सिख शासक होने के बावजूद, उन्होंने उस वक़्त के चले आ रहे तालीमी निज़ाम में कोई बड़ी बुनियादी तब्दीली नहीं की। उनके शुरुआती शिक्षा के क्षेत्र में भी बहुत से मदरसे थे, क्योंकि उस दौर में यही सबसे मशहूर और आम तालीमी संस्थाएं थी। महाराजा रणजीत सिंह ने न सिर्फ़ इन मदरसों को खुले दिल से आर्थिक मदद दी, बल्कि लाहौर में अपनी सरपरस्ती में कुछ नए मदरसे भी कायम करवाए। तालीम को बढ़ावा देने का काम सिर्फ़ महाराजा रणजीत सिंह तक ही महदूद नहीं था, बल्कि उनके परिवार ने भी इसमें अहम किरदार अदा किया।
उनकी पत्नी महारानी मोरां सरकार का नाम इस सिलसिले में ख़ास तौर पर लिया जाता है। महारानी मोरां सरकार ने लाहौर में दो मदरसे कायम करवाए। पहला मदरसा उनकी हवेली के पास, लाहौर के चारदीवारी वाले शहर के पापड़ मंडी इलाके में उनकी बनवाई हुई मस्जिद से जुड़ा हुआ था। आज उनकी हवेली मौजूद नहीं है, लेकिन उस मस्जिद में आज भी लड़कियों के लिए एक सादा तालीमी स्कूल चल रहा है। महारानी मोरां सरकार ने दूसरा मदरसा लाहौर के बागबानपुरा में मौजूद 16वीं सदी के मशहूर सूफ़ी संत माधो लाल हुसैन की दरगाह से जुड़ा हुआ कायम करवाया था। ये जगह भी उस दौर में तालीम और मज़हबी-सकाफ़ती इल्म का अहम मरकज़ बन गई थी।
महाराजा रणजीत सिंह के दौर में गुरुकुल और गुरमुखी स्कूल भी कायम किए गए। गुरुकुलों में ज़्यादातर संस्कृत की तालीम दी जाती थी, जबकि गुरमुखी स्कूलों में गुरमुखी यानी पंजाबी ज़बान पढ़ाई जाती थी। इसके अलावा महाजनी स्कूल भी खोले गए। यहां बाज़ार के कामकाज, व्यापार, लेन-देन, हिसाब-किताब और कारोबार से जुड़े दूसरे मामलों की तालीम दी जाती थी।

ये स्कूल ख़ास तौर पर व्यापारी तबके की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर चलाए जाते थे। कई गुरमुखी स्कूल श्री हरमंदिर साहिब की परिक्रमा के आसपास बने बुंगों में चलते थे। ये बुंगे शुरू में हरमंदिर साहिब की हिफ़ाज़त के लिए बनाए गए थे। लेकिन जब वक़्त के साथ इस पवित्र जगह पर हमले और ख़तरे कम हुए, तो इन बुंगों का इस्तेमाल भी बदल गया। बाद में ये जगहें तालीम और इल्म के अहम मरकज़ बन गई।
महाराजा रणजीत सिंह की सरपरस्ती में पूरे सिख साम्राज्य में हुनर और दस्तकारी की तालीम देने वाले मराकज़ भी कायम किए गए। यहां मिनिएचर पेंटिंग, स्केचिंग, नक्शानवीसी, वास्तुकला और ख़ुशनवीसी जैसी कलाओं की तालीम दी जाती थी। उस दौर के हिसाब से एक और ख़ास बात ये थी कि महाराजा रणजीत सिंह की हुकूमत में कई जगहों पर लड़कियों के लिए भी स्कूल खोले गए।
इससे लड़कियों की तालीम को बढ़ावा मिला और समाज में महिला शिक्षा के लिए एक नई राह खुली। इस तरह महाराजा रणजीत सिंह के दौर में तालीम सिर्फ़ किसी एक मज़हब या तबके तक महदूद नहीं रही, बल्कि मज़हबी तालीम से लेकर कारोबार, ज़बान, हुनर और लड़कियों की पढ़ाई तक, अलग-अलग मैदानों में इसके लिए जगह बनाई गई।
सिख साम्राज्य में सिर्फ़ तालीम को बढ़ावा ही नहीं दिया गया, बल्कि लोगों में इल्म हासिल करने की दिलचस्पी भी बढ़ी। लोग अलग-अलग मैदानों में पढ़ाई करने और नया इल्म हासिल करने की तरफ़ आने लगे। लाहौर ज़िला रिपोर्ट, 1860 के मुताबिक, पंजाब पर ब्रिटिश कब्ज़े से ठीक पहले, यानी 1849–50 में सिर्फ़ लाहौर शहर में ही 576 स्कूल मौजूद थे। इनमें करीब 4,225 स्टूडेंट्स तालीम हासिल कर रहे थे। रिपोर्ट के मुताबिक, उस वक़्त पूरे पंजाब में कम से कम 3.3 लाख स्टूडेंट्स अलग-अलग तालीमी संस्थाओं में पढ़ रहे थे। इन संस्थाओं में फ़ारसी, अरबी और संस्कृत के ज़रिए पुराने साहित्य, पुराने क़ानून, तर्क, फ़लसफ़ा और इलाज यानी तिब्ब जैसे विषय पढ़ाए जाते थे।
इसके अलावा, लाहौर में लड़कियों के लिए 18 बाक़ायदा स्कूल भी मौजूद थे। साथ ही हिंदू, मुसलमान और सिख समुदायों से जुड़ी अलग-अलग तालीमी संस्थाएं भी चल रही थी।
इन स्कूलों में सिर्फ़ मज़हबी तालीम नहीं दी जाती थी, बल्कि तकनीकी हुनर, ज़बानें, हिसाब और तर्क जैसे विषयों की भी ऊंचे दर्जे की तालीम दी जाती थी। इन आंकड़ों से पता चलता है कि महाराजा रणजीत सिंह के दौर में पंजाब का तालीमी निज़ाम सिर्फ़ मज़हबी पढ़ाई तक महदूद नहीं था।
इसमें इल्म, फ़लसफ़ा, तिब्ब, हिसाब और तकनीकी हुनर जैसे कई दूसरे मैदानों को भी अहमियत दी जाती थी। हालांकि सिख साम्राज्य में तालीम का काफ़ी फैलाव हो चुका था, लेकिन महाराजा रणजीत सिंह चाहते थे कि इसका फ़ायदा पंजाब के गांवों तक भी पहुंचे। उनकी ख़्वाहिश थी कि अगर गांवों के बच्चे शहरों में रहने वाले अपनी उम्र के बच्चों की तरह बाक़ायदा स्कूल नहीं जा सकते, तो कम से कम वो पढ़ना-लिखना ज़रूर सीखें। इसी मक़सद के लिए महाराजा रणजीत सिंह ने एक अनोखी ‘कायदा’ प्रणाली शुरू की।

इस योजना को तैयार करने की ज़िम्मेदारी उन्होंने अपने पढ़े-लिखे और आलिम सिपहसालार फ़कीर सैयद नूर-उद-दीन को दी। वो साम्राज्य के विदेश मंत्री फ़कीर अज़ीज़-उद-दीन के छोटे भाई थे। फ़कीर नूर-उद-दीन ने इस मक़सद के लिए ‘कायदा नूर’ नाम की एक छोटी किताब तैयार की। इसमें गुरमुखी, शाहमुखी, उर्दू और फ़ारसी के हुरूफ़ और लिखने-पढ़ने की बुनियादी तालीम दी जाती थी। इसके साथ रोज़मर्रा की ज़िंदगी में काम आने वाला बुनियादी हिसाब-किताब भी सिखाया जाता था। इस कायदे की करीब 5,000 प्रतियां तैयार करवाई गईं और उन्हें पूरे पंजाब के नंबरदारों में बांटा गया।
हर नंबरदार को हुक्म दिया गया कि वो तीन महीने के अंदर कायदा नूर पढ़े। इसके बाद उसे इसकी पांच प्रतियां अपने गांव के पांच लोगों को देनी थीं और उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाने में मदद करनी थी। इतना ही नहीं, नंबरदार को खुद महाराजा रणजीत सिंह के नाम एक ख़त लिखकर बताना होता था कि उसने लिखना सीख लिया है और कायदा नूर की पांच प्रतियां दूसरे लोगों में बांट दी हैं। जिन पांच लोगों को नंबरदार से कायदा मिलता था, उन्हें भी यही काम आगे करना होता था। हर शख़्स को कायदे की पांच और प्रतियां आगे पांच लोगों को देनी थीं और उन्हें पढ़ना-लिखना सिखाना था।
इस तरह एक के बाद पांच और फिर पांच लोगों तक पहुंचने वाली एक पूरी कड़ी तैयार हो गई। इस मुहिम के ज़रिए पढ़ाई-लिखाई को गांव-गांव तक पहुंचाने की कोशिश की गई। शुरुआत में कुछ नंबरदारों ने इस काम को गंभीरता से नहीं लिया और महाराजा को अपने ख़त भी नहीं भेजे। महाराजा रणजीत सिंह ने ऐसे नंबरदारों को उनके ओहदों से हटा दिया, ताकि दूसरे नंबरदारों के लिए यह एक मिसाल बने और वे इस तालीमी मुहिम को पूरी ज़िम्मेदारी के साथ आगे बढ़ाएं।
इस तरह ‘कायदा नूर’ सिर्फ़ एक किताब नहीं था, बल्कि गांव-गांव तक पढ़ना-लिखना पहुंचाने की एक बाक़ायदा मुहिम थी। इन तमाम बातों से साफ़ होता है कि महाराजा रणजीत सिंह को तालीम और इल्म वालों से ख़ास लगाव और गहरा एहतराम था। हालांकि उनकी हुकूमत की बुनियाद एक मज़बूत फौजी ताक़त पर थी, लेकिन उन्होंने देसी तालीमी निज़ाम और अदब की तरक़्क़ी के लिए भरपूर सरपरस्ती की।उन्होंने तालीमी संस्थाओं को सही तरीके से चलाने के लिए ज़मीन, जागीर और पैसे खुले दिल से दिए। महाराजा रणजीत सिंह ने सिर्फ़ पहले से मौजूद तालीमी संस्थाओं की हिफ़ाज़त और सरपरस्ती ही नहीं की, बल्कि तालीम की तरक़्क़ी के लिए नए और अहम क़दम भी उठाए।

उन्होंने मज़हब, जात या सामाजिक हैसियत के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया और अलग-अलग तालीमी संस्थाओं को आर्थिक मदद दी। राजघराने के बच्चों को अंग्रेज़ी, हिंदी और फ़ारसी जैसी ज़बानों की तालीम दी जाती थी। इससे पता चलता है कि महाराजा रणजीत सिंह का नज़रिया दूरअंदेश था और वो एक से ज़्यादा ज़बानों की तालीम को अहमियत देते थे। उनके दौर में मुसलमानों और दूसरे मज़हबी समुदायों के लोगों को भी तालीम के मैदान में बराबर के मौक़े मिलते थे। वो शिक्षक भी बन सकते थे और स्टूडेंट भी।
महाराजा रणजीत सिंह ने मुसलमानों समेत सभी समुदायों को नए हुनर और इल्म हासिल करने की आज़ादी और मौक़े दिए, ताकि वो अपनी ज़िंदगी बेहतर बना सकें और समाज की तरक़्क़ी में अपना किरदार अदा कर सकें। लेकिन अफ़सोस, 1839 में महाराजा रणजीत सिंह की मौत के बाद हालात बदलने लगे। उनके वारिसों ने तालीम और राज-दरबार की तरफ़ पहले जैसी ख़ास तवज्जो नहीं दी।

कायदा प्रणाली भी जल्द ही बंद कर दी गई। इसके बाद 1849 में पंजाब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के कब्ज़े में चला गया। कुछ ही समय बाद पंजाब में अंग्रेज़ी हुकूमत से जुड़ी अंग्रेज़ी तालीमी व्यवस्था के तहत नए तालीमी मरकज़ और कॉलेज खोले जाने लगे। इस तरह महाराजा रणजीत सिंह के दौर में जिस देसी तालीमी निज़ाम को बढ़ावा मिला था, वह उनकी मौत के बाद धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ गया और अंग्रेज़ी हुकूमत के आने के साथ पंजाब की तालीम का निज़ाम भी एक नए दौर में दाख़िल हो गया।
लेख– असिस्टेंट प्रो रविंदर सिंह
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