उर्दू शायरी की दुनिया में जुरअत का नाम एक ऐसे शायर के तौर पर लिया जाता है, जिन्होंने ग़ज़ल के अंदाज़ और उसके विषयों को एक अलग रंग दिया। उनकी शायरी में इश्क़ सिर्फ़ एहसास नहीं, बल्कि एक जीती-जागती कैफ़ियत और कभी-कभी एक पूरी वारदात बनकर सामने आता है। यही वजह है कि उनके कलाम ने अपने दौर की महफ़िलों में खूब दाद बटोरी।
लखनऊ की महफ़िलों के चहेते शायर
क़लंदर बख़्श के दौर में लखनऊ अदब, संगीत, नृत्य और ऐश-ओ-इशरत की रंगीन महफ़िलों का शहर बन चुका था। दिल्ली से आए मीर और मुसहफ़ी अपने साथ दर्द, रंज-ओ-अलम और पुरानी देहलवी शायरी की रवायत लेकर आए थे। मगर लखनऊ का मिज़ाज बदल चुका था।
यहां की महफ़िलों में माशूक़ की जुदाई में सिर्फ़ आंसू बहाने के बजाय उसके नाज़-ओ-अंदाज़, अदाओं और क़ुर्बत को बयान करने वाली शायरी को भी पसंद किया जाता था। जुरअत ने इसी बदलते हुए मिज़ाज को पहचान लिया।
उनकी शायरी में इश्क़ की तस्वीर ज़्यादा साफ़, शोख़ और ज़िंदगी के क़रीब नज़र आती है। यही वजह थी कि मुशायरों में उन्हें अक्सर ज़बरदस्त दाद मिलती थी। उनकी लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जाता है कि उनका दीवान नवाब आसिफ़-उद-दौला के सिरहाने तक पहुंच चुका था।
कौन थे जुरअत?
जुरअत का मशहूर नाम क़लंदर बख़्श जुरअत था, जबकि उनके असल नाम के बारे में याहिया अमान का उल्लेख मिलता है। उनके वालिद हाफ़िज़ अमान कहलाते थे। उनका परिवार मूल रूप से दिल्ली से जुड़ा हुआ था।
दिल्ली में उस दौर की राजनीतिक उथल-पुथल, जाटों की लूटपाट और बाद में अहमद शाह अब्दाली के हमलों ने शहर की सामाजिक और सांस्कृतिक ज़िंदगी को गहरा नुकसान पहुंचाया। बहुत से संभ्रांत परिवारों की तरह जुरअत का परिवार भी दिल्ली से निकलकर फ़ैज़ाबाद जा बसा।
जुरअत की पैदाइश की सही तारीख़ निश्चित रूप से मालूम नहीं है, लेकिन आम तौर पर उनकी पैदाइश करीब 1749 ई. के आसपास मानी जाती है।
फ़ैज़ाबाद से लखनऊ तक
फ़ैज़ाबाद में ही जुरअत को शायरी का शौक़ पैदा हुआ। उन्होंने जाफ़र अली हसरत को अपना उस्ताद बनाया और थोड़े ही समय में शायरी में इतनी तरक़्क़ी की कि अपने उस्ताद से आगे निकल गए।
मीर हसन के मुताबिक़, जुरअत को शायरी का ऐसा जुनून था कि वह अक्सर उसी में डूबे रहते थे।
बाद में वह अपने उस्ताद के भाई, नवाब मुहब्बत ख़ान की संगत में रहे। जब अवध की राजधानी फ़ैज़ाबाद से लखनऊ आई, तो जुरअत भी लखनऊ पहुंच गए और शहज़ादा सुलेमान शिकोह से वाबस्ता हो गए। उसी दौर में मुसहफ़ी और इंशा जैसे शायर भी लखनऊ की साहित्यिक दुनिया में सक्रिय थे।
आंखों की रोशनी चली गई, लेकिन शायरी की चमक नहीं
जवानी में ही जुरअत की आंखों में मोतियाबिंद की शिकायत पैदा हुई और धीरे-धीरे उनकी नज़र जाती रही। उनके बारे में यह किस्सा भी मिलता है कि पर्दानशीन घरानों में बे-तकल्लुफ़ी से आने-जाने के लिए उन्होंने ख़ुद को शौक़िया अंधा ज़ाहिर किया था। हालांकि इस बात को ज़्यादा तर एक मशहूर रिवायत या किस्से के तौर पर ही देखा जाता है।
दृष्टि खो देने के बावजूद उनका सामाजिक जीवन सीमित नहीं हुआ। वह दोस्तों और अहबाब से मिलने दूर-दूर तक जाते थे और अपने खुशमिज़ाज तथा मिलनसार स्वभाव की वजह से आम और ख़ास, दोनों में लोकप्रिय थे।
नोक-झोंक भी हुई, मगर दिल में मैल नहीं रखा
जुरअत का मिज़ाज खुशख़ुलक़ और नेकदिल बताया जाता है। अपने दौर के कुछ शायरों से उनकी नोक-झोंक भी हुई।
ज़हूरुल्लाह ‘नवा’ बदायूं से लखनऊ आए थे। एक शेर को लेकर उनका जुरअत से विवाद हुआ और उन्होंने जुरअत पर कड़ी हज्व लिख दी। मामला इतना बढ़ा कि जुरअत के कुछ शागिर्द उनके ख़िलाफ़ खड़े हो गए। मगर बाद में बात संभल गई।
मुसहफ़ी के साथ भी ग़लतफ़हमियों की वजह से नाराज़गी हुई, लेकिन जुरअत ने इन रंजिशों को दिल में नहीं रखा। उनका यह शेर उनके मिज़ाज की ख़ूबसूरत तस्वीर पेश करता है।
रंजिशें ऐसी हज़ार आपस में होती हैं दिला
वो अगर तुझसे ख़फ़ा है, तू ही जा, मिल, क्या हुआ
जुरअत की शायरी का सबसे अलग रंग
जुरअत की सबसे बड़ी पहचान उनकी इश्क़िया शायरी है। उन्होंने ग़ज़ल में इश्क़ के उन पहलुओं को बयान किया जिन्हें उस समय के कई शायर पर्दे में रखते थे।
उनके यहां इश्क़ सिर्फ़ इंतज़ार, हिज्र और आंसुओं का नाम नहीं है। यहां माशूक़ की अदाएं हैं, उसकी क़ुर्बत है, मुलाक़ात है, छेड़छाड़ है और प्रेम की शरारतें भी हैं।
इसी अंदाज़ को बाद में लखनवी शायरी की एक प्रमुख पहचान बनने वाले रंगों में गिना गया। जुरअत ने इश्क़ की भावनाओं को घटनाओं और दृश्यों के ज़रिए बयान किया। इसलिए उनकी शायरी में कैफ़ियत से ज़्यादा वारदात दिखाई देती है।
उस ज़ुल्फ़ पे फबती शब-ए-दीजूर की सूझी
अंधे को अंधेरे में बड़ी दूर की सूझी
जुरअत ने ग़ज़ल के अलावा भी कई तरह की शायरी की। उनके कलाम में ग़ज़ल, रुबाइयां, फ़र्दियात, मुख़म्मस, मुसद्दस, हफ़्त-बंद, तरजीअ-बंद, वासोख़्त, गीत, हज्वियात, मर्सिए, सलाम और फ़ालनामे आदि मिलते हैं।
इलाही क्या इलाक़ा है वो जब लेता है अंगड़ाई
मिरे सीने में सब ज़ख़्मों के टांके टूट जाते हैं
उन्होंने दो मसनवियां भी लिखीं। इनमें एक बरसात की निंदा से संबंधित बताई जाती है, जबकि दूसरी हुस्न-ओ-इश्क़ के विषय पर है, जिसमें ख़्वाजा हसन और बख़्शी तवायफ़ का क़िस्सा बयान किया गया है।
एक अलग मिज़ाज का शायर
जुरअत की शायरी को सिर्फ़ अश्लीलता या शोख़ी के चश्मे से देखना उनके फ़न को सीमित कर देना होगा। उनकी असल अहमियत इस बात में है कि उन्होंने अपने दौर के बदलते सामाजिक और सांस्कृतिक मिज़ाज को शायरी की ज़बान दी।
जुरअत का इंतेकाल करीब 1810 ई. में हुआ, लेकिन उनकी शायरी में मौजूद वह शोखी और बेबाकी आज भी लखनवी शायरी के इतिहास में एक अलग पहचान रखती है।
अहवाल क्या बयां मैं करूं हाए ऐ तबीब
है दर्द उस जगह कि जहाँ का नहीं इलाज
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