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कुंवर महेन्द्र सिंह: जिनकी शायरी में मोहब्बत, इंसानियत और हिंदुस्तानी तहज़ीब की ख़ुशबू 

उर्दू शायरी की दुनिया में कुछ शायर ऐसे है जिनकी पहचान सिर्फ़ उनके अशआर से नहीं, बल्कि उनकी शख़्सियत और उनकी सोच से भी होती है। कुंवर महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’ भी ऐसे ही शायर थे। उनकी शायरी में इश्क़, तन्हाई, दर्द, हास्य और ज़िंदगी के रंग तो मिलते ही हैं, साथ ही हिंदू-मुस्लिम एकता, मोहब्बत और इंसानियत का पैग़ाम भी दिखाई देता है।

उनके अशआर में ज़िंदगी की सच्चाइयों को बेहद सादगी और दिलकश अंदाज़ में पेश किया गया। यही वजह है कि उनका कलाम आज भी उर्दू अदब के चाहने वालों के बीच अपनी जगह रखता है।

शायरी में दर्द भी, मुस्कुराहट भी

‘सहर’ की शायरी में कभी इश्क़ की कसक नज़र आती है तो कभी ज़िंदगी की तल्ख़ हक़ीक़त पर हल्की-सी मुस्कुराहट। उनके ये अशआर उनकी इसी कैफ़ियत को बख़ूबी बयान करते हैं।

“हम उन के सितम को भी करम जान रहे हैं
और वो हैं कि इस पर भी बुरा मान रहे हैं”

वहीं ज़िंदगी की एक दूसरी तस्वीर उनके इन अशआर में दिखाई देती है।

“मुस्कुराना कभी न रास आया
  हर हंसी एक वारदात बनी”

उनके कलाम में महफ़िल, साक़ी, तिश्नगी और इश्क़ जैसे पारंपरिक उर्दू शायरी के रंग भी मौजूद हैं।

“उठा सुराही ये शीशा वो जाम ले साक़ी
फिर इस के बाद ख़ुदा का भी नाम ले साक़ी”

इन अशआर में सिर्फ़ शराब और साक़ी की बात नहीं, बल्कि एक ख़ास अदबी कैफ़ियत और ज़िंदगी के अनुभवों की झलक मिलती है।

मोहब्बत और इंसानियत का पैग़ाम

कुंवर महेन्द्र सिंह की सबसे ख़ास बात उनकी शायरी में दिखाई देने वाली गंगा-जमुनी तहज़ीब थी। उन्होंने अपनी शायरी में मज़हबी दूरियों के बजाय इंसानी रिश्तों और मोहब्बत को अहमियत दी।

उनके कलाम में राम और कृष्ण के प्रति श्रद्धा के साथ पैग़म्बर-ए-इस्लाम हज़रत मोहम्मद से लगाव मोहब्बत का इज़हार भी मिलता है।

“राम और कृष्ण के जीवन से तुझे प्यार मगर
बादा-ए-हुब्ब-ए-मोहम्मद से भी सरशार मगर”

ऐसे अशआर उनके उस नज़रिए को सामने लाते हैं, जिसमें अलग-अलग मज़हबी परंपराएं एक-दूसरे से जुड़ती हुई नज़र आती हैं।

सरकारी नौकरी से अदब तक का सफ़र

कुंवर महेन्द्र सिंह की पैदाइश 9 मार्च 1909 को चक बेदी, ज़िला मोंटगोमरी, पंजाब में हुआ था। मोंटगोमरी अब पाकिस्तान के साहीवाल इलाके का हिस्सा है।

उन्होंने शुरुआती तालीम के बाद चीफ़्स कॉलेज, लाहौर में पढ़ाई की और 1925 के बाद गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर में दाख़िला लिया। उन्होंने इतिहास और फ़ारसी विषयों के साथ बी.ए. किया।

उन्होंने आई.सी.एस. की परीक्षा भी दी, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने सरकारी सेवा का रास्ता अपनाया। लायलपुर में नौकरी के दौरान उन्होंने रेवेन्यू से जुड़ी ट्रेनिंग ली और विभागीय परीक्षाएं पास कीं। बाद में वे फ़र्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट और डिप्टी कमिश्नर जैसे अहम ओहदों पर भी रहे।

करीब 33 साल की सरकारी सेवा के बाद वे 1967 में पंचायती विभाग के निदेशक के पद से रिटायर हुए।

नौकरी से ज़्यादा दिल शायरी में लगा

महेन्द्र सिंह बहुमुखी प्रतिभा के मालिक थे। उन्हें कई चीज़ों का शौक़ था, लेकिन शायरी उनके दिल के सबसे क़रीब थी।

दिलचस्प बात यह है कि वे किसी उस्ताद के बाक़ायदा शागिर्द नहीं थे। उनकी शायरी का सफ़र लंबा नहीं था, लेकिन कम समय में ही उन्होंने उर्दू अदब में अपनी अलग पहचान बना ली।

वे शायरों की हौसला-अफ़ज़ाई करने के लिए भी जाने जाते थे। दिल्ली के ग़ालिब इंस्टिट्यूट और देहली तरक़्क़ी उर्दू बोर्ड से भी उनका जुड़ाव रहा और वे इन संस्थाओं में अहम ज़िम्मेदारियां निभाते रहे।

किताबें और साहित्यिक विरासत

उनकी पहली काव्य-कृति ‘तुलू-ए-सहर’ 1962 में प्रकाशित हुई। ‘सहर’ का मायने ही सुबह या दिन निकलने का वक़्त है, इसलिए उनके तख़ल्लुस और किताब के नाम में भी एक ख़ूबसूरत रिश्ता दिखाई देता है। 

बाद में उनकी आत्मकथात्मक काव्य-कृति ‘यादों का जश्न’ सामने आई, जिसमें उनकी ज़िंदगी और यादों की झलक मिलती है।

फ़िल्मों से भी रहा रिश्ता

बेदी ‘सहर’ सिर्फ़ शायर और सरकारी ऑफ़िसर ही नहीं थे, बल्कि भारतीय फ़िल्मों से भी उनका रिश्ता रहा। उन्होंने ‘मन जीते जग जीत’, ‘दुख भंजन तेरा नाम’ और ‘चरनदास’ जैसी फ़िल्मों का निर्माण किया। ‘मन जीते जग जीत’ में उन्होंने अभिनय भी किया।

‘सहर’ के नाम से आज भी ज़िंदा है विरासत

कुंवर महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’ का निधन 18 जुलाई 1992 को दिल्ली में हुआ। लेकिन एक अच्छे शायर की तरह उनकी आवाज़ उनके जाने के बाद भी उनके कलाम में ज़िंदा रही।

उनकी साहित्यिक सेवाओं को याद करते हुए ‘कुंवर महेन्द्र सिंह बेदी पुरस्कार’ भी दिया जाता है। यह सम्मान हरियाणा उर्दू अकादमी की ओर से प्रदान किया जाता है।

कुंवर महेन्द्र सिंह बेदी ‘सहर’ की शायरी हमें यह याद दिलाती है कि अदब की कोई सरहद नहीं होती। मोहब्बत, इंसानियत और भाईचारे की ज़बान हर दिल तक पहुंचती है। यही उनकी शायरी की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती और उनकी अदबी विरासत की असल पहचान है।

ये भी पढ़ें: राबिया बसरी: मोहब्बत-ए-इलाही की पहली सूफ़ी शायरा 

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