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हसरत मोहानी: जब इंक़लाब के शायर को भा गई कान्हा की बांसुरी

कृष्ण को देखने और समझने के अंदाज़ अलग-अलग हो सकते हैं। कोई उन्हें भगवान मानकर पूजता है, कोई प्रेम का प्रतीक समझता है, कोई उनकी बांसुरी में रूहानी सुकून तलाशता है और कोई उनकी लीलाओं में इंसानी रिश्तों की खूबसूरती देखता है। लेकिन जब एक उर्दू शायर कृष्ण को अपनी मोहब्बत का हिस्सा बना ले, ब्रज की गलियों में उनके दीदार तलाशे और जन्माष्टमी मनाने मथुरा पहुंच जाए, तो यह कहानी सिर्फ़ भक्ति की नहीं रहती। यह हिंदुस्तान की साझा तहज़ीब की कहानी बन जाती है।

हसरत मोहानी का असल नाम फ़ज़लुल हसन था। 1878 में उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के मोहान क़स्बे में पैदा हुए हसरत आगे चलकर उर्दू अदब के बड़े शायर, आज़ादी के बेबाक रहनुमा और सूफ़ियाना मिज़ाज के इंसान के तौर पर पहचाने गए। उनकी शख़्सियत में कई रंग थे, लेकिन उनके बारे में एक बात सबसे ज़्यादा हैरान करती है उनके दिल में कृष्ण के लिए गहरी मोहब्बत थी।

वो कृष्ण को सिर्फ़ शायरी का विषय बनाकर नहीं देखते थे। उनके लिए मथुरा, गोकुल, बरसाना और नंदगांव महज़ ऐतिहासिक या धार्मिक जगहें नहीं थीं। ये उनके लिए इश्क़ की सरज़मीन थीं।

इसी एहसास को उन्होंने अपनी मशहूर नज़्म में कुछ यूं बयान किया।

“मथुरा कि नगर है आशिक़ी का
दम भरती है आरज़ू इसी का”

कितनी सादा, मगर कितनी गहरी बात है। हसरत के लिए मथुरा ‘आशिक़ी का नगर’ है। यानी वो कृष्ण की धरती को सिर्फ़ आस्था से नहीं, बल्कि मोहब्बत की नज़र से देखते हैं।

फिर वो गोकुल की मिट्टी के हर ज़र्रे में कृष्ण के हुस्न की झलक तलाशते हैं।

“हर ज़र्रा-ए-सरज़मीन-ए-गोकुल
दारा है जमाल-ए-दिलबरी का”

यहां कृष्ण किसी एक मंदिर या एक धार्मिक दायरे में सीमित नहीं हैं। उनकी मौजूदगी गोकुल की मिट्टी में है, ब्रज की हवाओं में है और उस लोक-संस्कृति में है जिसे हसरत अपने दिल के बेहद क़रीब महसूस करते थे।

हसरत मोहानी जन्माष्टमी के मौक़े पर मथुरा जाया करते थे। उनके लिए यह सिर्फ़ एक धार्मिक उत्सव में शामिल होना नहीं था। वो उस माहौल को महसूस करना चाहते थे जहां कृष्ण के जन्म की खुशी सदियों से लोकगीतों, झूलों, मंदिरों और ब्रज की गलियों में ज़िंदा रही है।

उनकी नज़्म में बरसाना और नंदगांव का ज़िक्र भी आता है।

“बरसाना-ओ-नंद-गांव में भी
देख आए हैं जल्वा हम किसी का”

यानी कृष्ण की कहानी उनके लिए सिर्फ़ जन्म की कहानी नहीं थी। वो उस पूरे ब्रज को कृष्ण की मोहब्बत से जुड़ा हुआ देखते थे।

कृष्ण की बांसुरी भारतीय कल्पना में प्रेम और रूहानी कैफ़ियत की सबसे ख़ूबसूरत निशानियों में से एक है। हसरत ने भी कृष्ण की बांसुरी की धुन में एक ऐसा पैग़ाम सुना, जो सिर्फ़ एक दौर तक सीमित नहीं था।

“पैग़ाम-ए-हयात-ए-जावेदां था
हर नग़्मा-ए-कृष्ण बांसुरी का”

यानी कृष्ण की बांसुरी का हर नग़्मा उन्हें ज़िंदगी का पैग़ाम महसूस होता है लेकिन हसरत की कृष्ण-भक्ति का सबसे दिलचस्प पहलू उनकी वह रचना है जिसमें वो ब्रज की भाषा के रंग में पूरी तरह डूब जाते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि हसरत की ज़िंदगी का एक दूसरा चेहरा भी था। वो अंग्रेज़ी हुकूमत के मुख़ालिफ़ थे, आज़ादी के लिए जेल गए और हिंदुस्तान की मुकम्मल आज़ादी की आवाज़ उठाने वाले शुरुआती नेताओं में शामिल रहे। उनकी शख़्सियत में इंक़लाब का जज़्बा भी था और सूफ़ियाना मिज़ाज भी।

लेकिन शायद उनकी सबसे ख़ूबसूरत पहचान यह थी कि उनके लिए मोहब्बत की कोई दीवार नहीं थी।

एक तरफ़ उनके अल्फ़ाज़ इंक़लाब की बात करते हैं, दूसरी तरफ़ वही शायर कृष्ण की बांसुरी में ज़िंदगी की आवाज़ सुनता है। एक तरफ़ वो सूफ़ी रिवायत से जुड़े हैं, दूसरी तरफ़ ब्रज की धरती पर कान्हा की तलाश करते हैं। यही हसरत मोहानी को सिर्फ़ एक शायर नहीं, बल्कि हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब की एक ज़िंदा मिसाल बनाता है।

कृष्ण पर लिखने वाले उर्दू शायरों की रिवायत में हसरत का नाम इसलिए भी ख़ास है क्योंकि उन्होंने कृष्ण को दूर खड़े होकर नहीं देखा। उन्होंने मथुरा की ज़मीन, गोकुल की मिट्टी, बरसाने की गलियां और कृष्ण की बांसुरी—इन सबको अपने इश्क़ का हिस्सा बनाया।

उनकी शायरी हमें यह एहसास दिलाती है कि कृष्ण का असर सिर्फ़ धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं रहा। वो लोकगीतों में आए, चित्रकला में आए, संगीत में आए और उर्दू शायरी के अल्फ़ाज़ में भी उतर आए।

जन्माष्टमी पर जब मंदिरों में घंटियां बजती हैं, झूले सजते हैं और कान्हा के जन्म की खुशियां मनाई जाती हैं, तो हसरत मोहानी की शायरी हमें एक और ख़ूबसूरत तस्वीर दिखाती है। एक ऐसी तस्वीर जिसमें एक मुसलमान शायर मथुरा को “आशिक़ी का नगर” कहता है और कृष्ण की बांसुरी में “हयात-ए-जावेदां” यानी हमेशा ज़िंदा रहने वाली ज़िंदगी का पैग़ाम सुनता है।

ये भी पढ़ें: कृष्ण एक नाम, कई नज़रिए… जब उर्दू शायरों ने कान्हा को अपने अल्फ़ाज़ में उतारा

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