अरुणाचल प्रदेश के हरे-भरे लोअर सुबनसिरी घाटी यानी जिरो घाटी में जहां चीड़ के पहाड़ और धान के खेत आपस में गले मिलते हैं, वहां रहती है अपतानी जनजाति। ये वो लोग हैं जिन्होंने अपनी बुनाई को सिर्फ एक हुनर नहीं, बल्कि अपनी रूह का हिस्सा बना लिया है।

प्रकृति की गोद में पली एक कला
जब आप किसी अपतानी शॉल को देखते हैं, तो आपको उसमें मोरपंख या फूल-पत्तियां नहीं दिखेंगी। आपको दिखेंगी सीधी लाइन्स, जियोमेट्री डिज़ाइन और ज़िग-ज़ैग पैटर्न जो इन पहाड़ियों की खूबसूरती को बयां करते हैं। ये रेशम की चमक-दमक से भरी नहीं, बल्कि ज़मीन से जुड़ी एक सादगी लिए हुए हैं।

कौन हैं ये जादूगर बुनकर?
अपतानी समाज में बुनाई सिर्फ औरतों का काम है। मां अपनी बेटी को ये हुनर सिखाती है, जैसे कोई राज़ की बात पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती है। बड़े त्योहारों की बात करें तो द्रे त्योहार जो खेती का जश्न है वहीं म्योको त्योहार दोस्ती और खुशहाली का उत्सव है। इन मौकों पर अपतानी औरतें अपने हाथों बुने कपड़े पहनती हैं। जिग-जाग्रो (शॉल) और सुपुंतारी (जैकेट) ये उनकी पहचान हैं।
इतिहास: मिथक से हकीकत तक
अपतानियों के पास लिखित इतिहास नहीं। उनका इतिहास उनकी ज़बानी दास्तानों में बसा है। मिजी जो पुजारियों के मंत्र, जो रूहानी दुनिया से जोड़ते हैं और मिगुंग ये कहानियां, जो उनके पूर्वजों की यात्रा और बुनाई के जन्म की गवाह हैं। ये कहानियां बताती हैं कि बुनाई का हुनर सदियों पुराना है, और ये सामाजिक दर्जे की पहचान भी है।

जब कुदरत खुद देती है रंग
अपतानी बुनाई की सबसे बड़ी ख़ासियत ये कि ये पूरी तरह से सस्टेनेबल है।
कपास से धागा बनना
- एम्प्या यानी कपास, जो यहां खूब उगती है
- लेखो एक पतली लकड़ी है जिससे बीज अलग किए जाते हैं
- ताफो चरखा है, जिससे धागा बनता है
प्राकृतिक रंग
- तामिन ये गहरा लाल-नारंगी रंग होता है
- संखी का मतलब पीला-भूरा रंग।
ये रंग पेड़ों की छाल, जड़ों और पत्तियों से निकाले जाते हैं। एक पत्ता, एक रंग, एक कहानी कहता है।

करामाती करघा
अपतानी औरतें बैक-स्ट्रैप करघा (पीठ से बंधा करघा) इस्तेमाल करती हैं। ये बांस और लकड़ी से बना एक पोर्टेबल जादू है। करघा का एक सिरा दीवार से बंधा, दूसरा उनकी कमर से। वे अपने शरीर का भार पीछे-आगे करके ताने-बाने को कंट्रोल करती हैं।

कपड़ों के डिज़ाइन
अपतानी कपड़ों में गोलाई नहीं मिलेगी। ये पूरी तरह से सीधी रेखाओं का खेल है।
- सीधी धारियां-अलग-अलग चौड़ाई की
- ज़िग-ज़ैग-पहाड़ी रास्तों की याद
- रंग-काला, लाल, पीला, नीला, नारंगी की जोड़ी
आज की चुनौती और GI टैग की जीत
मगर ये कला आज मुश्किलों में है। नई पीढ़ी शहरों की ओर जा रही है, और मशीनी नकल ने असली बुनकरों की रोज़ी-रोटी पर संकट डाल दिया है। लेकिन… हाल ही में अपतानी बुनाई को GI (ज्याग्राफिकल इंडिकेशन) टैग मिला है। इसका मतलब है कि सिर्फ अपतानी समाज ही ‘अपतानी’ नाम से कपड़ा बेच सकता है। इससे नकल पर रोक लगेगी और बुनकरों को सही कीमत मिल पाएगी।

कपास का धागा और दिल की धड़कन
जब आप किसी अपतानी कपड़े को छूते हैं, तो आप किसी पहाड़ी के दिल की धड़कन को छू रहे होते हैं। आप उस हाथ को छू रहे हैं जिसने कपास को धागा बनाया, उस पत्ती को जिसने रंग दिया, उस ज़मीन को जो इन सबकी मां है।
ये सिर्फ एक कपड़ा नहीं, ये एक पूरी संस्कृति है। जो खुद को बुन रही है, पीढ़ी-दर-पीढ़ी, रेशे-दर-रेशे।
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