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आग़ा जानी कश्मीरी: उर्दू अदब और बॉलीवुड के दरमियान एक नाम

बॉलीवुड की शुरुआती फ़िल्मों में जब भी साहित्यिक और शायराना अंदाज़ की बात होती है, तो आग़ा जानी कश्मीरी का नाम बड़े एहतराम से लिया जाता है। असल नाम सैयद वाजिद हुसैन रिज़वी था, लेकिन फ़िल्मी दुनिया में वे आग़ा जानी कश्मीरी के नाम से मशहूर हुए। 16 अक्टूबर 1908 को लखनऊ की सरज़मीन पर पैदा हुए इस शख़्स ने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा उर्दू अदब और सिनेमा की ख़िदमत में गुज़ारा।

लखनऊ, जो उर्दू तहज़ीब और नफ़ासत का गहवारा माना जाता है, वहीं आग़ा जानी की परवरिश हुई। वे मशहूर उर्दू शायर आरज़ू लखनवी के शागिर्द रहे और यहीं से उन्हें ज़बान की वो मिठास और अदब का वो शऊर मिला, जो आगे चलकर उनकी पहचान बनी।

अभिनय से पटकथा लेखन तक का सफ़र

जवानी के दौर में वे घर से निकल पड़े और 1933 की फ़िल्म शान-ए-सुभान में बतौर अदाकार काम किया। कलकत्ता में भी उन्होंने कुछ फ़िल्मों में छोटे-बड़े किरदार निभाए, जिनमें दो फ़िल्में मशहूर गायिका-अदाकारा बेगम अख़्तर के साथ भी थीं।

लेकिन असल पहचान उन्हें मिली बतौर पटकथा लेखक। बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियो में हिमांशु राय से पटकथा लेखन सीखने के बाद, उन्होंने 1938 में अपनी पहली फ़िल्म वचन लिखी, जिसे जर्मन निर्देशक फ़्रांज़ ओस्टेन ने बनाया। इसके बाद उन्होंने 50 से ज़्यादा फ़िल्मों की कहानी और मुकालमे (संवाद) क़लमबंद किए।

साहित्यिक उर्दू के आख़िरी अलमबरदार

आग़ा जानी की सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि वे अपने संवाद ख़ालिस, अदबी उर्दू में लिखते थे। उनकी क़लम से सजी मशहूर फ़िल्मों में भारत की पहली बड़ी हिट किस्मत (1943), पाल्मे डी’ओर के लिए नामज़द होने वाली मुझे जीने दो (1963), और नया ज़माना (1971) शामिल हैं। उनकी ज़बान इतनी शुस्ता (साफ़-सुथरी) और शायराना होती थी कि सुनने वाला मसहूर (मंत्रमुग्ध) हो जाता।

मगर 1970 के दौर में जब सलीम-जावेद की जोड़ी ने ज़्यादा बोल-चाल वाली, आम फ़हम ज़बान को रिवाज दिया, तो आग़ा जानी की शुस्ता उर्दू वाला अंदाज़ आहिस्ता-आहिस्ता पर्दे से पीछे हटने लगा।

निजी ज़िंदगी और विरासत

मुंबई में वे अपने परिवार, ज़ुहैर कश्मीरी और सरवर कश्मीरी के साथ रहते थे। उन्होंने सुबोध मुखर्जी, शशधर मुखर्जी, सुनील दत्त, मेहबूब ख़ान जैसे बड़े निर्माता-निर्देशकों और अशोक कुमार, देविका रानी, नूरजहाँ, दिलीप कुमार, राज कपूर जैसे कलाकारों के लिए क़लम चलाई।

27 मार्च 1998 को उनका इंतक़ाल हुआ। उनके बेटे ज़ुहैर कश्मीरी आज कनाडा में बतौर पत्रकार काम कर रहे हैं।

फ़िल्मों की एक झलक

उनकी लिखी यादगार फ़िल्मों में चोरी चोरी (1956), जंगली (1961), ज़िद्दी (1964), ग़ज़ल (1964), अनमोल घड़ी (1946), हुमायूं (1945) और चंद्रलेखा (1948) जैसी क्लासिक शामिल हैं।

आग़ा जानी कश्मीरी की कहानी हमें याद दिलाती है कि कैसे एक ज़माने में उर्दू की मिठास और अदब का रंग बॉलीवुड की रूह में रचा-बसा था  और कैसे ज़बान बदलती है, मगर अपने पीछे एक ख़ूबसूरत विरासत छोड़ जाती है।

ये भी पढ़ें: राबिया बसरी: मोहब्बत-ए-इलाही की पहली सूफ़ी शायरा 

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