जब हम किसी लेखिका की बात करते हैं, तो अक्सर उसके लेखन से पहले उसके जीवन को समझना जरूरी होता है। उर्मिला पवार (Urmila Pawar) की पैदाइश 1945 में महाराष्ट्र के रत्नागिरी के एक छोटे से गांव में हुई। वो महार समुदाय से आती हैं। एक ऐसा समुदाय जिसे सदियों से ‘अछूत’ कहकर पुकारा गया। लेकिन उनके पिता की शिक्षा के प्रति अटूट इच्छाशक्ति ने उनका जीवन बदल दिया। मुंबई आकर उन्होंने पढ़ाई की और फिर वह आवाज़ बनीं, जिसने दलित स्त्री के दर्द को शब्द दिए।
‘जाति और लिंग के उस जाल में, जहां दलित महिला की आवाज़ दब गई थी, उर्मिला पवार ने चुप्पी तोड़ी”
आज वो 80 साल की हैं। लेकिन अभी भी उन्होंने लिखना, लड़ना और बोलना नहीं छोड़ा है। 2026 में उन्हें ‘ऑथर अवार्ड्स’ में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड (Lifetime Achievement Award at the ‘Author Awards’) से सम्मानित किया गया है। ये सम्मान उनकी यात्रा का अंत नहीं, बल्कि एक लंबे समय का पालन है।
दलित स्त्री लेखन: जब चुप्पी ने आवाज़ बनाई
1980 के दशक तक दलित महिला की आवाज़ कहीं नहीं थी। न तो स्वायत्त महिला आंदोलन में, न ही दलित साहित्यिक आंदोलन में। उच्च जाति की महिलाओं ने अपने अनुभवों को ‘सभी स्त्रियों’ का अनुभव बताकर दलित स्त्री के संघर्ष को अनदेखा कर दिया। वहीं, दलित आंदोलन में पुरुष ने स्त्रियों को सिर्फ एक त्याग करने वाला मां या फिर ‘पतिव्रता पत्नी’ के रूप में ही दिखाया।
इसी दोहरी अनदेखी ने 1980 के दशक में दलित महिलाओं को एकजुट होने पर मजबूर कर दिया। मुंबई में ‘महिला संसद’ का गठन हुआ और फिर ‘सम्वादिनी-दलित स्त्री साहित्य मंच’ का जन्म हुआ। ये वो मंच था, जहां दलित स्त्रियों ने अपनी बात कहना शुरू किया। वो बात जो सदियों से दबी हुई थी।
इन लेखिकाओं ने वे सवाल उठाए जो कभी पूछे ही नहीं गए थे। उन्होंने ब्राह्मणवादी विचारधारा, भारतीय नारीवाद में ब्राह्मणवादी मानदंड, और महिला आंदोलन की बहिष्कारकारी (Exclusionary)राजनीति को चुनौती दी। उन्होंने फुले-आंबेडकर विचारधारा को भारतीय संदर्भ में सबसे प्रमुख नारीवादी विचारधारा के रूप में दोबारा से जिंदा किया।
जिन्होंने लेखन को सामाजिक बदलाव का हथियार बनाया
उर्मिला पवार (Urmila Pawar) की रचनाएं केवल कहानियां नहीं हैं। वे जिंदगी के उन पहलुओं को उजागर करती हैं, जिन्हें समाज ने जानबूझकर अंधेरे में रखा है। उनकी कहानियों की नायिकाएं वे स्त्रियां हैं, जिनसे हम रोज़ मिलते हैं। सब्जी बेचने वाली, बस में सफ़र करने वाली, पड़ोस में रहने वाली। लेकिन उनकी कहानियां उनके अंदर की उस ताकत से मिलाती हैं, जिसे अनदेखा कर दिया जाता है।

आयदान’: बांस की टोकरी बुनने का संघर्ष
उर्मिला पवार की आत्मकथा ‘आयदान’ (बांस की टोकरी) एक अनूठी रचना है (Urmila Pawar’s autobiography ‘Aaidan’ (Bamboo Basket)। इसका शीर्षक ही बताता है कि उनकी मां का संघर्ष इस कहानी का सेंटर है। उन्होंने बांस की टोकरी बुनने को प्रतिरोध का रूपक बनाया। जैसे उनकी मां ने संघर्षों के बीच भी परिवार को संभाला, वैसे ही उर्मिला ने लेखन के ज़रिए दलित स्त्री के संघर्ष को बुना।
इस आत्मकथा में वो अपनी मां की उस प्रतिज्ञा का ज़िक्र करती हैं, जो उनके पिता ने मौत पर ली थी। ‘सभी बच्चों को पढ़ाना है।’ ये संकल्प ही उर्मिला पवार को शिक्षा तक ले आई और फिर उनके लेखन का आधार बनी।
क्यों ज़रूरी है उर्मिला पवार का लेखन?
उर्मिला पवार की लेखनी में वो ताकत है, जो ऊपरी तौर पर नज़र नहीं आती। वो मराठी साहित्य की उस परंपरा को तोड़ती हैं, जो सदियों से उच्च जाति, ब्राह्मणवादी सोच से प्रभावित रही है। उनकी भाषा कच्ची है, वैसी ही जैसी उनके समुदाय में बोली जाती है। यही उनकी ख़ासियत है।वो लिखती हैं वैसे, जैसे वो जीती हैं।
उनकी कहानियां सिर्फ़ दर्द बयां नहीं करतीं, बल्कि हमें आईना दिखाती हैं। वह पूछती हैं कि क्या हम भी उस संरचना का हिस्सा हैं, जो दलित स्त्री को उसके अस्तित्व के लिए संघर्ष करने पर मजबूर करती है?
उर्मिला पवार ने नारीवाद को और ज़्यादा सम्मिलित बनाया। उन्होंने दिखाया कि केवल लिंग ही उचित नहीं, जाति और वर्ग भी उतने ही अहम हैं। उन्होंने लेखन को न केवल एक कला बल्कि सामाजिक बदलाव का एक शक्तिशाली औज़ार बनाया।
आज जब हम उर्मिला पवार की बात करते हैं, तो हम सिर्फ़ एक लेखिका की नहीं, बल्कि एक संघर्षशील स्त्री की बात करते हैं। जिसने अपने लेखन से अंधेरे कमरों में रोशनी की, जहां सदियों से कोई नहीं गया था।
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