अपनी एक यात्रा के दौरान गुरु नानक पाकपत्तन शरीफ़ पहुंचे। पंजाब सूबे का यह प्राचीन नगर चिश्ती सूफ़ी सम्प्रदाय के आध्यात्मिक केंद्र के तौर पर विख्यात था। तेरहवीं शताब्दी के संत बाबा फरीदुद्दीन गंजशकर की मजार आज भी यहाँ मौजूद है। सतत ज्ञान की खोज में रमे रहने वाले गुरु नानक की भेंट पाकपत्तन के एक बड़े ज्ञानी संत शेख फरीद से हुई। शेख फरीद मानते थे कि मोक्ष प्राप्ति के लिए कठोर तप ही एकमात्र रास्ता होता है जिसके लिए यह ज़रूरी है कि इंसान संसार से दूर चला जाए। गुरु नानक ने उनसे संवाद किया और उसके बाद जो कहा उसका सार दो पंक्तियों में यूं था –
घर ही भीतरि सबु किछु है
बाहरि ढूढत भरमु गवाइ
गुरु नानक के जीवन के विवरणों और उनके उपदेशों की विस्तृत व्याख्या चार प्रमुख जनमसाखियों में मिलती है। इनमें से एक है मिहरबान की जनमसाखी। मशहूर लेखक खुशवंत सिंह इसी को सबसे प्रामाणिक मानते थे। मिहरबान की जनमसाखी गुरु के उपदेश की व्याख्या करते हुए कहती है कि यदि मन एकाग्र और निर्मल हो तो ईश्वर को घर में रहते हुए भी पाया जा सकता है।
यह प्रसंग गुरु नानक की लम्बी यात्राओं की पूरी विडम्बना को समेट लेता है। अपने जीवनकाल में उन्होंने कम से कम चार बेहद लम्बी यात्राएं कीं जिनके दौरान वे करीब 28,000 किलोमीटर चले। सिख परम्परा में इन यात्राओं को गुरु नानक की उदासियां कहा जाता है। कई वर्षों तक हजारों मील चलने के बाद उन्होंने शेख फरीद से कहा कि ईश्वर को खोजने के लिए इतनी घर से दूर जाने की जरूरत नहीं।
इस विडम्बना में ही गुरु नानक की यात्राओं का मर्म भी छिपा हुआ है। गुरु नानक का जन्म 1469 ई. में तलवंडी (आज का ननकाना साहिब, पाकिस्तान) में हुआ। उस समय भारत कोई एकीकृत राजनीतिक इकाई नहीं था। दिल्ली का सुल्तान पूरे उपमहाद्वीप पर प्रभावी नियंत्रण नहीं रखता था। अनेक क्षेत्रीय सल्तनतें, राजपूत राज्य और स्थानीय सरदार अपने-अपने इलाकों में सत्ता चला रहे थे। उत्तर भारत में लोदी वंश का शासन था और दिल्ली की गद्दी पर बहलोल लोदी (1451–1489) बैठा था।
पंजाब भी दिल्ली सल्तनत के अधीन था, हालांकि यहाँ काफी हद तक वास्तविक प्रशासन स्थानीय अफगान सरदारों और सूबेदारों के हाथ में था। वे ऐसे भारत में पैदा हुए थे जहाँ सत्ता एक ओर केंद्रीकरण की कोशिश कर रही थी और दूसरी ओर लगातार बिखर रही थी। उन्होंने सिकंदर लोदी (1489–1517) और उसके बाद इब्राहिम लोदी (1517–1526) का शासनकाल भी देखा। उनके जीवन के अंतिम दौर में 1526 के साल बाबर ने पानीपत में इब्राहिम लोदी को हराकर मुगल सत्ता की नींव रखी। इस प्रकार गुरु नानक ने अपनी आँखों के सामने अफगान लोदी शासन से मुगल शासन में सत्ता का संक्रमण देखा।

गुरु नानक बचपन से ही अंतर्मुखी और अपनी ही धुन में रहने वाले बालक थे। कई-कई दिनों तक वे किसी से बोलना तक पसंद नहीं करते थे। अक्सर जंगलों में भटकते रहते और प्रकृति के रहस्यों को बड़ी तल्लीनता से देखते – वसंत का आना, जब चारों ओर मधुमक्खियों की भिन-भिन और तितलियों की उड़ान से जीवन जैसे अचानक जाग उठता; गर्मियों की वह तपती धूप, जो सारी वनस्पति को झुलसा देती; और फिर वर्षा का मौसम, जो किसी जादू की तरह सूखी धरती में फिर से प्राण फूँक देता और पूरे संसार को हरा कर देता। जंगल के पक्षियों और पशुओं की अपनी-अपनी दुनिया भी उन्हें खूब आकर्षित करती थी।
प्रकृति का यह रहस्य धीरे-धीरे बालक नानक के भीतर उतरता गया। वे सोचने लगे कि इस विराट सृष्टि को बनाने वाला कौन है, इसे सँभालने वाला कौन और अंततः इसे मिटाने वाला कौन? और इन्हीं सवालों के साथ उनके मन में एक और प्रश्न जन्म लेने लगा – क्या केवल हिंदू या मुसलमान होने के कर्मकाण्डों से उस सृष्टा तक पहुँचा जा सकता है?
करीब सोलह वर्ष की आयु में गुरु जी अपने पैतृक गाँव से सुल्तानपुर लोधी आए जहाँ उन्होंने लोधी शासन के स्थानीय प्रतिनिधि दौलत खां के अनाज-भण्डार में कोई चौदह-पंद्रह बरसों तक नौकरी की। इस दरम्यान उनका विवाह हुआ जिसके बाद उनके दो पुत्र भी पैदा हुए।
सुल्तानपुर लोधी में उनके साथ परिवार का मर्दाना नाम का एक मुसलमान सेवक भी साथ आया था। आगे चलकर यही मर्दाना उनका सबसे निकटतम साथी बना। जनमसाखी में उसे मिरासी और संगीतकार समुदाय का बताया गया है। वह रबाब बजाता था और गुरु नानक के साथ उनकी वाणी गाता था।नवाब दौलत खाँ लोदी गुरु नानक की ईमानदारी से बहुत प्रभावित हुआ। भंडार और लेखे-जोखे का काम उन्हें सौंपा गया था, लेकिन गुरु नानक ने न तो किसी की रिश्वत स्वीकार की, न अपने पूर्ववर्तियों की भ्रष्ट परम्पराओं को अपनाया। सुल्तानपुर लोधी के लोग भी उनकी ईमानदारी और सरलता की प्रशंसा करते नहीं थकते थे।
दिन भर गुरु नानक को हिसाब-किताब लिखना पड़ता। आय और खर्चों का लेखा बनाना, दिन के अंत में जोड़-घटाना और यह देखना कि सारे हिसाब ठीक बैठते हैं या नहीं। कई बार उन्हें देर रात तक दीपक की रोशनी में बही-खाते पर झुके रहना पड़ता। मिहरबान की जनमसाखी में बताए गए एक दृष्टांत के मुताबिक़ एक रात वे अचानक अपने ही जीवन से क्षुब्ध हो उठे। उन्होंने कलम और बही-खाते एक ओर फेंक दिए और खुद से पूछा, “मैं इन झंझटों में क्यों फँस गया हूँ? अपने सृष्टा को भूलकर इन मामूली हिसाब-किताब में क्यों उलझा हूँ? क्या मेरी पूरी जिंदगी इसी तरह दिन-रात खाते लिखते हुए बीतनी है?”
उन्हें अहसास हुआ कि अगर रात में दीया जलाकर जागना ही है तो किसी ऐसे काम के लिए जागना चाहिए जिसका कोई वास्तविक अर्थ हो। बचपन से आध्यात्मिक प्रवृत्ति का होने के कारण वे अपने आसपास के परिवेश को किसी सचेत दार्शनिक की निगाह से देखा करते थे। धीरे-धीरे वे जीवन और संसार की साधारण चीज़ों से विरक्त होते चले गए। उनका मन पत्नी, बच्चों, अपनी संपत्ति और आसपास के लोगों से भी हटता गया। वे यह भली-भाँति समझ चुके थे कि समाज की सबसे बड़ी विडंबनाओं में एक जातिगत भेदभाव है, लेकिन उतनी ही गहरी समस्याधर्म के नाम पर मनुष्यों के बीच पनपता वैमनस्य और विभाजनभी है।

इतिहासकारों और उनके जीवनीकारों की मानें तो 1499 से 1501 ईस्वी के दौरान किसी एक दिन उन्होंने तय किया कि विधाता की बनाई सृष्टि और उसके नाम पर चलाए जा रहे धार्मिक-साम्प्रदायिक पाखण्ड को पूरी तरह समझने और आमजन के सम्मुख लाने के लिए उन्हें लम्बी यात्राओं पर निकलना होगा। वे मरदाना को साथ लेकर दिल्ली की दिशा में निकल पड़े। यह उनके जीवन की अकल्पनीय यात्राओं की शुरुआत थी।
जैसा ऊपर बताया गया इन यात्राओं को उदासी का नाम दिया गया। इस शब्द की जड़ में गुरूजी की उदासीन और तटस्थ मनःस्थिति को माना जाता है। इन उदासियों के माध्यम से वे देश के तमाम तीर्थों, नगरों, साधुओं, पंडितों, सूफियों और आम लोगों के बीच पहुँच कर अपने अनुभव संसार को समृद्ध बनाना चाहते थे जिससे उनकी सत्य-साधना को उचित मार्गदर्शन मिलता।
उनकी पहली उदासी को लेकर मिहरबान की जनमसाखी में एक घटना का ज़िक्र है। गुरु नानक और मर्दाना यात्रा कर रहे थे। उन्होंने आकाश में उड़ते हुए हंसों का एक झुंड देखा। गुरु नानक उन पक्षियों को देखकर इतने मुग्ध हुए कि उनकी ओर दौड़ पड़े। मर्दाना भी उनके पीछे हो लिया। हंस नीचे खेत में उतरे और गुरु नानक को अपने पास आने दिया। गुरु नानक देर तक उन पक्षियों को गौर से देखते रहे – उनकी लम्बी गर्दनें, चमकती आँखें और चाँदी जैसी सफेद पंखों वाली देह।
फिर उनके मन में प्रश्न उठाये पक्षी आकाश को पार करते हुए इतनी दूर तक जाते हैं। क्या कभी इन्होंने अपने सृष्टिकर्ता की ओर भी देखा होगा? वे सोचते रहे कि इतने सुंदर पक्षी खुरासान से हिंदुस्तान और हिंदुस्तान से फिर खुरासान तक क्यों भटकते रहते हैं।
फिर उन्होंने उन हंसों को आशीर्वाद दिया और अपनी यात्रा पर आगे बढ़ गए। यह छोटी-सी साखी शायद गुरु नानक की पूरी उदासी का सबसे सुंदर आरम्भ है। वे दुनिया को जीतने नहीं निकले थे। वे उसे अच्छी तरह देखने निकले थे। हालांकि गुरु नानक की उदासियों की सही-सही अवधि और उनकी संख्या को लेकर विद्वानों में मतभेद पाया जाता है, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार उन्होंने कुल चार उदासियाँ कीं जो वर्ष 1500 से 1521 के दौरान हुईं।
कुछ आधुनिक विद्वान 1523–1524 के बीच पंजाब सूबे के भीतर की गई उनकी यात्राओं को उनकी पांचवीं उदासी का नाम भी देते हैं लेकिन आम सहमति चार उदासियों पर ही बनी है। ये चार उदासियाँ चार भिन्न दिशाओं की तरफ की गई थीं। पहली उदासी 1500 से 1506 के बीच पूर्व दिशा की तरफ की गयी थी, दूसरी 1506 से 1513 के बीच दक्षिण की तरफ, तीसरी 1514 से 1518 के बीच उत्तर की तरफ और चौथी 1519 से 1521 के बीच पश्चिम की तरफ।
चूकि गुरु नानक ने स्वयं अपनी यात्राओं का कोई लिखित वर्णन नहीं छोड़ा, समय के साथ इन उदासियों के दस्तावेजीकरण के दौरान विविध घटनाक्रम और चरित्र जुड़ते चले गए होंगे। पूर्व की दिशा में की गई पहली और सबसे लम्बी उदासी में गुरु नानक ने उत्तर भारत से होते हुए पूर्व की ओर यात्रा की। इसके अंतर्गत कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, दिल्ली, मथुरा-वृंदावन, अयोध्या, काशी, गया, पटना, बंगाल, कामरूप और जगन्नाथ पुरी जैसे स्थानों का उल्लेख मिलता है।
इस उदासी की शुरुआत दिल्ली की यात्रा से हुई। यह निश्चित रूप से नहीं मालूम कि गुरु नानक दिल्ली में कितने समय तक रहे। वहाँ से वे गंगा के किनारे बसे हरिद्वार की ओर चले गए। लगता है, उस समय कोई बड़ा धार्मिक पर्व चल रहा था और पवित्र नदी में स्नान करने के लिए भारी भीड़ उमड़ आई थी।
गुरु नानक और मरदाना बैसाखी के मेले में शामिल होने के लिए कुछ समय हरिद्वार में रुके। बैसाखी के दिन गंगा-स्नान करने के लिए लोगों की भारी भीड़ जमा थी। गुरु नानक ने देखा कि लोग पूर्व दिशा की ओर मुँह करके अपनी हथेलियों में पानी भर रहे हैं और उसे सूर्य की ओर उछाल रहे हैं। गुरु नानक भी नदी में उतर गए और उन्होंने पानी भरकर उसे पश्चिम दिशा की ओर फेंकना शुरू कर दिया।

हैरान होकर तीर्थयात्रियों ने कहना शुरू किया, “यह कौन है जो पश्चिम की ओर पानी फेंक रहा है? या तो पागल होगा या मुसलमान!” वे गुरु नानक के पास गए और उनसे पूछा कि वे गलत दिशा में पानी क्यों अर्पित कर रहे हैं। गुरु नानक ने उलटे उनसे पूछा कि वे स्वयं पानी पूर्व दिशा में सूर्य की ओर क्यों फेंक रहे हैं।
“हम इसे अपने मृत पूर्वजों को अर्पित कर रहे हैं,” उन्होंने उत्तर दिया।
“तुम्हारे मृत पूर्वज कहाँ हैं?”
“स्वर्ग में देवताओं के साथ.”
“देवताओं का निवास यहाँ से कितनी दूर है?”
“उनचास करोड़ कोस.”
“क्या तुम्हारा पानी वहाँ तक पहुँच जाता है?”
“बिल्कुल पहुँचता है!”
“तो फिर तुम लोग पश्चिम की ओर पानी क्यों फेंक रहे हो?” गुरु नानक ने उत्तर दिया, “मेरा घर और मेरी जमीनें लाहौर के पास हैं। वहाँ हर जगह बारिश हुई है, लेकिन मेरे खेतों में बारिश नहीं हुई। इसलिए मैं अपने खेतों को पानी दे रहा हूँ।”लोगों ने कहा, “हे परमात्मा के भक्त, भला यहाँ से लाहौर के पास अपने खेतों में पानी कैसे पहुँचा सकते हो?”
गुरु नानक ने कहा, “यदि तुम यहाँ से पानी उनचास करोड़ कोस दूर देवताओं के निवास तक पहुँचा सकते हो, तो मैं इसे लाहौर तक क्यों नहीं पहुँचा सकता, जो यहाँ से केवल दो-चार सौ कोस दूर है?”
मिहरबान की जनमसाखी में बताई गई इस घटना के बाद हरिद्वार में एकत्र हुए बड़ी संख्या में हिंदू तीर्थयात्री गुरु नानक के शिष्य बन गए। बैसाखी का मेला समाप्त होने के बाद भी वे कुछ समय वहीं रुके और लोगों को उपदेश देते रहे। हरिद्वार से गुरु नानक और मरदाना प्रयाग की ओर चले, जहाँ आधुनिक इलाहाबाद में यमुना और सरस्वती का गंगा से संगम माना जाता है। प्रयाग से गुरु बनारस गए, जो उस समय हिंदू विद्या और रूढ़ धार्मिक परंपरा का प्रमुख केंद्र था।
आदि ग्रंथ में गुरु नानक की पंडितों के साथ हुई अनेक मुलाकातों का उल्लेख मिलता है। ये पंडित उनकी अपरंपरागत मान्यताओं के लिए उन्हें उलाहना देते और पवित्र ग्रंथों के बारे में उनके ज्ञान को परखने के लिए उनसे प्रश्न करते थे। कथा की ऐतिहासिकता पर बहस की जा सकती है। लेकिन इसकी वैचारिक शक्ति निर्विवाद है। गुरु नानक कर्मकांड का मजाक उड़ाने के लिए यह नहीं कर रहे। वे पूछ रहे हैं कि कर्म का अर्थ क्या है? क्या किसी क्रिया को इसलिए अर्थपूर्ण मान लिया जाए क्योंकि उसे सदियों से किया जा रहा है? यह प्रश्न उनकी पूरी विचार-यात्रा के केंद्र में है। वे परंपरा के विरोधी मात्र नहीं हैं। वे अंधी परंपरा के विरोधी हैं।
उनके लिए धर्म का मूल्य इस बात में नहीं कि हम कितनी बार किसी मंत्र को दोहराते हैं, बल्कि इस बात में है कि उस मंत्र के बाद हमारे भीतर क्या बदलता है। यह घटना गुरु नानक की सभी उदासियों में उपस्थित एक सूत्र का प्रतिनिधित्व करती है– गुरु नानक धर्म और ईश्वर के नाम पर फैलाए गए किसी भी पाखण्ड को स्वीकार नहीं करते और उन्हें तर्क की सान पर परखते हैं। धर्मगुरुओं और साधु-संतों के साथ उनके संवाद तमाम जनमसाखियों में मौजूद हैं और उनकी स्पष्ट निगाह और जनोन्मुख विचारधारा को वाणी देते हैं।

गुरु नानक की उदासियों के वृत्तान्तों में तरह-तरह के साधारण-असाधारण मनुष्य आवाजाही करते रहते हैं, जिनके साथ होने वाले एक-एक अनुभव में जीवन की अमूल्य सीखें निहित हैं। असम के कामरूप में उन्हें नूरशाह नाम की एक रानी मिलती है जिसने जादू-टोने पर महारत हासिल कर रखी है। मुल्तान के जंगल में उन्हें एक ठग मिलता है जिसका नाम सज्जन है। वो दोनों को सही मार्ग दिखाते हैं।
नूरशाह के प्रसंग से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण गुरबाणी ‘कुचज्जी’ है, जिसे गुरु नानक देव जी नेराग सूही, महला १, अंग ७६२ पर रचा है। हालांकि गुरु ग्रंथ साहिब में नूरशाह का नाम स्वयं नहीं आता; नूरशाह से इसका संबंध जनमसाखी-परंपरा से मिलता है। नानक जी कहते हैं:
कलरु कीआ वणजारिआ, झूंगे मुसकु मंगेन
अमला बाजहु नानका, किउ करि खसमि मिलेन
यानी ये संसार नमक की खारी भूमि जैसा है और आदमी इसमें व्यापारी की तरह आया है। वो कस्तूरी जैसी मूल्यवान वस्तु माँगता है, लेकिन उसके पास उसके योग्य कर्म नहीं हैं। अच्छे कर्मों के बिना वो अपने परमात्मा से कैसे मिल सकता है? पटना में उन्हें एक दिन एक रत्न मिला। उन्होंने मरदाना से कहा, इसे बेचकर भोजन ले आओ। मरदाना रत्न लेकर बाजार में घूमता रहा। किसी ने कुछ तांबे के सिक्के दिए, किसी ने थोड़ा अनाज। आखिर वो जौहरी सालिस राय के पास पहुँचा। जौहरी ने सिर्फ इसलिए कि उसे उस रत्न को देखने का अवसर मिला था, उसके बदले सौ रुपये दे दिए। मरदाना को लगा कि जौहरी पागल हो गया है।
गुरु नानक ने रुपये लौटा दिए। फिर समझाया कि ये रत्न मनुष्य के जीवन जैसा है। दुनिया के अधिकांश लोग उसकी कीमत नहीं जानते और उसे मामूली चीजों के बदले गँवा देते हैं।
गुरु जी की दूसरी उदासी उन्हें दक्षिण भारत और फिर श्रीलंका तक ले गई। इस दौरान वो रामेश्वरम भी पहुंचे। इस यात्रा की परम्परा में दक्षिण भारत के अनेक तीर्थ, साधु-संतों और धार्मिक केन्द्रों से उनके संवाद मिलते हैं। श्रीलंका में राजा शिवनाभ से मुलाकात की कथा भी इसी यात्रा से जुड़ी हुई है। श्रीलंका का राजा शिवनाभ सत्य की तलाश में था, लेकिन साधुओं के नाम पर बहुत ढोंग देख चुका था।
गुरु नानक के एक शिष्य की भक्ति से प्रभावित होकर उसने उन्हें बुलाया और उनकी परीक्षा लेने के लिए सुंदर नर्तकियाँ भेजीं। लेकिन वे गुरुनानक के सामने पहुँचीं तो उनके भजन सुनकर स्वयं प्रभावित हो गईं। राजा को समझ आ गया कि यह वह साधु नहीं है जिसे थोड़ी-सी परीक्षा में पकड़ा जा सके। गुरुनानक ने राजा से कहा कि निरंकार का कोई रूप नहीं, इसलिए नाम, जाति, नस्ल और संप्रदाय की सीमाएँ भी अंततः मनुष्य की बनाई हुई हैं।
तीसरी उदासी हिमालय की ओर थी। इसमें कश्मीर, हिमालय, तिब्बत, लद्दाख, सुमेर पर्वत आदि से जुड़ी परम्पराएँ आती हैं। इन यात्राओं में बिलासपुर, ज्वालाजी, स्पीति, तिब्बत, लद्दाख, कारगिल, अमरनाथ, श्रीनगर, कुमाऊँ, गढ़वाल और बारामूला जैसीजगहों का उल्लेख आता है। यही वह व्यापक उत्तरवर्ती यात्रा-क्षेत्र है जिसमें सिद्धों और योगियों के साथ उनके संवादों को रखा जाता है। आपके दस्तावेज़ में भी गोरख मत्ता, सुमेर पर्वत, गोरख हटरी और अचल बटाला को योगियों से उनके प्रमुख संवादों के स्थान बताया गया है। चौथी उदासी सबसे दूर तक जाने वाली यात्राओं में गिनी जाती है। इसका केन्द्र पश्चिम था- पंजाब से अफगानिस्तान, ईरान, इराक और अरब की ओर. परम्परा में मक्का, मदीना, बगदाद, बसरा और करबला जैसे स्थानों का उल्लेख मिलता है।
मक्का का प्रसंग इसी यात्रा का है। वहाँ गुरु नानक के पैर काबा की दिशा में होने पर आपत्ति की गई और उन्होंने वह प्रसिद्ध प्रश्न उठाया कि उन्हें उस दिशा में पैर कर दिए जाएँ जिधर ईश्वर न हो। यह कथा उनकी धार्मिक सार्वभौमिकता को व्यक्त करने वाली सबसे प्रसिद्ध उदासी-कथाओं में है। इस चौथी उदासी में कई विद्वान उन जगहों में चीन, इराक, जॉर्डन, तुर्की और रूस को भी जोड़ते हैं जहाँ गुरु नानक ने स्थानीय जनों से संवाद किया।

इस बात के ठोस प्रमाण तो नहीं मिलते लेकिन आज भी रूस में उन्हें नानक कदमदार और चीन में बाबा फूसा के नाम से याद किया जाता है। यहाँ एक तथ्य ध्यान देने योग्य है। गुरु नानक विभिन्न धर्मों के लोगों सेउनका धर्म छोड़ने को नहीं, बल्कि अपने धर्म की आत्मा को पहचाननेको कहते थे। मिसाल के तौर पर मक्का में मिले मुसलमानों से उन्होंने कहा –
मुसलमानु कहावणु मुसकलु जा होइ ता मुसलमानु कहावै
अवलि अउलि दीनु करि मिठा, मसकल माना मालु मुसावै
होइ मुसलिमु दीन मुहाणै, मरण जीवण का भरमु चुकावै
रब दी रजाइ मंने सिरु ऊपरि, करता मंने आपु गवावै
तउ नानक सरब जीआ मिहरंमति होइ, त मुसलमानु कहावै
यानी मुसलमान कहलाना आसान नहीं है; जो वास्तव में ऐसा बन पाए, वही मुसलमान कहलाने योग्य है। सबसे पहले उसे अपने धर्म को अपने जीवन का मधुर और प्रिय आधार बनाना चाहिए और अपने भीतर से अहंकार, लोभ और माया के मैल को ऐसे रगड़-रगड़कर निकाल देना चाहिए जैसे किसी वस्तु को माँजकर साफ किया जाता है। वही सच्चा मुसलमान है जो अपने जीवन की पतवार धर्म के हाथ में सौंप देता है और जन्म-मरण के भ्रम से मुक्त हो जाता है। जो ईश्वर की रज़ा को सिर-माथे पर स्वीकार करता है, सृष्टिकर्ता को अपना कर्ता मानता है और अपने अहंकार को मिटा देता है।
गुरु नानक कहते हैं, जब उसके हृदय में सभी जीवों के लिए दया और करुणा उत्पन्न हो जाए, तभी उसे सच्चा मुसलमान कहा जा सकता है। उन दिनों न सड़कें थीं, न रेल, न नक्शे, न आधुनिक संचार। फिर भी गुरु नानक पंजाब से निकलकर भारत के दूर-दराज़ हिस्सों, श्रीलंका, हिमालय, तिब्बत और मुस्लिम धार्मिक केन्द्रों तक पहुँचे। वह असाधारण साहस का काम था। उन्होंने अपने लिए कोई सुरक्षित, सुविधाजनक धार्मिक संसार नहीं बनाया। वे अपने घर-परिवार और स्थापित जीवन से बाहर निकले और लगातार अजनबी लोगों के बीच जाते रहे। वे प्रश्न पूछते रहे और प्रश्नों का सामना करते रहे।
आज, जब अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक पहचानें फिर से इतनी कठोर दिखाई देती हैं, पाँच सौ वर्ष पहले का वह महायात्री और भी अधिक असाधारण लगता है, जो एक जगह बैठकर लोगों को अपने पास बुलाने के बजायलोगों के पास स्वयं चला गया। गुरु नानक की उदासियाँ नक्शे पर खींची हुई रेखाएँ भर नहीं हैं। वे मनुष्य की चेतना के नक्शे पर उकेरे गए दिशानिर्देश हैं। पंजाब से बंगाल, दक्षिण से श्रीलंका और फिर अरब की धरती तक जाते हुए गुरु नानक ने असल में एक ही बात को अलग-अलग लोगों से, उनकी अपनी भाषा और उनके अपने सवालों में कहा – ईश्वर को खोजने से पहले आदमी को आदमी की तरह जीना सीखो।
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