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आज़मगढ़ में फिल्म फेस्टिवल की कैसे हुई शुरूआत?

आज़मगढ़ में फिल्म फेस्टिवल: आज़मगढ़ (Azamgarh) जिला का शारदा टॉकिज एक समय पर आईकॉनिक सिनेमा हॉल माना जाता था, लेकिन अब यह खंडहर मे तबदील होता जा रहा है। लेकिन आज भी इसमें कई कलाकार पनप रहें है। जिनको एक सूत्र में बांधने का काम रहे है अभिषेक पंडित।

कलाकार को बनाने में समाज का योगदान होता है ये शब्द अभिषेक पंडित के है। अभिषेक पंडित ने करीब 17 साल की उम्र में रंगमंच से कला का सफर शुरू किया. उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। साल 2003 में, आज़मगढ़ के अभिषेक पंडित ने सूत्रधार संस्थान की स्थापना की जो वर्तमान में अपनी अनूठी बोली-आधारित नाटक के माध्यम से जिले की कला और संस्कृति को बढ़ावा दे रहा है। अभिषेक पंडित, लैला मजनू और भिखारी ठाकुर जैसे कई प्रसिद्ध नाटकों का निर्देशन करने के लिए देश भर में प्रसिद्ध हो गए हैं। अभी तक उन्होंने अलग अलग शहरों में चालीस नाटकों को निर्देशित किया है।

अपनी मेहनत, लगन और काम के लिए उन्हें कई अवॉर्ड मिल चुके है। अभिषेक को 2015 में केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी नई दिल्ली में उत्साद बिस्मिल्लाह खां अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। अभिषेक युवाओं को ट्रेनिंग देने के लिए कई कार्यशालाओं को आयोजित कर चुके है। साल 2017 में अभिषेक पंडित को राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने 2017 के उप्र संगीत नाटक आकदमी पुरस्कार प्रदान किया गया था। अब अपने समाज को वैश्विक सिनेमा से परिचित कराने के प्रयास में उन्होंने आज़मगढ़ अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव की शुरुआत की है।

क्या कहा था एक्टर ओमपुरी साहब ने अभिषेक पंडित को

आज़मगढ़ में फिल्म फेस्टिवल की कैसे शुरूआती हुई इसके बारे में अभिषेक बताते है कि ‘फिल्म और थ्रियटर का मां और मौसी जैसा रिश्ता है। फिल्म से जुड़े लोग थियेटर से जुड़े होते है और थ्रियटर जुड़े लोग फिल्म से। एक दिन एनएसडी में भारत रंग महोत्सव में ओमपुरी साहब आए थे, जब वो जा रहे थे तो मैं उनसे मिला उन्होंने मुझसे कहा कि थ्रियटर करते हो तो फिल्में भी करों और फिल्म फेस्टिवल करो। तब से मैंने फिल्म फेस्टिवल आयोजित करने का सोच लिया था।’

आज़मगढ़ में फिल्म फेस्टिवल
अभिषेक पंडित की DNN24 से बातचीत. Image Source by DNN24

DNN24 से बात करते हुए अभिषेक ने बताया कि आज़मगढ़ के अंदर थियेटर आर्टिस्ट और आज़मगढ़ से बाहर जो थियेटर आर्टिस्ट है दोनों को मिलने वाली अपॉर्चुनिटी में काफी अंतर है। एक्टर्स को नाटक दिखाने के लिए नाटक बुलाना पड़ता है, एक नाटक को ऑर्गनाइज करने में करीब एक लाख रूपये का खर्च होता है। बाहर अच्छे डिज़ाइनर, को-एक्टर, अच्छी लाइब्रेरी है और उनके पास आने जाने की सुविधा भी है। अगर आज़मगढ़ की बात करें तो यहां कोई बच्चा आयेगा तो उसका आने जाने में ही बहुत खर्चा हो जाएगा। ये सभी चीजे नये बच्चों के लिए परेशानी खड़ी करती है।

अभिषेक बताते है कि गंगा राम सक्सेना और ईयल दास दो लोग ऐसे थे जिन्होंने 1936 यहां थियेटर करना शुरू किया उसके बाद आज़मगढ़ में कई सारे थियेटर ग्रुप बनते बिगड़ते रहे। इलाहाबाद का समानांतर ग्रुप यहीं पर बना था। शुरूआत में बच्चों को क्लास देने के लिए बुलाना पड़ता था लेकिन अब वो खुद मुझे फोन करते है एक्टिंग सीखने के लिए।

कैसे बच्चों को दिखाते है मिनिंग फुल सिनेमा

अभिषेक की पूरी कोशिश रहती है कि वो बच्चों को मिनिंग फुल सिनेमा से परिचय कराए। मिनिंग फुल सिनेमा के लिए वो जैसे थ्रियटर फेस्टिवल में नाटक बाहर से बुलाकर उन्हें दिखाते है, वैसे ही फिल्मे दिखाते हैं। वो फिल्में जो कम बजट में बनी और खूब नाम कमाया। ये फिल्में अभिषेक आज़मगढ़ के बच्चों को फ्री में दिखाता है। फिल्म फेस्टिवल में जो बड़ी बड़ी हस्तियां आती है वो हमारे फेस्टिवल ऑर्गनाइज करने के तरीके को सराहाते है। फेस्टिवल में आने और बच्चों को वर्कशॉप देते है जिसका वो एक भी पैसा नहीं लेते। अभिषेक चाहते है कि आज़मगढ़ में एक थियेटर आर्टस का एक डिपार्टमेंट होना चाहिए, यहां एक कला भवन है जिसे अच्छे से बनाकर ट्रेनिंग देनी शुरू चाहिए और राहुल ऑडिटोरियम में परफॉर्मिस शुरू करनी चाहिए।

ये भी पढ़ें: मोहम्मद आशिक और मर्लिन: एक अनोखी कहानी जिसने बदल दिया शिक्षा का परिपेक्ष्य

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