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हबीब जालिब: अवाम की आवाज़ और इंक़िलाब का शायर

उर्दू अदब में जब भी ऐसे शायरों का ज़िक्र होता है जिन्होंने अपनी शायरी को सिर्फ़ इश्क़ और हुस्न तक महदूद नहीं रखा, बल्कि उसे ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ और अवाम की ताक़त बनाया, तो हबीब जालिब का नाम सबसे आगे आता है। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी सच बोलने, इंसाफ़ की हिमायत करने और हर तरह की तानाशाही का डटकर मुक़ाबला करने में गुज़ार दी। उनकी शायरी आम इंसान की ज़ुबान थी, इसलिए उनके अशआर सीधे लोगों के दिलों तक पहुंचते थे।

 लोग डरते हैं दुश्मनी से तिरी
हम तिरी दोस्ती से डरते हैं

हबीब जालिब का असली नाम हबीब अहमद था। उनकी पैदाइश 24 मार्च 1929 को ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत के होशियारपुर ज़िले के एक गांव में हुयी। भारत के बंटवारे के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया और कराची में बस गया। शुरुआती दिनों में उन्होंने मशहूर अख़बार ‘डेली इमरोज़’ में प्रूफ़रीडर के तौर पर काम किया। इसी दौरान उनकी शायरी को पहचान मिलनी शुरू हुई।

हबीब जालिब की सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि उन्होंने मुश्किल अल्फ़ाज़ या पेचीदा अंदाज़-ए-बयां का सहारा नहीं लिया। उनकी शायरी आसान ज़बान में होती थी, लेकिन उसके मायने बेहद गहरे होते थे। वे ग़रीबों, मज़दूरों, किसानों और आम लोगों के दुख-दर्द को अपनी नज़्मों और ग़ज़लों में जगह देते थे। यही वजह है कि उन्हें “अवाम का शायर” कहा जाता है।

जालिब हर उस हुकूमत के ख़िलाफ़ खड़े हुए, जिसने लोकतंत्र को कमज़ोर किया या लोगों की आवाज़ दबाने की कोशिश की। उन्होंने मार्शल लॉ, तानाशाही और हर तरह के ज़ुल्म का खुलकर विरोध किया। उनकी मशहूर नज़्म “दस्तूर” आज भी प्रतिरोध और आज़ादी की सबसे बुलंद आवाज़ मानी जाती है। इसके कुछ अशआर आज भी हर दौर में उतने ही असरदार महसूस होते हैं।

दीप जिस का महल्लात ही में जले,
चंद लोगों की ख़ुशियों को लेकर चले।


ऐसे दस्तूर को, सुबह-ए-बे-नूर को,
मैं नहीं मानता, मैं नहीं जानता।

यह नज़्म सिर्फ़ एक हुकूमत के ख़िलाफ़ नहीं थी, बल्कि हर उस निज़ाम के ख़िलाफ़ थी जो इंसाफ़ और बराबरी से दूर हो।

हबीब जालिब की शायरी में सिर्फ़ सियासत नहीं, बल्कि इंसानी रिश्तों की सच्चाई भी नज़र आती है। उनके कई अशआर आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं।  

लोग डरते हैं दुश्मनी से तिरी,
हम तिरी दोस्ती से डरते हैं।


पा सकेंगे न उम्र भर जिस को,
जुस्तुजू आज भी उसी की है।

उनकी शायरी में दर्द भी है, मोहब्बत भी, बग़ावत भी और उम्मीद भी। यही वजह है कि उनका कलाम हर दौर में नया महसूस होता है।

हबीब जालिब ने अपने अदबी सफ़र में कई अहम किताबें लिखीं। इनमें ‘सर-ए-मक़तल’, ‘ज़िक्र बहते ख़ून का’, ‘गुंबद-ए-बेदार’, ‘कुल्लियात-ए-हबीब जालिब’, ‘इस शहर-ए-ख़राबी में’, ‘गोशे में क़फ़स के’, ‘हर्फ़-ए-हक़’, ‘हर्फ़-ए-सर-ए-दार’ और ‘अहद-ए-सितम’ जैसी किताबें शामिल हैं। इन रचनाओं में उन्होंने अपने दौर की सियासत, समाज और इंसानी जज़्बात को बेबाकी से बयान किया।

ये भी पढ़ें: क़मर जलालाबादी: जिनकी क़लम से निकले सदाबहार नग़मे 

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