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गांव की चौखट से GI टैग तक: बिहार की पिड़िया कला की नई उड़ान

जब भी बिहार की लोककलाओं की बात होती है, सबसे पहले मधुबनी पेंटिंग का नाम सामने आता है। ये कला सालों से राज्य की सांस्कृतिक पहचान रही है। लेकिन बिहार की ज़मीन पर एक और ऐसी लोककला है, जो अब तक गांवों की चौखट के भीतर ही सिमटी हुई थी। इसका नाम है पिड़िया कला। हाल ही में इस कला को GI (जियोग्राफिकल इंडिकेशन) टैग मिलने के बाद इसकी चर्चा पूरे देश में होने लगी है। ये सम्मान सिर्फ़ एक लोककला को नहीं मिला, बल्कि उन अनगिनत ग्रामीण महिलाओं की मेहनत को भी मिला है, जिन्होंने इसे बिना किसी पहचान या पुरस्कार की चाह के पीढ़ियों तक संभालकर रखा।

क्या है पिड़िया कला?

पिड़िया कला बिहार के भोजपुर ज़िले की पारंपरिक लोकचित्रकला है। ये किसी आर्ट गैलरी या स्टूडियो में नहीं, बल्कि गांव के घरों की दीवारों पर जन्म लेती है। महिलाएं गोबर और मिट्टी से दीवारों को लीपने के बाद प्राकृतिक रंगों की मदद से उन पर अलग-अलग आकृतियां बनाती हैं। इन चित्रों में फूल, पत्तियां, पेड़, पक्षी, सूर्य, चंद्रमा, हाथी, कलश, देवी-देवताओं के प्रतीक और लोकजीवन से जुड़ी कई झलकियां दिखाई देती हैं। हर चित्र अपने भीतर लोकविश्वास, प्रकृति और परिवार से जुड़ी भावनाओं को समेटे होता है।

जब उंगलियां ही बन जाती हैं फ़नकार का औज़ार

आज के दौर में जहां हर कला महंगे रंगों और ब्रश की मोहताज नज़र आती है, वहीं पिड़िया कला की असली पहचान इसकी सादगी है। यहां किसी महंगे सामान की ज़रूरत नहीं होती। औरतें अपनी उंगलियों, हथेलियों या लकड़ी के छोटे-से टुकड़े से ऐसी खूबसूरत आकृतियां बनाती हैं कि हर रेखा में अपनापन महसूस होता है। ऐसा लगता है जैसे मिट्टी भी अपनी ज़बान में कोई दास्तान सुना रही हो। यही सादगी इस कला को सबसे अलग और दिल के क़रीब बना देती है।

सिर्फ़ दीवारों की सजावट नहीं, दुआओं का रंग

पिड़िया कला को सिर्फ़ सजावट कहना इसके मायने को छोटा कर देना होगा। गांवों में ये शुभ मौक़ों का अहम हिस्सा मानी जाती है। छठ पूजा हो, शादी-ब्याह, गृह प्रवेश, बच्चे की पैदाइश या नई फ़सल की ख़ुशी हर मौक़े पर घर की दीवारों पर पिड़िया कला बनाई जाती है। लोगों का यक़ीन है कि इन तस्वीरों के साथ घर में बरकत, सुकून और खुशहाली भी आती है। इसलिए जब कोई औरत दीवार पर सूरज, चांद या पेड़ बनाती है, तो वह सिर्फ़ तस्वीर नहीं बनाती, बल्कि अपने अपनों की सलामती और बेहतर ज़िंदगी की दुआ भी दीवार पर उकेर देती है।

मधुबनी और पिड़िया में क्या फर्क है?

अक्सर लोग पिड़िया कला को मधुबनी पेंटिंग समझ लेते है, जबकि दोनों का अपना अलग वजूद है। मधुबनी अपनी महीन रेखाओं, चटख रंगों और भरी हुई चित्रकारी के लिए मशहूर है। वहीं पिड़िया कला की जान उसकी सादगी में छिपी है। इसमें मिट्टी की दीवार ही कैनवास बन जाती है और खाली जगह भी उतनी ही अहम होती है, जितनी बनी हुई आकृतियां। अगर मधुबनी रंगों का जश्न है, तो पिड़िया मिट्टी की ख़ुशबू, गांव की मासूमियत और अपनेपन का एहसास है।

गांव की चौखट से दुनिया तक का सफ़र

बरसों तक पिड़िया कला गांवों की दीवारों तक ही सिमटी रही। लेकिन अब इसका सफ़र गांव की चौखट से निकलकर देश और दुनिया तक पहुंचने लगा है। अब GI टैग मिलने के बाद पिड़िया कला सिर्फ़ बिहार की नहीं, बल्कि पूरे मुल्क की साझा सांस्कृतिक विरासत बन चुकी है। अगर मधुबनी बिहार के रंगों की पहचान है, तो पिड़िया उसकी मिट्टी की ख़ुशबू है। एक दुनिया को बिहार की कला से रूबरू कराती है, तो दूसरी उसके गांवों, रिश्तों और वहां बसने वाली सादगी की दास्तान सुनाती है। शायद यही वजह है कि पिड़िया कला अब सिर्फ़ एक लोककला नहीं रही, बल्कि उन गुमनाम हाथों की आवाज़ बन गई है, जिन्होंने बरसों तक अपनी मोहब्बत को मिट्टी की दीवारों पर उकेरा।

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