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मुज़फ़्फ़र अली: एक फ़िल्मकार नहीं, तहज़ीब, इंसानियत और शायरी की ज़िंदा दास्तान

कुछ लोग फ़िल्में बनाते हैं और कुछ लोग फ़िल्मों के ज़रिए अपनी रूह की आवाज़ दुनिया तक पहुंचाते हैं। मुज़फ़्फ़र अली उन्हीं चुनिंदा फ़नकारों में शामिल हैं, जिनकी पहचान सिर्फ़ एक कामयाब फ़िल्म निर्देशक तक महदूद नहीं है। वे एक मुसव्विर हैं, शायरी के दिलदाद और सूफ़ियाना फ़िक्र के हामी भी हैं और सबसे बढ़कर गंगा-जमुनी तहज़ीब के ऐसे अमीन हैं, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इंसानियत को सबसे ऊपर रखा।

जब उनकी गुफ़्तगू शुरू होती है तो महसूस होता है कि जैसे कोई किताब नहीं, बल्कि सदियों की तहज़ीब बोल रही हो। उनके अल्फ़ाज़ में नफ़ासत है, ख़यालों में गहराई है और हर बात में अपनी मिट्टी से बेपनाह मोहब्बत झलकती है। यही वजह है कि उनके सिनेमा में सिर्फ़ कहानी नहीं होती, बल्कि एक पूरा दौर, एक पूरी रिवायत और इंसानी जज़्बातों की महक महसूस होती है।

अवध से शुरू हुई सिनेमा की दास्तान 

जब उनसे पूछा गया कि उनकी शुरुआती तालीम और अवध की सरज़मीं ने उनके फ़न को किस तरह तराशा, तो उनका जवाब किसी साधारण याद की तरह नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से मोहब्बत का इज़हार था।

वे कहते हैं— “मेरा पूरा फ़िल्मी सफ़र अवध से शुरू होता है। जब तक इंसान अपनी जड़ों को नहीं समझता, तब तक उनसे जुदा होने का दर्द भी महसूस नहीं कर सकता।”

उनकी यह बात महज़ एक जुमला नहीं, बल्कि पूरी ज़िंदगी का फलसफ़ा है।

मुज़फ़्फ़र अली के लिए अवध सिर्फ़ एक भौगोलिक इलाक़ा नहीं, बल्कि एक ज़िंदा एहसास है। लखनऊ की नफ़ासत, कोटवारा की मिट्टी, वहां की बोली, अदब, तहज़ीब और इंसानी रिश्तों की गर्माहट—इन्हीं सबने मिलकर उनके अंदर के फ़नकार को जन्म दिया।

वे मानते हैं कि जो इंसान अपनी जड़ों से कट जाता है, उसके फ़न में भी वह गहराई नहीं आ पाती जो किसी सच्चे कलाकार की पहचान होती है।

रूमी की मिसाल देते हुए वे कहते हैं कि जैसे बांसुरी अपने पेड़ से अलग होकर दर्द की आवाज़ बन जाती है, वैसे ही इंसान भी अपनी मिट्टी से दूर होकर अपने अंदर की कैफ़ियत को समझता है। शायद यही दर्द आगे चलकर फ़न में बदल जाता है।

तहज़ीब से महकता है हर एहसास

मुज़फ़्फ़र अली की नज़र में तहज़ीब किसी एक मज़हब या एक इलाक़े की जागीर नहीं होती।

वे कहते हैं कि जब इंसान अदब और तहज़ीब से जुड़ जाता है तो उसे दुनिया की हर संस्कृति में हुस्न नज़र आने लगता है। शायद इसी तलाश ने उन्हें कश्मीर तक पहुंचाया, जहां उन्होंने काम किया और उसी अपनापन के साथ किया, जैसे वे आज भी अवध में बैठे हों।

यही सोच उनकी फ़िल्मों में भी दिखाई देती है। उनके किरदार कभी किसी एक पहचान में कैद नहीं होते। वे इंसानियत की ज़बान बोलते हैं।

“अगर मेरे वालिद न होते, तो मैं इंसान भी न होता”

हर बड़े इंसान के पीछे कोई न कोई ऐसी शख़्सियत होती है, जिसने उसकी सोच की बुनियाद रखी हो। मुज़फ़्फ़र अली के लिए यह मुक़ाम उनके वालिद मरहूम सैयद हुसैन साहब का है।

जब उनसे पूछा गया कि उनके वालिद का उनकी ज़िंदगी पर क्या असर रहा, तो उन्होंने बिना किसी तअम्मुल के कहा—

“अगर वो मेरी ज़िंदगी में न होते, तो मैं मैं न होता… मैं एक इंसान भी न होता।”

यह जवाब सुनकर साफ़ महसूस होता है कि उन्होंने अपने पिता से सिर्फ़ तालीम नहीं, बल्कि इंसान होने का हुनर सीखा। उनके मुताबिक़ इंसानियत, दीन, धर्म, मज़हब और हर पहचान से बड़ी चीज़ है। जब तक इंसान अपने और दूसरों के बीच की दीवारें नहीं गिराता, तब तक वह न अच्छा इंसान बन सकता है और न ही सच्चा फ़नकार।

यही वजह है कि उनकी हर फ़िल्म में इंसानी रिश्ते सबसे बड़ी ताक़त बनकर सामने आते हैं।

बंटवारे के दौर में इंसानियत की सबसे ख़ूबसूरत मिसाल

साल 1947 का बंटवारा हिंदुस्तान के इतिहास का सबसे दर्दनाक बाब था। लाखों लोग उजड़ गए, बस्तियां वीरान हो गईं और इंसान मज़हब के नाम पर एक-दूसरे से जुदा हो गए।

लेकिन इसी दौर में कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने नफ़रत की नहीं, मोहब्बत की इबारत लिखी।

मुज़फ़्फ़र अली अपने वालिद का ज़िक्र करते हुए बताते हैं कि जब बंटवारे के बाद सिख परिवार बेघर हुए, तब उनके पिता ने अपनी हज़ारों एकड़ ज़मीन उनके पुनर्वास के लिए दे दी। उन्होंने विनोबा भावे के साथ मिलकर विस्थापित परिवारों को बसाने में अहम भूमिका निभाई।

यह उस गंगा-जमुनी तहज़ीब की रूह थी, जिसमें इंसान पहले आता है और उसकी पहचान बाद में।

मुज़फ़्फ़र अली कहते हैं कि आज शायद बहुत से लोग इस घटना को भूल चुके हों, लेकिन ऐसे अमल इंसान के किरदार में हमेशा ज़िंदा रहते हैं।

यही वजह है कि उनके लिए इंसानियत कोई किताब का सबक़ नहीं, बल्कि घर की परवरिश का हिस्सा रही है।

ये भी पढ़ें: क़मर जलालाबादी: जिनकी क़लम से निकले सदाबहार नग़मे 

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