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जदीद उर्दू फ़िक्शन का बादशाह: मुंशी प्रेमचंद की क़लम जिसने समाज का आईना दिखाया

“बेहतरीन अफ़साना वही है जिसकी बुनियाद इंसानी नफ़्सियात पर रखी जाए। कोई इंसान मुकम्मल तौर पर बुरा नहीं होता, उसके अंदर कहीं न कहीं एक फ़रिश्ता ज़रूर छुपा होता है। उस छुपे हुए फ़रिश्ते को पहचान कर दुनिया के सामने लाना ही एक कामयाब अफ़साना-निगार का हुनर है।”

मुंशी प्रेमचंद

उर्दू और हिन्दी अदब की दुनिया में अगर किसी एक नाम ने कहानी और उपन्यास को नई ज़िंदगी बख़्शी, तो वह नाम है मुंशी प्रेमचंद। हिन्दी में उन्हें “उपन्यास सम्राट” कहा जाता है, जबकि उर्दू अदब उन्हें जदीद अफ़साना-निगारी का सबसे बड़ा रहनुमा मानता है। उन्होंने अपनी क़लम से सिर्फ़ कहानियां नहीं लिखीं, बल्कि हिंदुस्तान के समाज, ग़रीबी, इंसाफ़, और इंसानियत की ऐसी तस्वीर पेश की जो आज भी उतनी ही ताज़ा महसूस होती है।

31 जुलाई 1880 को बनारस के क़रीब लमही गांव में पैदा हुए प्रेमचंद का असली नाम धनपत राय था। बचपन का नाम नवाब राय था और इसी नाम से उन्होंने लिखना शुरू किया। उनके वालिद डाकख़ाने में मामूली नौकरी करते थे। घर की माली हालत कमज़ोर थी और जब प्रेमचंद सिर्फ़ सात साल के थे, तभी उनकी मां का इंतिक़ाल हो गया। कुछ समय बाद पिता ने दूसरी शादी कर ली। इन हालात ने उनके बचपन को तकलीफ़ों से भर दिया, लेकिन यही मुश्किलें आगे चलकर उनकी रचनाओं की सबसे बड़ी ताक़त बनीं।

बचपन में उन्होंने गांव के मकतब में मौलवी साहब से तालीम हासिल की। किताबों से उन्हें ऐसी मोहब्बत हुई कि ग़रीबी के बावजूद जो भी किताब हाथ लगती, उसे पढ़ डालते। उर्दू के मशहूर नॉवेल-निगारों रतननाथ सरशार, अब्दुल हलीम शरर और मिर्ज़ा हादी रुसवा की रचनाओं ने उनके ज़ेहन पर गहरा असर छोड़ा।

ज़िंदगी की मुश्किलें यहीं ख़त्म नहीं हुईं। कम उम्र में उनकी शादी कर दी गई, फिर पिता का भी इंतिक़ाल हो गया। घर की सारी ज़िम्मेदारियां उनके कंधों पर आ गईं। वे पैदल कई मील चलकर ट्यूशन पढ़ाते, रात को दीये की रोशनी में पढ़ाई करते और आख़िरकार नौकरी हासिल की। मगर जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन का आह्वान किया, तो प्रेमचंद ने देशहित को अपनी नौकरी पर तरजीह दी और करीब बीस साल पुरानी सरकारी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया। यह फ़ैसला उनकी वतनपरस्ती और उसूलों की सबसे बड़ी मिसाल बन गया।

प्रेमचंद ने अपने साहित्य में उन लोगों को आवाज़ दी जिन्हें समाज अक्सर नज़रअंदाज़ कर देता था। किसान, मज़दूर, ग़रीब, दलित, औरतें और बेबस लोग उनके अफ़सानों और उपन्यासों के असली किरदार बने। उनकी ख़ासियत यह थी कि वे अपने पात्रों को हीरो नहीं बनाते थे, बल्कि उन्हें इंसान की तरह पेश करते थे उनकी कमज़ोरियों, अच्छाइयों और अंदर चल रहे जज़्बाती संघर्ष के साथ।

औरतों के बारे में उनकी सोच अपने दौर से बहुत आगे थी। ‘सेवासदन’, ‘निर्मला’ और दूसरी रचनाओं में उन्होंने औरत की इज़्ज़त, उसके अधिकार और समाज की नाइंसाफ़ियों को बेबाकी से पेश किया। उनके यहां औरत सिर्फ़ कहानी का किरदार नहीं, बल्कि समाज की रूह बनकर सामने आती है।

उनकी अदबी ज़िंदगी की शुरुआत उर्दू से हुई। शुरुआती उपन्यास ‘इसरार-ए-मआबिद’, ‘हम ख़ुरमा-ओ-हम सवाब’, ‘बाज़ार-ए-हुस्न’ और बाद में हिन्दी में प्रकाशित ‘सेवासदन’, ‘रंगभूमि’, ‘निर्मला’, ‘ग़बन’, ‘कर्मभूमि’ और ‘गोदान’ ने उन्हें अमर बना दिया। उनकी आख़िरी रचना ‘मंगलसूत्र’ अधूरी रह गई।

कहानी के मैदान में भी प्रेमचंद का कोई सानी नहीं था। उनकी पहली मशहूर कहानी ‘दुनिया का सबसे अनमोल रतन’ थी। इसके बाद ‘सोज़-ए-वतन’, ‘प्रेम पच्चीसी’, ‘प्रेम बत्तीसी’, ‘दूध की क़ीमत’ और सैकड़ों अफ़सानों ने उर्दू और हिन्दी दोनों अदब को नई दिशा दी। अंग्रेज़ हुकूमत ने उनके पहले कहानी-संग्रह ‘सोज़-ए-वतन’ को बाग़ी ख़यालात वाला मानकर ज़ब्त कर लिया और उसकी प्रतियां जला दीं। इसके बाद उन्होंने “नवाब राय” की जगह “प्रेमचंद” के नाम से लिखना शुरू किया।

उनकी ज़बान बेहद सादा, दिल में उतर जाने वाली और आम बोलचाल के क़रीब थी। उन्होंने साबित किया कि बड़ी बात कहने के लिए मुश्किल अल्फ़ाज़ की नहीं, बल्कि सच्चे एहसास की ज़रूरत होती है। यही वजह है कि उनके अफ़साने पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे हमारे आस-पास के लोग ही कहानी के किरदार बन गए हों।

8 अक्तूबर 1936 को प्रेमचंद इस दुनिया से रुख़्सत हो गए, लेकिन उनकी क़लम आज भी ज़िंदा है। उन्होंने उर्दू और हिन्दी फ़िक्शन को तिलिस्मी और काल्पनिक दुनिया से निकालकर इंसान और समाज की हक़ीक़त से जोड़ दिया। उनकी रचनाएं हमें सिर्फ़ मनोरंजन नहीं देतीं, बल्कि सोचने, महसूस करने और बेहतर इंसान बनने की दावत भी देती हैं।

यही वजह है कि मुंशी प्रेमचंद को सिर्फ़ हिन्दी का “उपन्यास सम्राट” नहीं, बल्कि जदीद उर्दू फ़िक्शन का बादशाह भी कहा जाता है। उनकी क़लम ने अदब को इंसानियत का आईना बना दिया और आने वाली नस्लों के लिए ऐसा रास्ता तैयार किया, जिस पर आज भी उर्दू और हिन्दी का कथा-साहित्य फ़ख़्र के साथ चल रहा है।

ये भी पढ़ें: क़मर जलालाबादी: जिनकी क़लम से निकले सदाबहार नग़मे 

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