उर्दू अदब की दुनिया में कुछ ऐसे शायर भी गुज़रे हैं, जिनकी शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का खेल नहीं, बल्कि उनकी अपनी ज़िंदगी का आईना होती है। सुरूर जहांनाबादी भी ऐसे ही शायर थे। उनकी ग़ज़लों में इश्क़ की नर्मी, नज़्मों में वतन की मोहब्बत और अशआर में इंसानी जज़्बात की गहराई साफ़ महसूस होती है।
दुर्गा सहाय से सुरूर जहांनाबादी बनने तक
सुरूर जहांनाबादी का असली नाम दुर्गा सहाय था। उनकी पैदाइश दिसंबर 1873 में उत्तर प्रदेश के जहांनाबाद (ज़िला पीलीभीत) में हुयी। शुरुआती तालीम अपने कस्बे के तहसीली स्कूल में हासिल की।
बचपन में ही उन्हें फ़ारसी ज़बान सीखने का मौक़ा मिला। मशहूर आलिम सैयद करामत हुसैन उनके उस्ताद थे। उन्हीं की सोहबत में सुरूर के दिल में शायरी का शौक़ पैदा हुआ। धीरे-धीरे यह शौक़ जुनून में बदल गया और उन्होंने बाक़ायदा शे’र कहना शुरू कर दिया।
उन्होंने अंग्रेज़ी मिडिल की परीक्षा भी पास की। शायरी के शुरुआती दिनों में उनका तख़ल्लुस “वहशत” था, लेकिन बाद में उन्होंने “सुरूर” नाम अपना लिया और इसी नाम से पूरी उर्दू दुनिया में पहचाने गए।
नज़्म को नई पहचान देने वाले शायर
सुरूर जहांनाबादी का कलाम अपने दौर के दूसरे शायरों से कुछ अलग था। उनकी नज़्मों में नए मौज़ू, नई सोच और अलग अंदाज़ दिखाई देता था।
यही वजह थी कि उनकी ग़ज़लें और नज़्में उस ज़माने की मशहूर अदबी पत्रिकाओं ‘अदीब’ और ‘मख़ज़न’ में लगातार प्रकाशित होती रहीं।
उर्दू नज़्म को विषय और शैली—दोनों स्तरों पर समृद्ध बनाने में सुरूर का अहम योगदान माना जाता है। उन्होंने यह साबित किया कि नज़्म सिर्फ़ इश्क़ की कहानी नहीं, बल्कि समाज, इंसानियत, वतन और ज़िंदगी के हर पहलू को बयान करने का ज़रिया भी हो सकती है।
ज़िंदगी का सबसे बड़ा सदमा
हर मुस्कुराते चेहरे के पीछे कोई न कोई दर्द छिपा होता है। सुरूर जहांनाबादी की ज़िंदगी भी इससे अलग नहीं थी।
उनकी बीवी और इकलौते बेटे का इंतक़ाल उनके लिए ऐसा सदमा था जिससे वे कभी पूरी तरह उबर नहीं सके। इस ग़म ने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया।
अपने इस ख़ालीपन को भरने के लिए उन्होंने शराब का सहारा लिया। धीरे-धीरे यह आदत इतनी बढ़ गई कि वही उनकी सेहत की सबसे बड़ी दुश्मन बन गई। आख़िरकार ज़्यादा मदिरापान ही उनकी मौत की वजह बना।
अपनी मिट्टी है कहां की क्या ख़बर बाद-ए-सबा,
हो परेशां देखिए किस-किस जगह मुश्त-ए-ग़ुबार।
बजाए मय दिया पानी का इक गिलास मुझे,
समझ लिया मिरे साक़ी ने बद-हवास मुझे।
वतन से मोहब्बत उनकी शायरी की रूह थी
सुरूर जहांनाबादी सिर्फ़ इश्क़ के शायर नहीं थे। उनकी शायरी में मुल्क से बेपनाह मोहब्बत भी दिखाई देती है।
फूलों का कुंज-ए-दिलकश भारत में इक बनाएं,
हुब्ब-ए-वतन के पौदे इस में नए लगाएं।
इस नज़्म में वे एक ऐसे हिंदुस्तान का सपना देखते हैं जहां मोहब्बत, भाईचारा और इंसानियत के फूल खिलें। वे चाहते हैं कि हर दिल में वतन की मुहब्बत और एकता की ख़ुशबू बस जाए।
गंगा की तारीफ़ में लिखे यादगार अशआर
सुरूर जहांनाबादी ने भारत की तहज़ीब और उसकी पहचान को भी अपनी शायरी में जगह दी। गंगा नदी की तारीफ़ में लिखा उनका यह शे’र आज भी पढ़ा जाता है।
ऐ आब-रूद-ए-गंगा उफ़ री तिरी सफ़ाई,
ये तेरा हुस्न दिलकश, ये तर्ज़-ओ-दिल-रुबाई।
इन दो मिसरों में गंगा की पाकीज़गी और उसकी ख़ूबसूरती दोनों का बेहद असरदार चित्र मिलता है।
इश्क़ की नर्मी भी, रूहानियत की ख़ुशबू भी
सुरूर की ग़ज़लों में मोहब्बत की नज़ाकत भी है और रूहानी एहसास भी।
दिल-ए-बेताब को सीने से लगा ले आ जा,
कि संभलता नहीं कम-बख़्त संभाले आ जा।
और जब बात इंसानियत और ईश्वर की आती है, तो उनका नज़रिया किसी एक मज़हब तक सीमित नहीं रहता।
आग़ाज़ है कुछ तरह न अंजाम तिरा,
बंदों पे हमेशा लुत्फ़ है आम तिरा।
मंदिर में है, हर ख़ुदा है तू मस्जिद में,
जपते हैं शैख़-ओ-बरहमन नाम तिरा।
इन अशआर में गंगा-जमुनी तहज़ीब की वह ख़ूबसूरत रूह दिखाई देती है जिसमें मंदिर और मस्जिद दोनों एक ही ख़ुदा की तलाश का रास्ता बन जाते हैं।
सुरूर जहांनाबादी की विरासत
सुरूर जहांनाबादी ने उर्दू शायरी को सिर्फ़ ख़ूबसूरत अल्फ़ाज़ नहीं दिए, बल्कि नई सोच भी दी। उन्होंने नज़्म को नए मौज़ू दिए, वतन से मोहब्बत का पैग़ाम दिया, इंसानियत की आवाज़ बुलंद की और अपने निजी दर्द को भी शायरी के ज़रिये हमेशा के लिए ज़िंदा कर दिया।
आज जब उनकी शायरी पढ़ी जाती है, तो उसमें एक साथ कई रंग नज़र आते हैं इश्क़, ग़म, वतनपरस्ती, रूहानियत और इंसानी एकता। यही रंग सुरूर जहांनाबादी को उर्दू अदब के उन शायरों में शामिल करते हैं, जिनका कलाम वक़्त गुज़रने के बाद भी अपनी ताज़गी और असर बरक़रार रखता है।
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