आज के मॉडर्न दौर में, जहां हर छोटी-बड़ी इंडस्ट्री बिजली, डीज़ल या महंगे ईंधन पर निर्भर है, वहीं पंजाब के एक कोने में सदियों पुरानी एक कुदरती तकनीक आज भी काम कर रही है। इसे Sullar Gharat (सुल्लर घराट) कहा जाता है, जहां आटा चक्की बिना बिजली, डीज़ल या किसी भी तरह के ईंधन के सिर्फ़ बहते पानी (हाइड्रो एनर्जी) की ताक़त से चलती है।
यहां बहने वाली नदी या नहर का पानी सिर्फ़ आम पानी नहीं, बल्कि ऊर्जा का एक बड़ा ज़रिया है, जो सदियों से लगातार इस चक्की को चलाता आ रहा है। ये पारंपरिक आटा चक्की कई सौ सालों से बिना रुके काम कर रही है और आज के डिजिटल दौर में भी अपनी अहमियत और पहचान को मज़बूती से बनाए हुए है।
पुरानी विरासत को नई उम्मीद और नई ज़िंदगी
इस कई साल पुरानी ऐतिहासिक विरासत को मिटने से बचाने और इसे नई पहचान देने में करणवीर सिंह गिल की अहम भूमिका रही है। साल 2025 में उन्होंने Sullar Gharat (सुल्लर घराट) को सरकार से ठेके पर लिया था। करणवीर सिंह गिल बताते हैं कि जब उन्होंने ये जगह संभाली, तब यहां की चक्कियों की हालत बेहद खराब थी। इसके बाद उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर इसकी मरम्मत की। सबसे ख़ास बात ये रही कि उन्होंने इसकी पुरानी बनावट, रिवायती ढांचे और सांस्कृतिक पहचान से कोई छेड़छाड़ नहीं की।
उन्होंने आटा पीसने के पुराने तरीके और सिस्टम को पहले की तरह बरकरार रखा, लेकिन साथ ही सफाई और रखरखाव के इंतज़ाम में काफी सुधार किया। आज ये जगह अपनी पुरानी विरासत को संभाले हुए, नए दौर के हिसाब से भी बेहतर तरीके से काम कर रही है।

1875 का इतिहास और अंग्रेज़ों की अनोखी तकनीक
डिपार्टमेंट से मिले दस्तावेज़ों के मुताबिक, Sullar Gharat (सुल्लर घराट) का इतिहास कम से कम साल 1875 का है। यानी ये आटा चक्की करीब 150 साल पुरानी है। इसकी तारीख़ी अहमियत बताते हुए करणवीर सिंह गिल ने कहा कि इन घराटों की शुरुआत अंग्रेज़ों के दौर में हुई थी। जब अंग्रेज़ पंजाब में सिंचाई के लिए नहरें बना रहे थे, तब जहां-जहां पानी ऊंचाई से नीचे गिरता था, वहां बहते पानी की ताक़त का इस्तेमाल करने के लिए ये तकनीक अपनाई गई।
उन्होंने बताया कि बड़े बांधों से बिजली बनाने की तकनीक आने से बहुत पहले ही अंग्रेज़ों ने नहरों के किनारे ‘चक्की नाला’ तैयार किया था। इसके ज़रिए बहते पानी की रफ़्तार और गिरावट से चक्कियां चलाई जाती थी। जहां पानी करीब 10 से 15 फीट की ऊंचाई से गिरता था, वहां ये घराट बिना बिजली और किसी ईंधन के आसानी से काम करते थे।

घराट कैसे काम करता है? जानिए इसका आसान साइंस
इस आटा चक्की का तरीका बहुत आसान, कुदरती और असरदार है। नहर से निकाले गए ‘चक्की नाले’ के ज़रिए पानी तेज़ रफ़्तार से बहकर आता है और चक्की के नीचे लगे प्रोपेलर (पंखों) से टकराता है। इसका साइंस समझाते हुए करणवीर सिंह गिल बताते हैं कि पानी की तेज़ रफ़्तार से पैदा होने वाली ऊर्जा इन प्रोपेलरों को घुमाने लगती है। ये प्रोपेलर एक शाफ्ट के ज़रिए ऊपर लगी चक्की के पाट से जुड़े होते हैं।
जैसे ही नीचे लगा प्रोपेलर पानी की ताक़त से घूमता है, वैसे ही ऊपर लगी चक्की का पाट भी घूमने लगता है। इसके बाद अनाज की पिसाई शुरू हो जाती है। सबसे ख़ास बात ये है कि इस पूरी प्रक्रिया में न बिजली की ज़रूरत पड़ती है, न डीज़ल की और न ही किसी दूसरे ईंधन की। सिर्फ़ बहते पानी की ताक़त से पूरी चक्की आसानी से चलती रहती है।
पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं, इसलिए निकलता है ठंडा आटा
आजकल बिजली से चलने वाली मॉडर्न आटा चक्कियां बहुत तेज़ रफ़्तार से घूमती हैं। इस वजह से अनाज पीसते समय उनमें काफी गर्मी पैदा होती है। करणवीर सिंह गिल बताते हैं कि इस ज़्यादा गर्मी की वजह से आटे में मौजूद ज़रूरी पोषक तत्व, जैसे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और मिनरल्स, काफी हद तक प्रभावित हो जाते हैं। वैज्ञानिक भाषा में इसे ‘ऐश कंटेंट’ बढ़ना या पोषण में कमी आना कहा जाता है।

इसके उलट, घराट की चक्की बहुत धीमी रफ़्तार से चलती है। ये एक मिनट में सिर्फ़ 30 चक्कर (30 RPM) लगाती है। चूंकि ये पूरी तरह बहते पानी की ताक़त से चलती है, इसलिए पीसाई के दौरान ज़्यादा गर्मी पैदा नहीं होती। इसी वजह से इस चक्की से निकलने वाला आटा बिल्कुल ठंडा रहता है और गेहूं के ज़्यादातर कुदरती पोषक तत्व सुरक्षित बने रहते हैं।
घराट के आटे के सेहतमंद फ़ायदे
Sullar Gharat (सुल्लर घराट) में काम करने वाले साधू सिंह बताते हैं कि पहले के बुज़ुर्ग इस चक्की के आटे की खूबियों को अच्छी तरह जानते थे। यही वजह थी कि वो अपने बच्चों को साइकिल पर यहां आटा पिसवाने के लिए भेजते थे। उन्होंने बताया कि यहां के स्थानीय लोगों का करीब 30–35 साल का तजुर्बा कहता है कि इस आटे से बनी रोटी बेहद मुलायम और ठंडी रहती है।
वहीं, आधुनिक चक्कियों के आटे से बनी रोटी कुछ ही देर में सख़्त होने लगती है। इसके मुकाबले, घराट के आटे की रोटी लंबे समय तक नरम और ताज़ा बनी रहती है। यही वजह है कि जो व्यक्ति एक बार इस घराट का आटा खा लेता है, वो फिर किसी दूसरे आटे को आसानी से पसंद नहीं करता।

मल्टीग्रेन और अलग-अलग अनाजों की पिसाई
Sullar Gharat (सुल्लर घराट) में सिर्फ़ गेहूं ही नहीं, बल्कि करीब हर तरह के मोटे अनाज (मिलेट्स) भी पीसे जाते हैं। करणवीर सिंह गिल बताते हैं कि यहां जौ, ज्वार, रागी, बाजरा और मक्के की पिसाई लोगों की ज़रूरत के मुताबिक की जाती है। ख़ास तौर पर यहां के मक्के के आटे की क्वालिटी को सबसे बेहतर माना जाता है।
लोगों की बदलती ज़रूरत को देखते हुए यहां मल्टीग्रेन आटा भी तैयार किया जा रहा है, जिसे ग्राहकों से काफी अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है। हालांकि, जिन अनाजों में तेल की मात्रा ज़्यादा होती है, जैसे सोयाबीन, उन्हें यहां नहीं पीसा जाता। इसकी वजह ये है कि उनमें मौजूद तेल चक्की के पत्थर के पाट को नुकसान पहुंचा सकता है।

सफाई में सुधार और भविष्य की योजनाएं
पहले के समय में घराट की सबसे बड़ी परेशानी साफ़-सफाई थी। आटा पीसने के बाद वो सीधे ज़मीन पर गिर जाता था, जिसे बाद में झाड़ू से इकट्ठा करके बोरियों में भरा जाता था। करणवीर सिंह गिल बताते हैं कि पिछले एक साल में उन्होंने इस व्यवस्था को बेहतर बनाने पर ख़ास ध्यान दिया है। अब आटा पीसने की पूरी प्रक्रिया को पहले से कहीं ज़्यादा साफ़ और बेहतर बनाया गया है, ताकि लोगों तक पूरी तरह साफ़ और शुद्ध आटा पहुंच सके।
उन्होंने आगे कहा कि अब उन्हें इस Sullar Gharat (सुल्लर घराट) का लंबे समय के लिए ठेका मिल गया है। इसलिए उनकी कोशिश है कि इस पूरे सिस्टम को आधुनिक सुविधाओं के साथ और ज़्यादा साफ़-सुथरा बनाया जाए, जबकि इसकी पुरानी पहचान और विरासत भी बरकरार रहे। उनका मक़सद पंजाब की इस अनमोल और धीरे-धीरे गुम होती विरासत को न सिर्फ़ बचाना है, बल्कि उसे देश और दुनिया के सामने नई पहचान दिलाना भी है।
स्टोरी– मनमीत कौर
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