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पत्थरों की रगड़ और पानी की धार: Zulfikar Ali Shah की उस चक्की की दास्तान जो वक़्त के साथ नहीं थमी

कश्मीर की वादियों में, जहां झरने की मधुर आवाज़ हर पल गूंजती रहती है, वहीं इन बहते पानी के बीच एक पुरानी परंपरा अब भी ज़िंदा है ‘आब-ए-ग्रट्टा’ (Aab-E-Gratta), यानी बहते पानी के बल के ज़रिए चलने वाली आटा चक्की। ये चक्की न सिर्फ़ आटा पीसने का ज़रिया है, बल्कि कश्मीर की संस्कृति और परंपरा का प्रतीक भी है। आज के मॉर्डन दौर में, जहां मशीनों की आवाज़ ने कुदरत की आवाज़ को लगभग दबा दिया है, वहीं गांदरबल, कश्मीर के रहने वाले Zulfikar Ali Shah अपने पिता की छोड़ी हुई इस परंपरा को आज भी पूरी लगन से संभाले हुए हैं।

जब परंपरा बन गई ज़िंदगी का मक़सद

Zulfikar Ali Shah बताते हैं, ‘मैं करीब 35 सालों से ये चक्की चला रहा हूं। जब मेरे वालिद साहब का इंतकाल हुआ, तब मैं स्कूल में पढ़ता था। घर में कोई सहारा नहीं था। तब मैंने स्कूल छोड़ दिया और ये काम संभाल लिया। आज तक इसी काम में मशगूल हूं।’ उनकी आंखों में अपने पिता की यादें और इस विरासत को ज़िंंदा रखने का गर्व दोनों झलकते हैं। ये चक्की उनके पिता के वक्त की बनी हुई है, जिसमें लोहे का बहुत कम इस्तेमाल हुआ है। इसमें ज़्यादातर लकड़ी और पत्थर का ही इस्तेमाल किया गया है।

कैसे चलती है ‘आब-ए-ग्रट्टा’ चक्की

Zulfikar की पानी वाली चक्की को काम करते देखना किसी जादू से कम नहीं लगता। पहाड़ों से बहता ठंडा पानी एक लकड़ी की नाली, जिसे ‘नाला’ कहते हैं, से होकर चक्की तक आता है। ये पानी लकड़ी के पंखों (ब्लेड) से टकराता है जो एक बड़े पहिये से जुड़े होते हैं। ये पानी का पहिया लकड़ी के सहारे भारी पत्थर की चक्कियों से जुड़ा होता है। जब पानी पंखों पर गिरता है, तो पूरा पहिया घूमने लगता है। इस घूमने से ऊपरी पत्थर नीचे वाले पत्थर पर गोल-गोल घूमता है। मक्की, चावल या गेहूं जो भी दाना हो इन दो पत्थरों के बीच डाला जाता है। पत्थर आपस में रगड़ खाते हैं, जिससे अनाज पीसकर बारीक आटा बन जाता है।

Zulfikar Ali Shah बताते हैं, ‘जब चक्की चलती है तो पत्थर बहुत गर्म हो जाते हैं, जैसे आग से निकले हों। जब पत्थर गर्म होते हैं तो हम सिर्फ़ मक्की पीसते हैं। चावल या गेहूं पीसने से पहले हमें पत्थर ठंडे होने का इंतज़ार करना पड़ता है।’ यही गर्मी इस आटे को ख़ास बनाती है। पत्थरों की रगड़ से जो प्राकृतिक गर्मी पैदा होती है, उससे बना आटा एक साल तक ख़राब नहीं होता और न ही कड़वा पड़ता है जबकि मशीन से पिसे आटे में ऐसा नहीं होता।

अनमोल पत्थरों से बनती है बेहतरीन पिसाई

ये चक्की किसी आम पत्थर से नहीं बनती। इसके लिए ख़ास पत्थर पास के जंगलों से लाए जाते हैं। ये पत्थर काफी नरम होते हैं, ताकि इन्हें आसानी से तोड़ा जा सके। Zulfikar Ali Shah बताते हैं कि, ‘अगर ऊपर का पत्थर थोड़ा सख़्त हो, तो नीचे का थोड़ा नरम होना चाहिए। तभी सही घर्षण बनता है और आटा अच्छा तैयार होता है।’ इन पत्थरों को पहचानने और सही तरह से तराशने का हुनर भी लोकल मिस्त्रियों के पास ही होता है, जो बिना किसी तकनीकी शिक्षा के सिर्फ़ अनुभव और समझ के आधार पर इन्हें बनाते हैं।

आटे के लिए दूर-दूर से आते लोग

आज भी सोनमर्ग, कंगन, धारा, हारवन और श्रीनगर जैसे इलाकों से लोग Zulfikar Ali Shah की चक्की पर मक्का पिसवाने आते हैं।’हम पांच किलो मक्की पर सिर्फ़ आधा किलो आटा मज़दूरी के लेते हैं,’ वो मुस्कुराते हुए बताते हैं। ‘सालों से यही रिवाज़ है। महंगाई बढ़ी, लेकिन हमने अपनी मेहनताना नहीं बढ़ाया। हम बस इतना ही लेते हैं, क्योंकि ये काम हमारे बुज़ुर्गों की अमानत है।’ डॉक्टर भी शुगर के मरीजों को ये आटा खाने की सलाह देते हैं, क्योंकि ये आटा हल्का और ज़्यादा सेहतमंद होता है।

धीरे-धीरे ख़त्म हो रही परंपरा

पहले इस इलाके में ऐसी करीब कई चक्कियां थीं, लेकिन अब सिर्फ़ दो-तीन ही बची हैं। नई पीढ़ी अब इस काम में दिलचस्पी नहीं लेती। खेती घट गई, मक्की की पैदावार कम हो गई, और मेहनत करने वालों की संख्या घटती जा रही है। ‘नई जनरेशन अब खेतों में काम कम करती है,’ Zulfikar Ali Shah अफसोस के साथ कहते हैं। ‘जब फसल ही नहीं होगी, तो पीसने के लिए क्या बचेगा? इसलिए अब लोग आना भी कम कर चुके हैं।’ सर्दियों में जब पानी जम जाता है, तो चक्की भी बंद हो जाती है। पहले ये चक्की 24 घंटे चलती थी, लेकिन अब दो-तीन दिन चलती है और फिर कई दिन बंद रहती है।

भले ही वक़्त बदल गया हो, लेकिन Zulfikar Ali Shah अब भी इस परंपरा से जुड़े हुए हैं। Zulfikar Ali Shah कहते हैं कि “जब तक मैं चल फिर सकता हूं, मैं इस चक्की को चलाता रहूंगा। उसके बाद क्या होगा, अल्लाह जाने’ नई पीढ़ी को इस काम में दिलचस्पी नहीं है, लेकिन मैं चाहता हूं कि मेरी ये मेहनत और ये पुरानी विरासत ज़िंदा रहे।’ कश्मीर की वादियों में Zulfikar Ali Shah की ‘आब-ए-ग्रट्टा’ (Aab-E-Gratta) सिर्फ़ एक चक्की नहीं, बल्कि एक विरासत है।

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