“साथ जो तुम्हारा था, तो लम्हों का पता ना चला
वक़्त जो गुज़रा, गुज़रता चला गया।”
DNN24 के Diverse Dialogues Podcast में इस बार की बातचीत घुंघरुओं की झंकार जैसी थी, जो धीरे-धीरे दिल में उतरती है और फिर वहीं ठहर जाती है। मशहूर कथक नृत्यांगनाएं Nalini-Kamalini Asthana सिर्फ कलाकार नहीं, बल्कि एक ज़िंदा रिवायत हैं। उनकी बातों में सिर्फ़ कला नहीं, बल्कि ज़िंदगी की समझ, वक़्त का तजुर्बा और रूह की सच्चाई भी शामिल है। दो बहनें एक सफ़र और एक ऐसी कला, जिसे उन्होंने सिर्फ सीखा नहीं, बल्कि जिया है हर पल, हर सांस के साथ।
आगरा से दिल्ली – जड़ों से जुड़ा सफ़र
Nalini-Kamalini Asthana की पैदाइश आगरा में हुई, लेकिन उनकी परवरिश दिल्ली की गलियों में हुई। उनके वालिद एयरफोर्स में थे, इसलिए ज़िंदगी में ठहराव कम और बदलाव ज़्यादा था। कुछ ही सालों में परिवार दिल्ली आ गया, और फिर वही शहर उनका घर बन गया। दिल्ली में ही उनकी तालीम हुई। स्कूल, कॉलेज, दोस्त, माहौल सब कुछ यहीं का था। लेकिन आगरा की मिट्टी से जुड़ाव कभी कम नहीं हुआ। जैसे कोई ख़ुशबू हो, जो दूर रहकर भी साथ रहती है।
उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वो प्रोफ़ेशनल डांसर बनेंगी। उस दौर में “फन” यानी कला को करियर के तौर पर अपनाना आम बात नहीं थी। ये सब बस शौक़ तक सीमित रहता था। लेकिन ज़िंदगी अक्सर वो रास्ते खोल देती है, जिनके बारे में इंसान ने सोचा भी नहीं होता।

मां का ख़्वाब एक छोटी सी चिंगारी
हर बड़े सफ़र की शुरुआत कहीं न कहीं से होती है, और इस कहानी में वो शुरुआत उनकी मां के ख़्वाब से हुई। Nalini-Kamalini Asthana मां खुद कला से जुड़ी थी अदब से लगाव था, गाना गाती थी। लेकिन शायद वो जो करना चाहती थी, वो कर नहीं पाई। इसलिए उन्होंने अपने बच्चों में वो सपना देखा। एक वाक़या बहुत दिल छू लेने वाला है जब कमलिनी जी छोटी थी और उनके पैर में चोट लगी, तो उनकी मां ने सबसे पहले डॉक्टर से यही पूछा, “क्या ये डांस कर पाएगी?”
ये सवाल सिर्फ़ चिंता नहीं था, बल्कि एक उम्मीद थी, एक ख़्वाब था, जो उन्होंने अपने बच्चों में बो दिया था। और वही ख़्वाब धीरे-धीरे एक हक़ीक़त बन गया। शुरुआत में दोनों बहनें साइंस स्टूडेंट थी। उनकी सोच भी वैसी ही थी जहां आर्ट को उतनी अहमियत नहीं दी जाती थी। लेकिन ज़िंदगी कभी-कभी ऐसे मोड़ लाती है, जो इंसान की पूरी सोच बदल देते हैं। एक बार नलिनी जी बीमार पड़ीं, टाइफाइड हुआ। उस दौरान उन्होंने Jaishankar Prasad की कविता पढ़ी। उन पंक्तियों ने उनके अंदर एक नई दुनिया खोल दी एहसास की, जज़्बात की, और कला की। यहीं से शुरू हुआ उनका असली सफ़र महसूस करने का, समझने का और खुद को पहचानने का।
गुरु का साया जहां शौक़ बना जुनून
शुरुआत में कथक बस एक शौक़ था। घर में म्यूजिक का माहौल था, बड़े-बड़े उस्ताद आते-जाते थे। लेकिन जब उन्हें बनारस घराने से ताल्लुक रखने वाले गुरु जितेंद्र महाराज के पास ले जाया गया, तो सब कुछ बदल गया। गुरु जितेंद्र महाराज सिर्फ़ सिखाते नहीं थे वो जीना सिखाते थे। उनकी तालीम में सिर्फ़ टेक्निक नहीं थी, बल्कि एहसास था। धीरे-धीरे ये शौक़ एक जुनून बन गया। ऐसा जुनून, जिसमें वक़्त का एहसास ही नहीं रहता। जहां हर ताल में मेहनत है, हर भाव में सच्चाई है। नलिनी जी कहती हैं “फन को समझने के लिए दिमाग नहीं, दिल का खुलना ज़रूरी है।”

बनारस घराना: शुद्धता की पहचान
कथक के तीन बड़े घराने – बनारस, लखनऊ और जयपुर अपने-अपने अंदाज़ के लिए जाने जाते हैं। लेकिन बनारस घराने की बात कुछ अलग है। यहां “प्योरिटी” यानी शुद्धता अहम है। इस घराने में नृत्य की सादगी और रूहानियत का अलग ही असर होता है। नलिनी जी बताती हैं कि उनके गुरु ने कथक को उसकी असली पहचान लौटाने का काम किया जो कभी मंदिरों में इबादत के तौर पर पेश किया जाता था।
मंदिर से मंच तक: कथक का बदलता रूप
Nalini-Kamalini Asthana जी कहती हैं कि कथक का सफ़र बहुत दिलचस्प रहा है। पहले ये मंदिरों में होता था। फिर ये दरबारों में पहुंचा, और बाद में महफ़िलों और मंचों तक। मध्य युग में इसमें ग़ज़ल, ठुमरी और ख़याल जुड़े। फिर वक्त के साथ ये इंटरनेशनल मंच तक पहुंच गया। आज कथक एक ग्लोबल आर्ट बन चुका है जहां बड़े-बड़े स्टेज, लाइट्स और कोरियोग्राफी का दौर है।
पहले तालीम का मतलब होता था गुरु के साथ रहना, सीखना और जीना। कोई टाइम लिमिट नहीं होती थी। ट्रेन में सफ़र करते हुए भी रियाज़ होता था। आज के दौर में सर्टिफिकेट और कोर्स का चलन बढ़ गया है। लेकिन वो मानती हैं कि असली कसौटी ऑडियंस होती है वही तय करती है कि आप कितने काबिल हैं। 70 के दशक की एक तस्वीर वो आज भी याद करती हैं पटना की कॉन्फ्रेंस, जहां हज़ारों लोग बारिश में भीगते हुए भी कला देखने बैठे रहते थे। कोई बड़ा-छोटा नहीं होता था बस कला की कद्र होती थी।
185 इंटरनेशनल परफॉर्मेंस का सफ़र
उनका इंटरनेशनल सफ़र भी किसी कहानी से कम नहीं। पेरिस से शुरू हुआ ये सफ़र पूरे यूरोप तक पहुंचा। पहली बार जब उन्होंने परफॉर्म किया, तो उन्हें तालियां नहीं सुनाई दीं। लगा शायद कुछ कमी रह गई। लेकिन आख़िर में जब पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा और फूलों की बारिश हुई तो वो लम्हा उनकी ज़िंदगी का सबसे ख़ास बन गया। उन्होंने करीब 185 परफॉर्मेंस दिए और डेढ़ साल तक विदेशों में भारत की संस्कृति को पेश किया। विदेशों में कई लोग भारत को ठीक से नहीं जानते थे। लेकिन उन्होंने अपनी कला के ज़रिए लोगों को असली भारत से रूबरू कराया। उनका मानना है,“जड़ों से जुड़े रहो, तभी असली पहचान बनती है।”

कैलाश मानसरोवर-जब नृत्य बन गया इबादत
2003 जब कैलाश मानसरोवर जाने का मौक़ा मिला, तो शुरुआत में लगा कि ये सफ़र मुश्किल और खर्चीला होगा। लेकिन जैसे वो खुद कहती हैं “जब भगवान बुलाते हैं, तो रास्ते अपने आप बन जाते हैं।” स्वामी चिदानंद जी ने उन्हें अपने मेहमान के तौर पर बुलाया, और यही इस सफ़र की सबसे बड़ी नेमत थी। नेपाल में पशुपतिनाथ मंदिर में प्रस्तुति देना हो या महाराजा के जन्मदिन पर नृत्य हर लम्हा एक इबादत जैसा था।
लेकिन सबसे ख़ास पल तब आया, जब उन्होंने कैलाश की पवित्र धरती पर, बिना किसी योजना के, घुंघरू बांधकर नृत्य किया। वहां कोई स्टेज नहीं था सिर्फ़ प्रकृति, शिव और एक कलाकार की सच्ची भक्ति थी। ये नृत्य तालियों के लिए नहीं, बल्कि आत्मा की तसल्ली के लिए था जहां हर कदम एक दुआ बन गया।
सिनेमा और कथक का रिश्ता
कथक और सिनेमा का रिश्ता पुराना ज़रूर है, लेकिन हमेशा सच्चा नहीं रहा। पाकीज़ा और उमराव जान जैसी फ़िल्मों ने कथक को ज़रूर दिखाया, लेकिन ज़्यादातर उसे “मुजरा” के दायरे में बांध दिया। ये भी एक खूबसूरत फॉर्म है, लेकिन कथक की असली पहचान इससे कहीं गहरी और व्यापक है। कमालिनी जी कहती हैं कि Jhanak Jhanak Payal Baaje और Amrapali जैसी फिल्मों में कथक अपने शुद्ध और असली रूप में सामने आया।
इन फ़िल्मों में नृत्य सिर्फ़ एक सीन नहीं था, बल्कि कहानी का दिल था। उनका मानना है कि सिनेमा ने कथक को पहचान तो दी, लेकिन उसकी रूह को पूरी तरह पकड़ नहीं पाया। क्योंकि जब तक कलाकार उस कला को अंदर से महसूस नहीं करता, तब तक वो सिर्फ़ मूवमेंट रह जाती है इबादत नहीं बन पाती।

पद्मश्री 2022 जब गुरु की बात सच हो गई
साल 2022 का वो एक दिन उनकी ज़िंदगी का एक ऐसा लम्हा था, जिसे वो आज भी याद करके मुस्कुरा उठती हैं। सबसे हैरानी की बात ये थी कि उनके गुरु, Jitendra Maharaj, ने पहले ही कह दिया था “इस बार तुम्हें अवॉर्ड मिलेगा।” उस दिन वो अपने इंस्टीट्यूट में थी, रोज़ की तरह काम कर रही थी। नटराज जी की मूर्ति के पास सफाई कर रही थी, जैसे हर दिन करती थी। तभी फोन आया, गृह मंत्रालय से।
ये ख़बर सुनकर एक पल के लिए यकीन करना मुश्किल था कि उन्हें साल 2022 में पद्मश्री अवॉर्ड से सम्मानित किया जाएगा। उनके लिए ये अवॉर्ड सिर्फ़ एक सम्मान नहीं था, बल्कि सालों की मेहनत, सब्र और सच्ची नीयत का फल था। वो मानती हैं कि जब इंसान “डिज़र्व” करता है, तब मिलने वाली खुशी कहीं ज़्यादा गहरी होती है। गुरुजी की एक बात उन्हें हमेशा याद रहती है- “पहले खुद को लायक बनाओ, फिर ख्वाहिश रखो।”
1975 में शुरू हुआ “इंस्टिट्यूट ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स
Nalini-Kamalini Asthana बताती हैं कि 1975 में शुरू हुआ “इंस्टिट्यूट ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स” सिर्फ़ एक संस्था नहीं, बल्कि एक सोच थी। उस दौर में न तो कल्चर प्लेटफॉर्म ज़्यादा थे, न ही कलाकारों के लिए मौक़े आसान थे। ऐसे में उनके गुरु और उनके पिता ने मिलकर ये तय किया कि क्यों न एक ऐसी जगह बनाई जाए, जहां सच्चे मायनों में कला सिखाई जा सके। इस संस्थान का मक़सद कभी “ज़्यादा स्टूडेंट्स” नहीं था, बल्कि “सही स्टूडेंट्स” था।
यहां हॉबी क्लास नहीं, बल्कि गहरी तालीम दी जाती है। हर बच्चे को परखा जाता है उसका सब्र, उसकी लगन, उसकी समझ। उनका मानना है कि कला को सिर्फ़ सीखा नहीं जा सकता, उसे जिया जाता है। जैसे यहां “क्वांटिटी” नहीं, बल्कि “क्वालिटी” पर ज़ोर दिया जाता है।
सरोज ख़ान अदब और समझ का एक किस्सा
लखनऊ की एक शाम, एक मुलाकात और एक यादगार लम्हा। Nalini-Kamalini Asthana की मुलाक़ात सरोज ख़ान से हुई, जो खुद डांस की दुनिया का एक बड़ा नाम थी। जब उन्होंने उनका नृत्य देखा, तो बहुत तारीफ की। लेकिन सबसे खास बात ये थी कि उन्होंने शास्त्रीय नृत्य के प्रति अपना अदब दिखाया। उन्होंने कहा,“ऐसी कला में सीटी बजाना ठीक नहीं।” ये छोटी सी बात, दरअसल एक बड़ी समझ को दिखाती है। हर कला का अपना एक मुक़ाम होता है, एक गरिमा होती है। उसे उसी नज़र से देखना और समझना ज़रूरी है।
कथक Nalini-Kamalini Asthana के लिए सिर्फ़ एक नृत्य नहीं, बल्कि एक इबादत है। गुरु की सीख, मां का ख़्वाब, सफ़र की मुश्किलें और मंच की चमक इन सबको जोड़कर उन्होंने एक ऐसी पहचान बनाई, जो वक़्त के साथ और भी मज़बूत होती गई।
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