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गुरु घरों में प्रसाद के तौर पर पौधे बांटकर पर्यावरण बचाने की अनोखी पहल

जब भी कोई पंजाब के किसी गुरुद्वारे में माथा टेकने जाता है, तो सबसे पहले उसे कड़ाह प्रसाद की ख़ुशबू आती है। लेकिन अब कुछ ऐतिहासिक सिख गुरुद्वारों से एक नई ख़ुशबू भी आने लगी है, जैसे गीली मिट्टी की मीठी खुशबू, छोटे पौधों की खुशबू और देसी बीजों की खुशबू।

पंजाब के कई धार्मिक स्थलों पर अब श्रद्धालुओं को प्रसाद के साथ देसी पेड़ों के पौधे और पारंपरिक बीज भी दिए जा रहे हैं। इसका मक़सद सिर्फ़ पर्यावरण की हिफाज़त करना नहीं है, बल्कि सिख गुरुओं की उस तालीम को अमल में लाना भी है, जो इंसान और कुदरत के बीच गहरे रिश्ते की बात करती है। ये पहल सिर्फ़ एक पर्यावरण अभियान नहीं, बल्कि रूहानियत और कुदरत की हिफाज़त को साथ लेकर चलने वाली एक ख़ूबसूरत सोच है, जिसकी जड़ें सदियों पुरानी सिख परंपरा में मौजूद हैं।

गुरबानी में प्रकृति के प्रति सम्मान

गुरु नानक देव जी की बाणी इंसान और कुदरत के बीच गहरे रिश्ते की बात करती है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में कुदरत को रब की सबसे बड़ी नेमत बताया गया है। जपजी साहिब में गुरु नानक देव जी फरमाते हैं— “पवन गुरु, पानी पिता, माता धरत महत।” यानी हवा हमारी गुरु है, पानी पिता के समान है और धरती हमारी महान मां है। ये संदेश हमें सिखाता है कि कुदरत का एहतराम करना और उसकी हिफाज़त करना हमारी ज़िम्मेदारी है।

Pic Credit: X

सिख इतिहास में भी कुदरत से मोहब्बत की कई मिसालें मिलती हैं। गुरु हर राय जी ने नौलखा बाग जैसे ख़ूबसूरत बाग लगवाए थे। इससे साफ़ पता चलता है कि सिख परंपरा में पेड़-पौधों और हरियाली को हमेशा ख़ास अहमियत दी गई है। गुरबाणी में नीम, बेर, आम, जामुन, चंदन और खजूर जैसे कई पेड़ों का ज़िक्र मिलता है। सिख गुरुओं के लिए ये सिर्फ़ पेड़ नहीं थे, बल्कि रब की बनाई हुई पाक और अनमोल नेमत थे, जिनकी हिफाज़त करना हर इंसान का फ़र्ज़ है।

प्रसाद के साथ हरियाली का पैग़ाम

नवंबर 2025 में गुरु नानक देव जी के 556वां प्रकाश पर्व के मौक़े पर फगवाड़ा में एक अनोखा ग्रीन नगर कीर्तन निकाला गया। इस नगर कीर्तन में दो ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में भरकर देसी पेड़ों के पौधे लाए गए, जिन्हें श्रद्धालुओं में प्रसाद के तौर पर बांटा गया। ये नगर कीर्तन गुरुद्वारा गुरु का बाग, गुरुद्वारा बेबे नानकी दा घर और गुरुद्वारा श्री बेर साहिब जैसे ऐतिहासिक गुरुद्वारों से होकर गुज़रा।

इस दौरान संत बलबीर सिंह सीचेवाल ने संगत को ख़िताब करते हुए कहा कि गुरु नानक देव जी ने सदियों पहले ही हवा, पानी और मिट्टी की हिफाज़त का पैगाम दिया था। आज जब पूरी दुनिया जलवायु बदलाव जैसी बड़ी चुनौती का सामना कर रही है, तब गुरु साहिब की यही तालीम उसका हल दिखाती है।

Pic Credit: The Tribune

इससे पहले दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाश पर्व के दौरान गुरबाणी में ज़िक्र किए गए नीम, बेर, जामुन, आंवला और आम जैसे पेड़ों के दो लाख से ज़्यादा पौधे लोगों में बांटे थे। कमेटी ने अपने स्कूलों और कॉलेजों में एक लाख पेड़ लगाने का भी मक़सद तय किया। साथ ही नए दाख़िला लेने वाले छात्रों के लिए ये ज़रूरी किया गया कि वो अपनी पढ़ाई के प्रोजेक्ट के तहत दस पेड़ लगाएं और उनकी देखभाल भी करें।

ऐतिहासिक गुरुद्वारों से जुड़ा हरियाली का मिशन

खडूर साहिब, जो गुरु अंगद देव जी से जुड़ा एक ऐतिहासिक शहर है, वहां सेवा सिंह की रहनुमाई में लाखों पौधे लोगों में बांटे गए और लगाए गए। श्रद्धालुओं ने इन पौधों को सड़कों के किनारे लगाया और आज उनमें से कई पौधे बड़े और घने पेड़ बन चुके हैं। इसी तरह EcoSikh ने गुरु हर राय जी के ऐतिहासिक नौलखा बाग़ को फिर से आबाद करने में अहम किरदार निभाया। संस्था ने औषधीय पौधों की हिफाज़त पर भी ज़ोर दिया, ताकि पारंपरिक जड़ी-बूटी से जुड़ा इल्म आने वाली नस्लों तक पहुंचता रहे।

इकोसिख ने गुरुद्वारा गुरुसर साहिब में करीब पांच एकड़ में ‘गुरु ग्रंथ साहिब बाग़’ भी तैयार किया है। इस अनोखे बाग़ में 6,000 पेड़ लगाए गए हैं, जो श्री गुरु ग्रंथ साहिब में ज़िक्र किए गए 58 अलग-अलग पेड़ों और पौधों की किस्मों को रिप्रेज़ेंट करते हैं। हर पेड़ के साथ एक जानकारी वाला बोर्ड लगाया गया है, जिस पर उसका पंजाबी और अंग्रेज़ी नाम, वैज्ञानिक नाम और गुरबाणी में उससे जुड़ा हवाला लिखा गया है। ये बाग़ सिर्फ़ हरियाली बढ़ाने की कोशिश नहीं है, बल्कि बच्चों और नौजवानों के लिए एक ज़िंदा तालीमी जगह भी है, जहां वो कुदरत, गुरबाणी और पर्यावरण की अहमियत को क़रीब से समझ सकते हैं।

Pic Credit: Sachkhand Foundation

संत बलबीर सिंह सीचेवाल का पैग़ाम

संत बलबीर सिंह सीचेवाल ने साल 2000 में प्रदूषित काली बेई नदी की सफ़ाई के लिए एक ऐतिहासिक मुहिम शुरू की थी। आज भी वो सिख गुरुओं की तालीम को सिर्फ़ शब्दों तक नहीं, बल्कि अमल में उतारने पर ज़ोर देते हैं। उनका कहना है कि गुरबाणी में हवा, पानी और धरती को इंसानी ज़िंदगी की बुनियाद बताया गया है। लेकिन इंसान की लालच और बेपरवाही ने आज इन तीनों को ख़तरे में डाल दिया है। इसलिए कुदरत की हिफाज़त करना हम सबकी साझा ज़िम्मेदारी है।

संत सीचेवाल ने संसद में भी ये मांग उठाई है कि पूरे देश के स्कूलों में पर्यावरण की पढ़ाई को ज़रूरी किया जाए। उनका मानना है कि अगर बच्चों का बचपन से ही कुदरत से रिश्ता जुड़ जाएगा, तो वो बड़े होकर पर्यावरण की बेहतर हिफाज़त कर सकेंगे।

Pic Credit: Hindustan Times

सिख पर्यावरण दिवस: पेड़ लगाना भी सेवा

EcoSikh हर साल 14 मार्च को सिख पर्यावरण दिवस मनाता है। ये दिन गुरु हर राय जी के गुरुगद्दी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। इस मुहिम की शुरुआत साल 2010 में हुई थी। बाद में 2013 में सिखों के सभी पांच तख्तों के जत्थेदारों ने भी इस दिन को आधिकारिक तौर पर मान्यता दी।

इस पहल को United Nations Development Programme और Alliance of Religions and Conservation जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का भी सहयोग मिला है। इकोसिख देश-विदेश के गुरुद्वारों को ये पैगाम देता है कि वो श्रद्धालुओं को प्रसाद के साथ देसी पेड़ों के पौधे भी दें। ख़ास तौर पर ऐसे पेड़, जो पंजाब के मौसम में आसानी से पनपते हैं, जैसे नीम, अर्जुन, जामुन, शहतूत और बेर। संस्था का मानना है कि पेड़ लगाना सिर्फ़ पर्यावरण की हिफाज़त नहीं, बल्कि एक नेक सेवा भी है।

Pic Credit: Whatshot

पंजाब के लिए क्यों अहम है ये पहल?

आज पंजाब में जंगलों का इलाका सिर्फ़ करीब 3 से 4 फ़ीसदी रह गया है, जबकि आदर्श तौर पर ये 33 फ़ीसदी होना चाहिए। लगातार रासायनिक खेती की वजह से भूजल का स्तर नीचे जा रहा है, हवा ज़्यादा प्रदूषित हो रही है और मिट्टी भी अपनी उर्वरता खोती जा रही है।

ऐसे हालात में गुरुद्वारों की ओर से शुरू की गई ये पहल सिर्फ़ मज़हबी नहीं, बल्कि समाज के लिए भी बेहद अहम है। जब किसी श्रद्धालु को गुरुद्वारे से प्रसाद के साथ एक पौधा मिलता है, तो वो उसे गुरु का आशीर्वाद और पवित्र तोहफ़ा मानता है। इसी वजह से वो उसकी पूरी लगन और मोहब्बत से देखभाल करता है। यही रूहानी रिश्ता पर्यावरण की हिफाज़त को एक नई ताकत देता है। जब पेड़ लगाना सिर्फ़ एक काम नहीं, बल्कि सेवा और इबादत बन जाए, तो कुदरत को बचाने की कोशिश और भी असरदार हो जाती है।

Pic Credit: Social Media

कुदरत की सेवा ही रब की सेवा

गुरुद्वारे हमेशा से पंजाब की पहचान और समाज की रूह रहे हैं। आज जब यही पवित्र स्थल लोगों को पर्यावरण की हिफाज़त का पैग़ाम दे रहे हैं, तो ये साबित होता है कि सिख गुरुओं की तालीम सिर्फ़ इंसान की रूहानी सुकून तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी धरती और कुदरत की भलाई से भी जुड़ी हुई है।

गुरुद्वारे से प्रसाद के तौर पर मिला कोई पौधा या देसी बीज सिर्फ़ एक पौधा या बीज नहीं होता। जब उसे घर के आंगन या खेत में लगाया जाता है, तो उसके साथ गुरु नानक देव जी का वो पैगाम भी ज़िंदा होता है, जो हमें सिखाता है कि कुदरत की सेवा करना ही असल में रब की सेवा करना है। यही सोच आने वाली नस्लों के लिए हरियाली, साफ़ हवा और बेहतर माहौल की बुनियाद बन सकती है।

स्टोरी– मनमीत कौर

इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ें

ये भी पढ़ें: वकील नदीम क़ादरी नेचर स्कूल के ज़रीये लोगों में जगा रहे पर्यावरण से लगाव और जुनून

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