बीसवीं सदी में पंजाब की सरज़मीन पर कई महान शख़्सियतों ने जन्म लिया। लेकिन अगर किसी ने सच में ये दिखाया कि “इंसानियत की ख़िदमत ही सबसे बड़ी इबादत है,” तो वो थे भगत पूरन सिंह जी। वो सिर्फ़ एक आम इंसान नहीं थे, बल्कि चलते-फिरते रहम और इंसानियत की मिसाल थे। जिन लोगों को समाज ने बेकार, लाचार या ठुकरा दिया था, उनके लिए वो आख़िरी सहारा बने। अमृतसर की पवित्र धरती पर उन्होंने पिंगलवाड़ा की बुनियाद रखी, जहां बेसहारा, बीमार और ज़रूरतमंद लोगों को अपनाया गया।
भगत पूरन सिंह जी ने अपनी पूरी ज़िंदगी बिना किसी स्वार्थ के लोगों की ख़िदमत, त्याग और पर्यावरण की हिफ़ाज़त के लिए समर्पित कर दी। उनकी पैदाइश 4 जून 1904 को पंजाब के लुधियाना ज़िले के राजेवाल रोहनो गांव में एक हिंदू परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम शिब्बू मल और माता का नाम मेहताब कौर था। बचपन में उनका नाम राम जी दास रखा गया था। शुरुआत में उनका परिवार अच्छी हालत में था, लेकिन वक़्त के साथ आर्थिक परेशानियों की वजह से उन्हें ग़रीबी का सामना करना पड़ा।
ग़रीबी के बावजूद उनकी मां मेहताब कौर ने उन्हें अच्छे संस्कार और इंसानियत की सीख दी। बचपन में वो उन्हें ध्रुव भगत, हनुमान जी, शिव जी, भर्तृहरि और अलग-अलग गुरुओं, पीरों और फ़क़ीरों की कहानियां सुनाया करती थी। इन कहानियों का उनके दिल और सोच पर गहरा असर पड़ा। यहीं से उनके अंदर दूसरों की मदद करने, रहमदिल बनने और निस्वार्थ सेवा करने का जज़्बा पैदा हुआ।

लाहौर में 20 साल की ख़िदमत का सफ़र
पढ़ाई और ज़िंदगी के अगले पड़ाव के लिए राम जी दास लाहौर (जो आज पाकिस्तान में है) चले गए। वहीं गुरुद्वारा डेरा साहिब में उनकी ज़िंदगी को एक नया मक़सद मिला। उन्होंने गुरुद्वारे में बिना किसी तनख़्वाह के सेवा शुरू की। वो श्रद्धालुओं के जूते साफ़ करते, लंगर के लिए पानी भरते, पूरे गुरुद्वारे की सफ़ाई करते और बीमार लोगों की दिल से देखभाल करते थे। उनकी लगन, मेहनत और निस्वार्थ सेवा को देखकर गुरुद्वारे के मुख्य प्रबंधक महंत तेजा सिंह उनसे बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने ही राम जी दास को “पूरन सिंह प्रेमी” नाम दिया।
पूरन सिंह प्रेमी ने लगातार 20 साल तक गुरुद्वारा डेरा साहिब में सेवा की। इस दौरान उन्होंने सिख इतिहास, गुरबाणी की सीख, बेसहारा और बीमार लोगों की सेवा को अपनी ज़िंदगी का मक़सद बना लिया। यही सेवा का जज़्बा धीरे-धीरे उन्हें राम जी दास से भगत पूरन सिंह बना गया। उनकी निस्वार्थ ख़िदमत को देखकर मशहूर नेता ज्ञानी करतार सिंह और उनकी मां मेहताब कौर भी उन्हें प्यार और सम्मान से “भगत जी” कहकर बुलाने लगे।

इंसानियत की ख़िदमत का पहला बड़ा कदम
साल 1934 में भगत पूरन सिंह जी की सेवा का असली सफ़र शुरू हुआ। एक दिन किसी अनजान शख़्स ने करीब चार साल के एक लाचार और दिव्यांग बच्चे को चुपचाप लाहौर के गुरुद्वारा डेरा साहिब के दरवाज़े पर छोड़ दिया। वो बच्चा न बोल सकता था, न चल सकता था और उसकी मानसिक हालत भी ठीक नहीं थी। जब गुरुद्वारे के ग्रंथी ने बच्चे की हालत देखी, तो उसे भगत पूरन सिंह जी को सौंपते हुए कहा, “पूरन सिंह, आज से इस बच्चे की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है।”
भगत जी ने उस बच्चे को भगवान का रूप मानकर अपना लिया और उसका नाम प्यारा सिंह रखा। उनके लिए वो बच्चा सिर्फ़ एक मरीज़ नहीं था, बल्कि उनकी ज़िंदगी के असली मक़सद की शुरुआत था। अगले 14 साल तक भगत पूरन सिंह जी उस दिव्यांग बच्चे को अपने कंधों पर उठाकर हर जगह ले जाते रहे। वो जहां भी जाते, प्यारा सिंह हमेशा उनके साथ होता। इतनी मुश्किलों के बावजूद, जब भी उन्हें थोड़ा वक़्त मिलता, वो लाहौर की अलग-अलग लाइब्रेरी में जाकर समाज की परेशानियों, बीमारियों और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों का गहराई से अध्ययन करते। उनका मानना था कि सिर्फ़ सेवा ही नहीं, बल्कि सही जानकारी भी लोगों की मदद करने के लिए ज़रूरी है।
इस दौरान उन्हें कई लोगों की बातें और ताने भी सुनने पड़े। एक बार उनके जान-पहचान के एक वकील ने कहा, “इस दिव्यांग बच्चे की सेवा करने का कोई फ़ायदा नहीं। अगर ये गुरुद्वारे के बाहर ही मर जाता, तो बेहतर होता। वैसे भी एक दिन इसे सड़क किनारे ही मरना है।” लेकिन भगत पूरन सिंह जी अपने इरादे के बहुत मज़बूत इंसान थे। लोगों की ऐसी बातों ने कभी उन्हें अपने रास्ते से नहीं हटाया। वो आख़िरी दम तक इंसानियत की ख़िदमत में डटे रहे।

बंटवारे का दर्द और पिंगलवाड़ा की शुरुआत
साल 1947 में जब भारत का बंटवारा हुआ, तो लाहौर में भयानक दंगे भड़क उठे। उस मुश्किल वक़्त में भगत पूरन सिंह जी हज़ारों शरणार्थियों के साथ अमृतसर आ गए। उस समय भी प्यारा सिंह उनके कंधों पर ही था। अमृतसर पहुंचने के बाद वो खालसा कॉलेज में बने शरणार्थी कैंप में रहने लगे। इस कैंप में हज़ारों लोग थे, जो दंगों में घायल हो चुके थे, मानसिक सदमे से गुज़र रहे थे या अलग-अलग बीमारियों से परेशान थे। भगत जी दिन-रात उनकी सेवा में जुट गए।
साल 1948 से 1958 तक का दौर उनके लिए सबसे कठिन रहा। उनके पास मरीज़ों को रखने के लिए कोई पक्का ठिकाना नहीं था। कभी वो खालसा कॉलेज के बाहर फुटपाथ पर उनका इलाज करते, कभी पेड़ों के नीचे, कभी रेलवे स्टेशन के बाहर, कभी चीफ खालसा दीवान के पास और कभी रेड क्रॉस की इमारत के नज़दीक अस्थायी झोपड़ियां बनाकर उनकी देखभाल करते।
वो मरीज़ों के ज़ख्म साफ़ करते, उनकी मरहम-पट्टी करते और उनका हर तरह से ख़याल रखते। उनके खाने और इलाज का इंतज़ाम करने के लिए वो रोज़ शहर की गलियों में घूम-घूमकर लोगों से खाना और मदद की गुज़ारिश करते थे। आख़िरकार साल 1958 में भगत पूरन सिंह जी ने अमृतसर के जीटी रोड पर तहसीलपुरा के पास ज़मीन ख़रीदी और ऑल इंडिया पिंगलवाड़ा सोसायटी की नींव रखी। इस संस्था का रजिस्ट्रेशन 6 मार्च 1957 को हो चुका था।
जिस पिंगलवाड़ा की शुरुआत भगत जी ने कुछ बेसहारा और लाचार मरीज़ों के साथ की थी, वही आज एक विशाल संस्था बन चुकी है। आज ये हज़ारों ज़रूरतमंद, बीमार और बेसहारा लोगों के लिए सिर्फ़ एक आश्रय नहीं, बल्कि एक अपने घर जैसा सहारा है।

पर्यावरण और साहित्य के लिए भगत पूरन सिंह जी का योगदान
भगत पूरन सिंह जी सिर्फ़ बीमार और बेसहारा लोगों की सेवा करने वाले इंसान ही नहीं थे, बल्कि वो पर्यावरण को लेकर भी अपने समय से बहुत आगे की सोच रखते थे। आज से कई दशक पहले, जब लोग ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण या पर्यावरण की ज़्यादा बात भी नहीं करते थे, तब भगत जी हवा और पानी के प्रदूषण, पानी की कमी, बेतहाशा पेड़ों की कटाई और प्लास्टिक के नुक़सान के बारे में लोगों को जागरूक कर रहे थे।
लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए उन्होंने लाखों किताबें, छोटी-छोटी पुस्तिकाएं, पर्चे और पोस्टर छपवाए। ख़ास बात ये थी कि वो कागज़ की बर्बादी रोकने के लिए पुराने और इस्तेमाल किए हुए कागज़ के पीछे वाले हिस्से पर ही इन्हें छपवाते थे। भगत जी ख़ुद अमृतसर में श्री दरबार साहिब, घंटाघर चौक और सरायों के बाहर बैठकर आने वाले श्रद्धालुओं को ये साहित्य मुफ़्त में बांटते थे।
उनका मक़सद ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पर्यावरण बचाने और समाज की भलाई का पैग़ाम पहुंचाना था। भगत जी की शुरू की हुई ये ख़ूबसूरत परंपरा आज भी जारी है। आज भी पिंगलवाड़ा की ओर से देश के कई ऐतिहासिक गुरुद्वारों में लोगों को मुफ़्त में जागरूकता से जुड़ा साहित्य बांटा जाता है।

आज भी जारी है भगत पूरन सिंह जी की सेवा की विरासत
आज पिंगलवाड़ा सिर्फ़ बीमार और बेसहारा लोगों का इलाज ही नहीं करता, बल्कि उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने का मौक़ा भी देता है। यहां रहने वाले लोगों और बच्चों को अलग-अलग तरह की ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि वो ख़ुद कमाकर इज़्ज़त की ज़िंदगी जी सकें। यहां सिलाई-कढ़ाई, टाइपिंग, कुर्सी बुनाई, मोमबत्ती और खिलौने बनाना, जैविक खेती, फिजियोथेरेपी और कृत्रिम हाथ-पैर (आर्टिफिशियल लिम्ब) बनाने जैसी ट्रेनिंग दी जाती है। इसके अलावा पिंगलवाड़ा अनाथ बच्चों के लिए स्कूल भी चलाता है। यहां पढ़े कई बच्चे आगे चलकर अच्छी नौकरियों और सम्मानजनक मुकाम तक पहुंचे हैं।
भगत पूरन सिंह जी की बेमिसाल सेवा को देखते हुए भारत सरकार और दुनिया की कई संस्थाओं ने उन्हें कई बड़े सम्मान दिए। साल 1981 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से नवाज़ा, जो देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मानों में से एक है। लेकिन साल 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान श्री दरबार साहिब और श्री अकाल तख़्त साहिब में हुई सैन्य कार्रवाई के विरोध में भगत जी ने अपना पद्मश्री सम्मान सरकार को लौटा दिया। इसके बाद साल 1990 में उन्हें हार्मनी अवॉर्ड और 1991 में रोग रत्न अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया। ये सम्मान पंजाब विरासत संस्था, शिकागो, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) और भाई घनैया अवॉर्ड कमेटी की ओर से दिए गए।

इंसानियत की सेवा की मिसाल, निस्वार्थ भाव के प्रतीक और बेसहारा लोगों के सबसे बड़े सहारे भगत पूरन सिंह जी ने 5 अगस्त 1992 को 88 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी ज़िंदगी हमें ये सिखाती है कि असली इज़्ज़त और महानता बड़े महलों में रहने से नहीं, बल्कि किसी के आंसू पोंछने और ज़रूरतमंद का सहारा बनने से मिलती है। आने वाली पीढ़ियों के लिए उनकी ज़िंदगी हमेशा एक रोशनी की तरह राह दिखाती रहेगी।
स्टोरी– गुरप्रीत सिंह
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