सिख इतिहास अनगिनत कुर्बानियों, संघर्षों और सेवा की मिसालों से भरा हुआ है। बीसवीं सदी की शुरुआत में जब सिख कौम अपने ऐतिहासिक गुरुद्वारों को महंतों और अंग्रेज़ हुक़ूमत के कब्ज़े से आज़ाद करवाने के लिए ‘गुरुद्वारा सुधार लहर’ (अकाली आंदोलन) चला रही थी, उस दौर में अपने कौमी फ़र्ज़ को आख़िरी सांस तक पूरी ईमानदारी और समर्पण के साथ निभाने वाले नेताओं में सरदार तेजा सिंह समुदरी का नाम सबसे आगे आता है।
साल 2026 में इस महान पंथक योद्धा की शहादत की 100वीं बरसी मनाई जा रही है। 17 जुलाई 1926 से 17 जुलाई 2026 तक का ये साल हमें उनके बेमिसाल संघर्ष, नेक ज़िंदगी और सिख कौम के लिए दी गई महान कुर्बानी को याद करने का मौक़ा देता है। साथ ही, ये हमें उनके दिखाए रास्ते पर चलने की प्रेरणा भी देता है। सरदार तेजा सिंह समुदरी की पैदाइश 20 फरवरी 1882 को उस समय के ज़िला अमृतसर की तहसील तरनतारन के गांव राय का बुर्ज में हुई थी।
उनके पिता रसालदार मेजर देवा सिंह और माता नंद कौर थे। उनका परिवार एक सम्मानित फौजी परिवार था। इसी वजह से उनमें देशभक्ति, अनुशासन और सेवा का जज़्बा बचपन से ही मौजूद था। तेजा सिंह समुदरी बचपन से ही बेहद गंभीर, शांत स्वभाव और धार्मिक सोच रखने वाले इंसान थे। उनके दिल में सिख इतिहास और गुरबाणी के लिए गहरी आस्था थी। परिवार में अक्सर उनकी धार्मिक लगन, सादगी और विनम्रता की चर्चा होती रहती थी।

तेजा सिंह के नाम के साथ ‘समुंदरी’ कैसे जुड़ा?
जब अंग्रेज़ी हुक़ूमत पश्चिमी पंजाब (जो अब पाकिस्तान में है) के इलाकों में नहरों के ज़रिए नई ज़मीनों को आबाद कर रही थी, उस समय तेजा सिंह जी के पिता रसालदार मेजर देवा सिंह को उनकी फौजी सेवाओं के बदले ज़िला लायलपुर की तहसील समुंदरी के चक नंबर 140 (गोगेरा ब्रांच) में ज़मीन दी गई। इसके बाद उनका पूरा परिवार वहीं जाकर बस गया। इसी इलाके के नाम की वजह से उनके नाम के साथ हमेशा के लिए ‘समुंदरी’ शब्द जुड़ गया और वो सरदार तेजा सिंह समुदरी के नाम से पहचाने जाने लगे।
तेजा सिंह समुदरी ने अपनी शुरुआती पढ़ाई सिर्फ़ प्राइमरी लेवल तक ही की थी, लेकिन खुद पढ़ने और सीखने के ज़रिए उन्होंने धार्मिक ग्रंथों, इतिहास और समाज से जुड़े मुद्दों पर गहरी समझ हासिल कर ली थी। जवानी में कदम रखते ही उन्होंने फौज में दफेदार (कैवेलरी में एक गैर-कमीशंड अफसर का पद) के तौर पर नौकरी शुरू की। लेकिन आज़ाद सोच और कौम के लिए कुछ करने का जज़्बा रखने वाले तेजा सिंह ज़्यादा समय तक अंग्रेज़ों की नौकरी में नहीं रह सके। सिर्फ़ 3-4 साल की नौकरी के बाद उन्होंने अपना इस्तीफ़ा दे दिया और वापस अपने गांव लौट आए। इसके बाद उन्होंने अपनी ज़िंदगी को समाज और कौम की सेवा के लिए समर्पित कर दिया।

समाजिक सुधारों के अगुवा और चीफ़ खालसा दीवान से जुड़ाव
नौकरी छोड़ने के बाद सरदार तेजा सिंह समुदरी ने महसूस किया कि उस समय सिख समाज अशिक्षा, अंधविश्वास और कई सामाजिक बुराइयों से जूझ रहा था। उनका मानना था कि जब तक कौम तालीम के मैदान में मज़बूत नहीं होगी, तब तक वो अपने हक़ों और आज़ादी की हिफ़ाज़त नहीं कर पाएगी। जवानी के दिनों में ही उन्होंने सिखों की उस समय की बड़ी संस्था चीफ़ खालसा दीवान के सदस्य के तौर पर धार्मिक और सामाजिक कामों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। दीवान का मक़सद कौम में से अशिक्षा और गरीबी को दूर करना था, जिसने तेजा सिंह समुदरी को बहुत प्रभावित किया।
कौम को अज्ञानता के अंधेरे से बाहर निकालने के लिए उन्होंने कई अहम कदम उठाए। सबसे पहले उन्होंने अपने इलाके के समुंदरी में ‘खालसा दीवान’ की स्थापना की। इसके बाद इलाके की छोटी-छोटी सिख सभाओं को एक साथ जोड़कर ‘खालसा दीवान बार’ बनाया, जिसने लायलपुर और आसपास के इलाकों में जागरूकता की एक नई लहर पैदा की।
तालीम को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने अपने गांव में खालसा मिडिल स्कूल की स्थापना करवाई, जो बाद में हाई स्कूल बना। इसके अलावा सरहाली में श्री गुरु गोबिंद सिंह खालसा हाई स्कूल की शुरुआत भी करवाई। इन स्कूलों ने हज़ारों नौजवानों की ज़िंदगी बदलने में अहम भूमिका निभाई।

बीसवीं सदी के दूसरे दशक के आख़िर में सिख सियासत में एक बड़ा बदलाव आया। गुरुद्वारों को महंतों के कब्ज़े से आज़ाद करवाने के लिए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) और शिरोमणि अकाली दल की स्थापना हुई। सरदार तेजा सिंह समुदरी इन दोनों संस्थाओं के शुरुआती और अहम नेताओं में शामिल थे। 20 फरवरी 1921 को हुए श्री ननकाना साहिब के खूनी साके ने पूरी सिख कौम को झकझोर दिया।
इस घटना के बाद जब गुरु नानक देव जी की जन्मस्थली के प्रबंधन के लिए कमेटी बनाई गई, तो सरदार तेजा सिंह समुंदरी की ईमानदारी, संगठन क्षमता और समर्पण को देखते हुए उन्हें इस कमेटी का अहम सदस्य बनाया गया। वो शिरोमणि कमेटी के उपाध्यक्ष भी रहे और हर ज़िम्मेदारी को पूरी लगन और बेहतर तरीके से निभाया। उनका मक़सद हमेशा कौम की बेहतरी, तालीम का फैलाव और समाज में सुधार लाना रहा है।
‘अकाली पत्रिका’ अख़बार की शुरुआत
उस दौर में सिख कौम के पास अपनी आवाज़ को मज़बूती से उठाने के लिए कोई बड़ा मीडिया ज़रिया नहीं था। जब सिखों में धर्म के प्रचार-प्रसार और सियासी जागरूकता के लिए एक रोज़ाना अख़बार शुरू करने की बात चली, तो सरदार तेजा सिंह समुदरी ने इसमें अहम भूमिका निभाई। उन्होंने नई बनी सियासी पार्टी ‘शिरोमणि अकाली दल’ के सहयोग से रोज़ाना निकलने वाले अख़बार ‘अकाली पत्रिका’ (जिसे पहले ‘अकाली’ कहा जाता था) की शुरुआत करवाई। इस अख़बार को चलाने के लिए उन्होंने अपने निजी पैसों से भी बड़ी मदद की, जिससे कौम की आवाज़ और धार्मिक प्रचार को काफी ताक़त मिली।
सरदार तेजा सिंह समुदरी सिर्फ़ एक अच्छे प्रबंधक ही नहीं थे, बल्कि मैदान में उतरकर संघर्ष करने वाले बहादुर नेता भी थे। उन्होंने गुरुद्वारा सुधार लहर के हर बड़े मोर्चे में आगे बढ़कर हिस्सा लिया और कई बार गिरफ्तारियां दी। जानकारी के मुताबिक, जब अंग्रेज़़ हुकूमत ने नई दिल्ली के निर्माण के दौरान गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब की दीवार गिरा दी, तो सिखों में भारी गुस्सा फैल गया। इस विरोध आंदोलन में तेजा सिंह समुदरी ने आगे बढ़कर लीडरशिप की। जब शहादती जत्थे तैयार किए जा रहे थे, तो उन्होंने 100 सिंहों के बड़े जत्थे की अगुवाई के लिए सबसे पहले अपना नाम पेश किया। उनके मज़बूत इरादे और संघर्ष के सामने आखिरकार अंग्रेज़ सरकार को झुकना पड़ा।
इसके अलावा, जब अंग्रेज़ी हुक़ूमत ने श्री दरबार साहिब, अमृतसर के तोशाखाने की चाबियां अपने कब्ज़े में ले ली, तो इसके विरोध में ‘चाबियों का मोर्चा’ शुरू हुआ। इस आंदोलन में सरदार तेजा सिंह समुदरी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। आख़िरकार सिखों की जीत हुई और महात्मा गांधी ने इस जीत को “भारत की आज़ादी की लड़ाई की पहली बड़ी जीतों में से एक” के तौर पर माना।

जैतों का मोर्चा और तेजा सिंह समुंदरी का अडिग इरादा
नाभा के महाराजा रिपुदमन सिंह को अंग्रेज़ी हुक़ूमत के ज़रिए गद्दी से हटाए जाने के विरोध में ‘जैतों का मोर्चा’ शुरू किया गया। इस संघर्ष के दौरान अंग्रेज़ सरकार ने शिरोमणि कमेटी और अकाली दल को गैरकानूनी संगठन घोषित कर दिया। 13 अक्टूबर 1923 को तेजा सिंह समुंदरी को कई बड़े अकाली नेताओं के साथ गिरफ्तार कर लिया गया और लाहौर किले में बंद कर दिया गया। जब साल 1925 में लगातार चल रहे अकाली आंदोलनों से परेशान होकर अंग्रेज़ सरकार ने सिख गुरुद्वारा एक्ट पास किया, तो इस एक्ट के तहत जेल में बंद सिख नेताओं की रिहाई के लिए कुछ शर्तें रखी गई।
इस मौक़े पर सिख नेताओं के बीच दो राय बन गई। एक तरफ़ नरम विचार रखने वाला गुट था, जो एक्ट को स्वीकार करके और सरकार की शर्तें मानकर जेल से बाहर आने के लिए तैयार था। वहीं दूसरी तरफ़ सिद्धांतों पर कायम रहने वाला गुट था, जिसका मानना था कि अंग्रेज़ सरकार की शर्तों को मानना कौम के आत्म-सम्मान के खिलाफ़ है। उनका कहना था कि अगर गुरुद्वारों के प्रबंधन में सरकार की दखल बनी रही, तो सिख धर्म की आज़ादी और स्वतंत्र पहचान को नुकसान पहुंचेगा।
तेजा सिंह समुंदरी का मानना था कि, “दुनिया के दूसरे धर्मों के मामलों में सरकारें दखल नहीं देती। उसी तरह सिख गुरुधामों का प्रबंधन भी पूरी तरह आज़ाद और स्वतंत्र संस्थाओं के हाथों में होना चाहिए, न कि सरकारी शर्तों के तहत।” तेजा सिंह समुंदरी इस सिद्धांतवादी गुट के प्रमुख नेताओं में शामिल थे। उन्होंने साफ कर दिया कि वो ऐसी किसी भी शर्त पर जेल से बाहर नहीं आएंगे, जो सिख कौम की आज़ाद पहचान और अधिकारों को कमजोर करती हो। इसी वजह से उन्होंने जेल से रिहा होने के बजाय जेल में रहना बेहतर समझा और अपने उसूलों पर डटे रहे।

तेजा सिंह समुंदरी की शहादत और उनकी विरासत
लाहौर की सेंट्रल जेल और लाहौर किले की तंग, नम और मुश्किल भरी परिस्थितियों में करीब तीन साल तक बंद रहने की वजह से सरदार तेजा सिंह समुंदरी की सेहत बहुत ख़राब हो गई थी। जेल प्रशासन के सख़्त रवैये और शारीरिक तकलीफों के बावजूद उनका हौसला और आत्मिक ताक़त कभी कमज़ोर नहीं हुआ। आखिरकार, 17 जुलाई 1926 को सिर्फ़ 44 साल की उम्र में जेल के अंदर ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा। वो इस दुनिया को अलविदा कहकर गुरु चरणों में चले गए। उनकी शहादत ने पूरी सिख कौम को गहरे दुख में डाल दिया और वो अकाली लहर के महान शहीदों में हमेशा के लिए याद किए जाने लगे।
सरदार तेजा सिंह समुंदरी की बिना किसी स्वार्थ के सेवा, सादगी, ईमानदारी और कुर्बानी को सिख जगत आज भी बड़े सम्मान के साथ याद करते है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के श्री अमृतसर में मौजूद दफ़्तर (सचिवालय) की इमारत का नाम उनके सम्मान में ‘तेजा सिंह समुंदरी हॉल’ रखा गया है। ये हॉल आज भी सिख कौम के कई अहम फैसलों और बैठकों का गवाह है।
तेजा सिंह समुंदरी के संस्कार और सेवा का जज़्बा उनके बच्चों में भी दिखाई दिया। साल 1969 में, श्री गुरु नानक देव जी के 500वें प्रकाश पर्व के मौक़े पर अमृतसर में गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (GNDU) की स्थापना हुई। उस समय उनके बेटे सरदार बिशन सिंह समुंदरी को इस यूनिवर्सिटी का पहला वाइस चांसलर बनने का सम्मान मिला। उन्होंने भी अपने पिता की तरह तालीम के क्षेत्र में बड़ा योगदान दिया और शिक्षा को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।

आज जब साल 2026 में सरदार तेजा सिंह समुंदरी जी की शहादत की 100वीं बरसी मनाई जा रही है, तो हमें उनकी ज़िंदगी से बड़ी प्रेरणा लेने की ज़रूरत है। आज सिख कौम और समाज जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है, जैसे तालीम की कमी, नशे का बढ़ता चलन और अपनी संस्थाओं के अंदर आपसी मतभेद, उनका हल सरदार तेजा सिंह जी जैसी बिना किसी स्वार्थ की सेवा, मज़बूत इरादे और नेक सोच को अपनाने में ही है।
उन्होंने हमें सिखाया कि जिस तरह उन्होंने अपनी ज़िंदगी में स्कूलों की शुरुआत कर तालीम को बढ़ावा दिया, उसी तरह हमें भी अपनी आने वाली पीढ़ी को बेहतर शिक्षा देने के लिए काम करना चाहिए। सियासी फ़ायदे के लिए अपने धार्मिक और नैतिक उसूलों से कभी समझौता नहीं करना चाहिए। अपने निजी मतभेदों से ऊपर उठकर कौम और समाज की बेहतरी के लिए काम करना ही एक सच्चे इंसान और सच्चे सिख की पहचान है।
स्टोरी– गुरप्र
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