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सैय्यदना अमीर अबुल उला: रूहानियत, इबादत और इंसानियत के अलमबरदार

सैय्यदना अमीर अबुल उला (1583–1651 ई.) भारतीय उपमहाद्वीप के महान सूफ़ी बुज़ुर्गों में शुमार किए जाते हैं। वे नक्शबंदी अबुल-उलाइया सिलसिले के बानी (संस्थापक) थे। उनकी रूहानी शख़्सियत की सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि उन्होंने नक्शबंदी और चिश्ती दोनों सूफ़ी सिलसिलों की रूहानी तालीमात को एक साथ जोड़कर एक अनोखी परंपरा कायम की। इसी वजह से उनके सिलसिले को “मजमा-उल-बहरैन” यानी दो समंदरों का मिलन कहा गया।

पैदाइश और ख़ानदानी सिलसिला

हज़रत अमीर अबुल उला की पैदाइश 990 हिजरी / 1592 ईस्वी में दिल्ली के क़रीब नरेला में हुयी। आपका ख़ानदान नसब के एतबार से अहले बैत से जुड़ा हुआ माना जाता है। आपके वालिद अमीर अबुल वफ़ा और वालिदा बीबी आरिफ़ा एक अच्छे ख़ानदान से ताल्लुक़ रखते थे। आपको “मीर साहब”, “महबूब-ए-जल्लो-इला” और “सरताज-ए-आगरा” जैसी कई इज़्ज़त अफ़ज़ा उपाधियों से याद किया जाता है।

आपके आबा-ओ-अजदाद मूल रूप से किरमान (ईरान) के रहने वाले थे। बाद में वे समरकंद पहुंचे और फिर मुग़ल दौर में हिंदुस्तान आकर बस गए। आपके दादा अमीर अब्दुल सलाम अकबर बादशाह के ज़माने में भारत आए और आख़िरकार नरेला में बस गए।

तालीम और शुरुआती ज़िंदगी

बचपन से ही हज़रत अमीर अबुल उला ने दीनी और दुनियावी दोनों तरह की तालीम हासिल की। आपने फ़िक़्ह, हदीस, तफ़सीर और दूसरे उलूम के साथ-साथ तीरंदाज़ी और घुड़सवारी जैसी फ़नून में भी महारत हासिल की।

जवानी में कुछ समय तक आपने मुग़ल हुकूमत में प्रशासनिक ज़िम्मेदारी भी निभाई, लेकिन आपका दिल हमेशा इबादत, ज़िक्र और रूहानियत की तरफ़ माइल रहा। आख़िरकार आपने सरकारी ओहदा छोड़कर पूरी ज़िंदगी अल्लाह की बंदगी और इंसानों की ख़िदमत के लिए वक़्फ़ कर दी।

रूहानी सफ़र

रूहानी तलाश में आपने बिहार के मनेर शरीफ़ का रुख़ किया, जहां उस दौर के मशहूर सूफ़िया से फ़ैज़ हासिल किया। बाद में आपने अपने मामू हज़रत अमीर अब्दुल्ला नक्शबंदी से नक्शबंदी सिलसिले में बैअत की और उनसे ख़िलाफ़त भी हासिल की।

इसके बाद आपकी ज़िंदगी का एक अहम मोड़ उस वक़्त आया जब आप अजमेर शरीफ़ पहुंचे। रिवायतों के मुताबिक़, हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी से आपको रूहानी फ़ैज़ हासिल हुआ। इसी के बाद आपकी रूहानी तालीम में नक्शबंदी और चिश्ती दोनों सिलसिलों का ख़ूबसूरत इत्तिहाद दिखाई देने लगा।

जहांगीर के दरबार का वाक़िआ

एक मशहूर रिवायत के मुताबिक़, मुग़ल बादशाह जहांगीर ने आपको अपने दरबार में बुलाया। तीरंदाज़ी के मुकाबले में आपने अपनी महारत का सबूत दिया। बादशाह ने इनाम के तौर पर शराब पेश की, लेकिन आपने उसे पीने से इंकार कर दिया और फ़रमाया:

“मुझे किसी बादशाह के ग़ज़ब से ज़्यादा अल्लाह और उसके रसूल की नाराज़गी का ख़ौफ़ है।”

आपकी इस बेबाक़ी और इस्तिक़ामत ने दरबार में मौजूद लोगों को हैरत में डाल दिया।

तालीमात और पैग़ाम

हज़रत अमीर अबुल उला ने अपनी पूरी ज़िंदगी इंसानों की इस्लाह, अल्लाह की इबादत और अख़लाक़ी ज़िंदगी की तालीम देने में गुज़ारी। आपकी तालीमात आज भी लाखों लोगों के लिए मशअल-ए-राह हैं।

  • इंसान अपनी भलाई से पहले दूसरों की भलाई का ख़याल रखे।
  • सूफ़ी की असल क़द्र वही जान सकता है जो रूहानियत की राह पर चलता हो।
  • मुश्किलों से निजात का रास्ता अल्लाह का ख़ौफ़ और सीधी राह पर चलना है।
  • दुनिया की सबसे बड़ी दौलत अल्लाह की इबादत और उसकी रज़ा हासिल करना है।

हज़रत सैय्यदना अमीर अबुल उला का विसाल 9 सफ़र 1061 हिजरी (31 जनवरी 1651 ई.) को हुआ। आपका मज़ार आगरा में है, जहां आज भी दूर-दूर से अकीदतमंद हाज़िरी देते हैं। हर साल आपका उर्स बड़ी अक़ीदत के साथ मनाया जाता है।

हज़रत अमीर अबुल उला की रूहानी विरासत उनके ख़ुलफ़ा और सिलसिले के ज़रिये पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैली। उन्होंने मोहब्बत, ख़िदमत, इख़लास और इंसानियत का जो पैग़ाम दिया, वह आज भी सूफ़ी तालीमात की रूह माना जाता है।

ये भी पढ़ें:अमीर हसन सिज्ज़ी: हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के अज़ीज़ मुरीद और सूफ़ी शायर 

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