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शैख़ फ़ख़रुद्दीन इब्राहीम इराक़ी: सूफ़ी फ़िक्र की बुलंद आवाज़

शैख़ फ़ख़रुद्दीन इब्राहीम इराक़ी सातवीं सदी हिज्री के उन अज़ीम सूफ़ी बुज़ुर्गों में शुमार किए जाते हैं जिन्होंने अपनी फ़िक्र, तसव्वुफ़ और फ़ारसी शाइ’री के ज़रिये इश्क़-ए-हक़ीक़ी को नई बुलंदियां अता कीं। वह एक कामिल आ’रिफ़, गहरे फ़लसफ़ी, मुहक़्क़िक़ अदीब और बुलंद-पाया सूफ़ी शाइ’र थे। उनका कलाम आज भी ख़ानक़ाहों, दरगाहों और अदबी महफ़िलों में उसी अक़ीदत और मुहब्बत से पढ़ा और सुना जाता है।

शैख़ इराक़ी की पैदाइश 10 जून 1213 ईस्वी में ईरान के शहर हमदान में हुयी। आपके वालिद का नाम अ’ब्दुल ग़फ़्फ़ार कमीज़ानी था। बचपन ही से इल्म और रूहानियत की तरफ़ आपकी गहरी रुचि थी। बहुत कम उम्र में आपने पूरा क़ुरआन-ए-मजीद हिफ़्ज़ कर लिया। इसके बाद आपने हमदान में दीनी और अक़्ली उलूम की तालीम हासिल की और महज़ 17 साल की उम्र में मआ’क़ूलात व मंक़ूलात की तकमील कर ली। कुछ रिवायतों के मुताबिक़ इसके बाद आप बग़दाद चले गए, जहां इल्म, तसव्वुफ़ और फ़िक्र की दुनिया ने आपकी शख़्सियत को और निखारा।

इराक़ी सिर्फ़ एक शाइ’र नहीं थे, बल्कि इश्क़ और मआरिफ़त के ऐसे फ़लसफ़ी थे जिन्होंने इंसान और ख़ुदा के दरमियान रूहानी रिश्ते को अपनी शाइ’री का मरकज़ बनाया। उनकी फ़ारसी ग़ज़लों और सूफ़ियाना अश्आर में इश्क़-ए-इलाही, फ़ना, तौहीद और ख़ुदी से बेख़ुदी तक का सफ़र बड़ी ख़ूबसूरती से झलकता है। यही वजह है कि सदियां गुज़र जाने के बावजूद उनका कलाम आज भी सूफ़ी सिलसिलों की महफ़िलों में रूहानी कैफ़ियत पैदा करता है।

उनकी शाइ’री का एक मशहूर कलाम इंसान को रियाकारी छोड़कर सच्ची बंदगी की तरफ़ बुलाता है।

सनमा रह-ए-क़लन्दर सज़द अर ब-मन नुमाई
कि दराज़-ओ-दूर दीदम रह-ओ-रस्म-ए-पारसाई

यानी, ऐ सनम! अगर तू अपना जल्वा दिखा दे तो क़लंदरों की राह ही बेहतर है, क्योंकि ज़ाहिरी परहेज़गारी का रास्ता बहुत लंबा और दुश्वार है।

एक और शे’र में वह फ़रमाते हैं।

ब-तवाफ़-ए-का’बा रफ़्तम, ब-हरम रहम न-दादन्द
कि बैरून-ए-दर चे कर्दी कि दरून-ए-ख़ाना आई

मैं काबे के तवाफ़ के लिए पहुंचा, लेकिन हरम में दाख़िले की इजाज़त न मिली। मुझसे पूछा गया—दरवाज़े के बाहर तुमने ऐसा क्या किया है कि अब भीतर आने के ख़्वाहिशमंद हो?

इसी तरह उनका यह शे’र रियाकारी पर गहरी चोट करता है।

ब-ज़मीं चु सज्दा कर्दम, ज़े ज़मीं निदा बर-आमद
कि मरा ख़राब कर्दी तू ब-सज्दा-ए-रियाई

यानी, जब मैंने ज़मीन पर सज्दा किया तो ज़मीन से आवाज़ आई—तूने दिखावे के सज्दे से मुझे भी मैला कर दिया।

शैख़ इराक़ी की तालीमात का मरकज़ यह था कि बंदा जब तक अपनी “मैं” से आज़ाद नहीं होता, तब तक हक़ीक़त का दरवाज़ा उस पर नहीं खुलता। उनके नज़दीक तसव्वुफ़ का अस्ल मक़सद अपनी ज़ात को मिटाकर ख़ुदा की ज़ात में फ़ना हो जाना है।

जब तक इंसान अपनी ख़ुदी, अहंकार और नफ़्स से चिपका रहता है, उसके और ख़ुदा के दरमियान हज़ारों पर्दे हाइल रहते हैं। लेकिन जिस लम्हे इंसान अपनी “मैं” से ग़ायब हो जाता है, उसी वक़्त सारे पर्दे उठ जाते हैं और वह अपने रब की क़ुर्बत का एहसास करता है।

1289 ईस्वी में इस अज़ीम सूफ़ी शाइ’र का विसाल हुआ, लेकिन उनकी तालीमात, उनका फ़लसफ़ा और उनका सूफ़ियाना कलाम आज भी इश्क़-ए-हक़ीक़ी के मुसाफ़िरों के लिए रौशनी का मीनार बना हुआ है।

ये भी पढ़ें:अमीर हसन सिज्ज़ी: हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के अज़ीज़ मुरीद और सूफ़ी शायर 

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