समाज में बदलाव सिर्फ़ बड़े-बड़े भाषणों से नहीं आता, बल्कि एक छोटी सी अच्छी सोच और ईमानदार कोशिश से भी बदलाव की शुरुआत हो सकती है। ऐसी ही एक मिसाल सरबजीत सिंह और उनकी टीम ने पेश की है। शहरवासियों के मदद से उन्होंने एक ऐसा ‘बुक बैंक’ (Free Library) शुरू किया है, जो आज सैकड़ों ज़रूरतमंद बच्चों के सपनों को पूरा करने में मदद कर रहा है।
दरअसल, सरबजीत सिंह पेशे से बेकरी चलाते हैं। अपने दोस्तों सुनील गर्ग, मनजीत सिंह, अमृत और निशू के साथ मिलकर उन्होंने ये नेक काम शुरू किया। उनकी कहानी हमें बताती है कि अगर इरादे नेक हों, तो बेकार समझे जाने वाले पुराने कागज़ और किताबें भी किसी की ज़िंदगी में नई रोशनी ला सकती हैं।
रद्दी की कमाई से बच्चों की पढ़ाई तक का सफ़र
सरबजीत सिंह बताते हैं कि इस नेक पहल की शुरुआत करीब 8-10 साल पहले हुई थी। जब सरबजीत और उनके साथियों ने अपनी पढ़ाई पूरी की, उस वक़्त रोज़गार की कमी की वजह से उनके पास कोई पक्की नौकरी या काम नहीं था। लेकिन खाली बैठने के बजाय उन्होंने कुछ अच्छा करने का फैसला किया और अपने ज़रूरतमंद बच्चों को मुफ़्त में पढ़ाना शुरू कर दिया।

धीरे-धीरे बच्चों की पढ़ाई के लिए किताबें, पेंसिल और मशीन का किराया जैसे खर्च बढ़ने लगे। इन खर्चों को पूरा करने के लिए पैसों की ज़रूरत थी। इसी वजह से इस टीम ने मोहल्ले के घरों से रद्दी इकट्ठा करना शुरू किया और उसकी कमाई से बच्चों की पढ़ाई का इंतज़ाम करने लगे।
रद्दी के ढेर से मिला किताबों का ख़ज़ाना
रद्दी इकट्ठा करने के दौरान इस काम में एक नया मोड़ आया। लोग अक्सर अपने बच्चों की पढ़ाई पूरी होने के बाद पुरानी किताबों को रद्दी में डाल देते थे। लेकिन इस टीम का दिल उन कीमती किताबों को बेचने का नहीं हुआ। उन्हें एहसास हुआ कि ये किताबें किसी दूसरे ज़रूरतमंद स्टूडेंट्स के लिए बहुत काम आ सकती हैं। इसलिए उन्होंने किताबों को अलग करके संभालना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे किताबों का ये संग्रह इतना बड़ा हो गया कि उन्होंने ‘बुक बैंक’ शुरू किया। आज यही बुक बैंक कई बच्चों की पढ़ाई में मदद कर रहा है।
बुक बैंक का तरीका: लो और दो
ये बुक बैंक रोज़ाना दोपहर 2 बजे से शाम 6-7 बजे तक खुला रहता है। धीरे-धीरे शहर के बच्चों को भी इसके बारे में जानकारी मिल गई है और अब कई बच्चे इसका फ़ायदा उठा रहे हैं। यहां से किताबें लेने का तरीका बहुत आसान है। जैसे अगर कोई बच्चा छठी क्लास पास कर चुका है, तो वो अपनी क्लास की किताबें यहां जमा कर देता है और बदले में सातवीं क्लास की किताबें बिल्कुल मुफ़्त ले जाता है। इसी सिलसिले की वजह से आज इस लाइब्रेरी में पहली से 12वीं तक के सिलेबस की किताबों के साथ-साथ मेडिकल, नॉन-मेडिकल, योगा, जनरल नॉलेज और दूसरी साहित्यिक किताबों का भी बड़ा ज़ख़ीरा मौजूद है।

महंगी पढ़ाई के दौर में एक बड़ी राहत
सरबजीत सिंह बताते हैं कि आज के समय में हाईयर एजुकेशन जैसे मेडिकल और नॉन-मेडिकल की किताबें बहुत महंगी हो गई हैं। मॉडर्न पब्लिकेशन जैसी किताबों की कीमत 1200 से 1300 रुपये तक पहुंच जाती है, जो कई ग़रीब परिवारों के लिए खरीदना आसान नहीं होता। जब कोई बच्चा दसवीं क्लास (जिसकी किताबें आमतौर पर कम महंगी होती हैं) पास करके ग्यारहवीं की महंगी किताबें लेने आता है।
तो वो इस बात का ख़ास ख़्याल रखते हैं कि किताब सही मायने में किसी ज़रूरतमंद स्टूडेंट तक पहुंचे। इसके लिए वो बच्चे के स्कूल टीचर से बात करते हैं या कोई सर्टिफिकेट देखकर किताबें बिल्कुल मुफ़्त मुहैया कराते हैं, ताकि पढ़ाई का ख़्वाब पैसों की कमी की वजह से अधूरा न रह जाए।
सामाजिक विरोध से सहयोग तक का सफ़र
अपने तजुर्बे साझा करते हुए सरबजीत सिंह कहते हैं कि कोई भी नेक काम आसान नहीं होता। शुरुआत में उनकी टीम को लोगों की कई बातें और ताने सुनने पड़े। आसपास के लोग और दोस्त मज़ाक उड़ाते थे, “लो, रद्दी वाले आ गए।”
यहां तक कि एक लड़की ने उनसे पूछा, “कहीं आप इस रद्दी को बेचकर नशा तो नहीं कर लेंगे?” लेकिन सरबजीत सिंह और उनकी टीम ने हिम्मत नहीं हारी। जैसे-जैसे बुक बैंक के अच्छे नतीजे सामने आने लगे और ज़रूरतमंद बच्चों को इसका फ़ायदा मिलने लगा, लोगों की सोच भी बदलने लगी। जो लोग पहले इस काम का मज़ाक उड़ाते थे, आज वही लोग आगे बढ़कर अपने घरों से किताबें लाकर इस बुक बैंक को दान करते हैं।
सुकून और सामाजिक ज़िम्मेदारी
सरबजीत सिंह का मानना है कि आज के दौर में हर इंसान पैसों की अंधी दौड़ में भाग रहा है। जिसके पास 1 करोड़ रुपये हैं, वो 10 करोड़ रुपये कमाने के पीछे भाग रहा है। लेकिन ज़िंदगी का असली सुकून इस दौड़ में नहीं, बल्कि समाज के लिए अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में है। वो कहते हैं कि उन्हें अपने कारोबार में भी उतनी शांति नहीं मिलती, जितनी इस बुक बैंक में अकेले बैठकर मिलती है। यहां बैठकर ऐसा महसूस होता है कि अगर अल्लाह ने हमें ज़िंदगी और सांसें दी हैं, तो कुछ अच्छा करना हमारी ज़िम्मेदारी है।

सपनों को मिली असली उड़ान
इस पहल की सबसे बड़ी कामयाबी एक नेत्रहीन बच्चे की कहानी है, जिसे दिखाई नहीं देता था। वो बच्चा इस बुक बैंक से जुड़ा और टीम ने उसे सिर्फ़ किताबें ही नहीं दीं, बल्कि उसकी फीस भरने में भी मदद की। उस बच्चे ने पूरी मेहनत और लगन के साथ पढ़ाई की और आज वो एक सरकारी नौकरी (फोर्थ क्लास) पर काम कर रहा है। जब उसे अपनी पहली तनख़्वाह मिली
तो उसने उस पैसे से अपने भाई के लिए एक ऑटो-रिक्शा खरीद दिया, ताकि उसके परिवार का गुज़ारा बेहतर तरीके से चल सके। भले ही अल्लाह ने उस बच्चे की आंखों को रोशनी नहीं दी थी, लेकिन बुक बैंक की किताबों ने उसकी ज़िंदगी में कामयाबी की नई रोशनी भर दी।
शहरवासियों से ख़ास अपील
इसके साथ ही, सरबजीत सिंह और उनकी टीम शहर के सभी लोगों से एक ख़ास अपील भी करते है। उनका कहना है कि जब भी आपके बच्चे अपनी क्लास पास कर लें, तो किताबों को घर में रखने या रद्दी वाले का इंतज़ार करने के बजाय उन्हें उसी समय बुक बैंक में दान कर दें। अगर किताबें समय पर लाइब्रेरी तक पहुंच जाएंगी, तो नए सेशन की शुरुआत में ही ज़रूरतमंद स्टूडेट्स को ये किताबें आसानी से मिल सकेंगी। इससे कोई भी बच्चा किताबों की कमी की वजह से मायूस होकर वापस नहीं लौटेगा। इसलिए आइए, हम सभी मिलकर इस नेक काम में अपना योगदान दें और किसी बच्चे के सपनों को पूरा करने में मददगार बनें।
स्टोरी– मनमीत कौर
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