उर्दू अदब में मंज़ूर आरिफ़ का नाम उन शायरों में शुमार होता है जिन्होंने अपनी सादा लेकिन असरदार शायरी से अलग पहचान बनाई। वे मशहूर उर्दू शायर तिलोक चंद महरूम के शागिर्द थे, जिन्हें उर्दू अदब का एक बड़ा नाम माना जाता है। बाद में उन्होंने मशहूर शायर अंजुम रिज़वानी से भी इस्लाह ली और अपने फ़न को और निखारा।
मंज़ूर आरिफ़ की पैदाइश 1 सितंबर 1924 को ज़िला अटक के अपने ननिहाल में हुयी। शुरुआती तालीम के बाद उन्होंने गॉर्डन कॉलेज, रावलपिंडी से 1945 में ग्रेजुएशन किया। इसके बाद गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर से 1949 में क़ानून (एलएलबी) की डिग्री हासिल की।
बात तेरी सुनी नहीं मैंने,
ध्यान मेरा तेरी नज़र पर था।
शायरी का शौक़ उन्हें बचपन से ही था। कम उम्र में ही उन्होंने अशआर कहना शुरू कर दिया था। उनकी शायरी में ज़िंदगी, इंसानी रिश्ते, मोहब्बत, तन्हाई और वक़्त की नापायदारी जैसे मौज़ूआत बड़ी सादगी और गहराई के साथ नज़र आते हैं।
उनका इकलौता शे’री मजमूआ “लहू लहू दरिया” उनके इंतिक़ाल के बाद प्रकाशित हुआ। मंज़ूर आरिफ़ को छछाची ज़बान का पहला शायर भी माना जाता है। उन्होंने अपनी मातृभाषा को अदबी पहचान दिलाने में अहम किरदार निभाया।
वो क्या गया कि हर इक शख़्स रह गया तन्हा,
उसी के दम से थीं बाहम रिफ़ाक़तें सारी।
सिर्फ़ शायरी ही नहीं, मंज़ूर आरिफ़ एक बेहतरीन कॉलम-निगार और ड्रामा-नवीस भी थे। साल 1951 में उन्होंने रोज़नामा तामीर में “मकतूब” नाम से कॉलम लिखना शुरू किया। इसके अलावा रोज़नामा जंग में उनका मशहूर कॉलम “महफ़िलें” भी नियमित रूप से प्रकाशित होता रहा। उन्होंने रेडियो के लिए भी बड़ी तादाद में ड्रामे लिखे और अपनी ख़ास पहचान बनाई।
कुछ न कुछ हुस्न भी तो है मुजरिम,
सब का सब आंख का गुनाह नहीं।
मंज़ूर आरिफ़ तरक़्क़ीपसंद तहरीक़-ए-अदब से भी जुड़े रहे और अपनी तहरीरों के ज़रिए समाज और इंसानी एहसासात को आवाज़ दी। 30 नवंबर 1980 को रावलपिंडी में उनका इंतिक़ाल हो गया, लेकिन उनकी शायरी आज भी अदब के चाहने वालों के दिलों में ज़िंदा है।
थी कभी, अब मगर वो चाह नहीं,
उनसे पहली-सी रस्म-ओ-राह नहीं।
उनकी शायरी की सबसे बड़ी ख़ूबी उसकी सादगी है। वे मुश्किल अल्फ़ाज़ के बजाय आम ज़िंदगी की बातों को ऐसे अंदाज़ में कहते हैं कि हर पढ़ने वाला ख़ुद को उनसे जुड़ा हुआ महसूस करता है। उनकी ग़ज़लों और नज़्मों में फ़िक्र, मोहब्बत, तन्हाई, वक़्त और इंसानी ज़िंदगी का दर्द बार-बार दिखाई देता है।
ऐसा दिलकश था कि थी मौत भी मंज़ूर हमें,
हम ने जिस जुर्म की काटी है सज़ा ज़िंदां में।
मंज़ूर आरिफ़ की शायरी आज भी यह एहसास दिलाती है कि सच्चे जज़्बात को असरदार बनाने के लिए मुश्किल अल्फ़ाज़ नहीं, बल्कि सच्ची सोच और गहरी नज़र की ज़रूरत होती है। यही वजह है कि उनका कलाम आज भी उर्दू अदब के क़द्रदानों के बीच उसी मोहब्बत से पढ़ा और सराहा जाता है।
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