20 मई 2026 को रिलीज़ हुआ ‘कचौड़ी गली’ गाना हर किसी की ज़ुबान पर था। Coke Studio Bharat के इस गाने ने रिलीज़ होते ही लोगों का ध्यान खींचा। इसे रेखा भारद्वाज, ख़्वाब और Utpal Udit (उत्पल उदित) ने अपनी आवाज़ दी है। गाने में बनारस की गलियों, लोक संगीत और एक ऐसी कहानी को जोड़ा गया है, जिसमें प्यार, जुदाई, दर्द और पलायन की तस्वीर दिखाई देती है। बिहार के सहरसा के रहने वाले Utpal Udit ने DNN24 के साथ बातचीत के दौरान बताया कि ‘कचौड़ी गली’ के बाद उनकी ज़िंदगी में काफी बदलाव आया है।
अब जब वो सड़क पर निकलते हैं तो लोग उन्हें पहचानने लगते हैं। लेकिन उनके लिए इस पहचान से भी ज़्यादा ज़रूरी है अपने टैलेंट पर बढ़ता भरोसा। आज Folk Music सिर्फ़ उनका काम नहीं, बल्कि उनकी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है।
कचौड़ी गली के बाद बढ़ा खुद पर भरोसा
फेमस होने के बाद ज़िंदगी में बदलाव तो आता ही है। Utpal Udit (उत्पल उदित) बताते हैं कि अब जब वो सड़क पर चलते हैं तो लोग उन्हें पहचान लेते हैं। उनके लिए ये एक अलग एक्सपीरियंस है। लेकिन इस पहचान के साथ उनके अंदर अपने टैलेंट को लेकर आत्मविश्वास भी बढ़ा है। सहरसा से Coke Studio Bharat तक पहुंचने का सफ़र उनके लिए आसान नहीं था। इस रास्ते में कई उतार-चढ़ाव आए। शायद उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि लोक संगीत का उनका सफ़र उन्हें इतने बड़े मंच तक लेकर जाएगा। लेकिन बचपन में शुरू हुआ संगीत का ये सफ़र धीरे-धीरे उनकी पहचान बन गया।

5-6 साल की उम्र में शुरू हुआ संगीत से रिश्ता
Utpal Udit (उत्पल उदित) का संगीत से जुड़ाव उनके बड़े भाई की वजह से हुआ। उनके भाई को संगीत का बहुत शौक था। जब उत्पल करीब पांच-छह साल के थे, तब उनके भाई ज़िद करके घर में हारमोनियम लेकर आए। बाद में उनके भाई पढ़ाई में व्यस्त हो गए और संगीत उनसे दूर होता गया, लेकिन हारमोनियम ने उत्पल की ज़िंदगी में अपनी जगह बना ली। पिता का ट्रांसफर जब हिलसा, नालंदा हुआ तो उन्हें वहां संगीत की ट्रेनिंग लेने का मौक़ा मिला।
Utpal Udit (उत्पल उदित) बताते हैं कि जब उन्होंने पहली बार हारमोनियम छुआ तो उनके कान खुद नोट्स ढूंढने लगे थे। उन्हें जानने की उत्सुकता होती थी कि ये गाना कैसे बनेगा और एक सुर दूसरे सुर से कैसे जुड़ेगा। धीरे-धीरे यही जिज्ञासा संगीत की समझ में बदल गई। उनके पिता ने भी संगीत सीखने से कभी उन्हें नहीं रोका। हां, एग्ज़ाम के समय पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए ज़रूर कहते थे। लेकिन पढ़ाई के बीच भी उत्पल हारमोनियम लेकर बैठ जाते थे। शायद उसी समय तय हो गया था कि संगीत उनके लिए सिर्फ़ शौक़ नहीं रहने वाला।
पिता के ट्रांसफर ने दिखाई Folk Music की दुनिया
Utpal Udit (उत्पल उदित) के पिता की नौकरी में काफी ट्रांसफर हुए। लेकिन यही ट्रांसफर उनके लिए अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों को समझने का ज़रिया बन गया। हर नई जगह पर उन्हें एक नई भाषा सुनने को मिली, नए लोग मिले और उनकी अपनी लोक परंपराओं से मुलाकात हुई। उन्हें कई भाषाएं पहली बार में अलग लगती थीं, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें महसूस हुआ कि अलग-अलग भाषाओं में कई चीजें एक जैसी हैं। कुछ शब्द मिलते हैं, कुछ भाव मिलते हैं और कई कहानियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई लगती हैं।
इसी दौरान उन्होंने देखा कि अलग-अलग जगहों पर लोग अपने आसपास की ज़िंदगी से गीत बना लेते हैं। उस वक्त उन्हें पता नहीं था कि यही Folk Music है। पटना में उत्पल बताते हैं कि खेतों में काम करने वाले मज़दूरों को Folk Music की तकनीकी समझ भले ही न पता हो, लेकिन घास काटते हुए या रोपाई करते हुए वो अपनी ज़िंदगी की किसी छोटी-सी घटना को गीत में बदल देते हैं। किसी की गाय बीमार है तो उसी पर गीत बन गया, कोई और घटना हुई तो वो गीत का हिस्सा बन गई

गांवों में खुली Folk Music की नई दुनिया
जब Utpal Udit (उत्पल उदित) ने गांवों में जाकर लोक संगीत को करीब से समझना शुरू किया तो उन्हें लगा कि Folk Music की दुनिया उनकी सोच से कहीं ज़्यादा बड़ी है। गांवों में आज भी ऐसा बहुत सा लोक संगीत मौजूद है, जिसका डॉक्यूमेंटेंशन नहीं हुआ है। यही वजह है कि वो अब लोगों के बीच बैठते हैं, गीत सुनते हैं, उन्हें लिखते हैं और रिकॉर्ड करते हैं। उनका मानना है कि हो सकता है कोई गीत आज लोकप्रिय न हो, लेकिन अगर उसे रिकॉर्ड करके सुरक्षित रख लिया जाए तो आने वाले समय में लोग कम से कम ये जान सकेंगे कि ये गीत कभी मौजूद था।
बिहार के अलग-अलग इलाकों की अपनी लोक परंपराएं हैं। आरा में भिखारी ठाकुर की परंपरा दिखाई देती है, भोजपुर में महेंद्र मिश्र का नाम आता है और मिथिला की अपनी समृद्ध लोक संस्कृति है, जिसमें विद्यापति और मंडन मिश्र जैसे नाम जुड़े हैं। उत्पल के लिए ये सिर्फ़ इतिहास नहीं, बल्कि आज भी ज़िंदा एक म्यज़िकल वर्ल्ड है।
‘कचौड़ी गली’ में प्यार से ज़्यादा है जुदाई का दर्द
‘कचौड़ी गली’ को अगर पहली बार सुना जाए तो ये एक खूबसूरत लोकगीत लगता है। लेकिन इसके पीछे की कहानी को समझने पर इसके कई लेयर सामने आते हैं। उत्पल के मुताबिक इस गीत का सबसे बड़ा भाव विरह है। आज अगर हमारा कोई अपना हमसे दूर है तो फोन, वीडियो कॉल के ज़रिए उससे बात कर सकते हैं।
लेकिन उस दौर में ऐसा कोई ज़रिया नहीं था। किसी अपने के दूर जाने का मतलब सच में इंतज़ार और अनिश्चितता था। गाने की कहानी में एक नए-नवेले जोड़े के पति को अंग्रेज़ उठा ले जाते हैं। पीछे रह जाता है उसकी पत्नी और उसका इंतज़ार। इसलिए गीत में सिर्फ़ प्यार नहीं है, बल्कि व्यथा, गुस्सा और अंग्रेज़ों के खिलाफ़ रेज भी है।

कचौड़ी गली की कहानी आज के दौर से कैसे जुड़ती है?
इस सवाल का जवाब Utpal Udit (उत्पल उदित) ‘पलायन’ में देखते हैं। उनके मुताबिक बिहार से मुंबई जाकर रहने भी पलायन है। और ये कई स्टेज में होता है। गांव से शहर, शहर से दूसरे शहर और फिर किसी बड़े महानगर तक जाना भी पलायन का हिस्सा है। वो अपने परिवार की मिसाल देते हुए बताते हैं कि उनके पैतृक गांव बघवा से एक पीढ़ी पहले सहरसा आना भी एक तरह का पलायन था।
फिर सहरसा से पटना और पटना से मुंबई तक का सफ़र। आज भी बिहार से मुंबई, दिल्ली और पंजाब जाने वाली ट्रेनें लोगों से भरी रहती हैं। लोग काम की तलाश में घर से दूर जाते हैं और परिवार पीछे रह जाता है। यानी समय बदल गया है, लेकिन कहानी पूरी तरह नहीं बदली। बस किरदार और जगहें बदल गई हैं। यही वजह है कि ‘कचौड़ी गली’ का दर्द आज भी लोगों को अपना लगता है।
भोजपुरी और मगही में छिपी है समय से आगे की सोच
Utpal Udit (उत्पल उदित) का मानना है कि भोजपुरी, मगही और दूसरी लोक भाषाओं की खूबसूरती सिर्फ़ उनकी भाषा में नहीं, बल्कि उनके विचारों में भी है। वो कहते हैं कि जिस दौर में कचौड़ी गली गीत लिखा और गाया गया, उस समय भी उनमें ऐसे मुद्दे मौजूद थे जिन पर आज चर्चा होती है। लोकगीतों में नारीवाद और समाज की कई परेशानियों पर बात होती रही है।
उनके मुताबिक हम अक्सर अपनी विरासत को उस नज़र से देखते ही नहीं, जिस नज़र से दुनिया के दूसरे कलाकार को देखते हैं। जैसे John Lennon और The Beatles के गीतों को उनके समय से आगे की सोच के लिए याद किया जाता है, वैसे ही हमारी लोक परंपराओं में भी ऐसी कई बातें हैं जिन्हें पहचानने की ज़रूरत है।

Folk Music को बचाना ही नहीं, ग्लोबल बनाना है सपना
Utpal Udit (उत्पल उदित) के लिए Folk Music को अगली नई पीढ़ी तक पहुंचाना ज़रूरी है, लेकिन उनका सपना सिर्फ़ इतना नहीं है। वो इस संगीत को ग्लोबल ऑडियंस तक ले जाना चाहते हैं। ज़रूरी नहीं कि दुनिया के किसी दूसरे कोने में बैठा व्यक्ति भोजपुरी या मगही समझ पाए। लेकिन अगर वो उस संगीत की खूबसूरती महसूस कर सके तो संगीत अपना काम कर चुका है। उत्पल मानते हैं कि कला दिलों को जोड़ती है। भाषा अलग हो सकती है, लेकिन भाव समझ में आ सकता है।
नया साउंड हो, लेकिन लोक संगीत की रूह न बदले
लोक संगीत को नए अंदाज़ में पेश करने को लेकर उत्पल का नज़रिया साफ है। उनके मुताबिक कम्पोज़िशन के साथ एक्सपैरिमेंट किया जा सकता है। नए इंस्ट्रूमेंट जोड़े जा सकते हैं। लेकिन गीत का मूल भाव और वजूद नहीं बदलना चाहिए। उनके लिए सबसे ज़रूरी सवाल है कि किसी पुराने लोकगीत को कितनी ईमानदारी से पेश किया जा रहा है। ‘कचौड़ी गली’ के दौरान भी यही कोशिश रही। गाने का मक़सद सिर्फ़ उसे नया साउंड देना नहीं था, बल्कि उसके मूल भाव को बचाए रखना था। रेखा भारद्वाज की आवाज़ को लेकर भी यही बात सामने आती है। उनकी आवाज़ में एक अलग इतिहास और दर्द है, जो गीत के भाव को और गहरा बनाता है।
गाना बनाने से पहले बिज़नेस नहीं, ईमानदारी ज़रूरी
आज के दौर में कोई गाना रिलीज़ होने से पहले ही उसके व्यूज़, ट्रेंड और कमाई की बात शुरू हो जाती है। लेकिन Utpal Udit (उत्पल उदित) का मानना है कि एक आर्टिस्ट को सबसे पहले गाने के साथ ईमानदार होना चाहिए। उनके मुताबिक गाना सिर्फ़ उस दिन के लिए नहीं बनता जिस दिन वो रिलीज़ होता है। आर्टिस्ट के चले जाने के बाद भी उसका गाना दुनिया में मौजूद रहता है। इसलिए उसे इस तरह बनाना चाहिए कि उसमें ईमानदारी दिखाई दे। उनके लिए असली सवाल ये नहीं है कि गाना कितना ट्रेंड करेगा, बल्कि ये है कि क्या वो अपने भाव और कहानी को सही तरीके से लोगों तक पहुंचा पा रहा है।

मुरेठा पहनने के पीछे भी है एक सोच
Utpal Udit (उत्पल उदित) के लुक में एक चीज़ ख़ास तौर पर नजर आती है मुरेठा। ये सिर्फ़ सिर पर बांधा जाने वाला कपड़ा नहीं, बल्कि उनके लिए एक सोशल सिंबल भी है। वो बताते हैं कि मुरेठा को अक्सर मज़दूर वर्ग से जोड़कर देखा जाता है और कई बार इसे पहनने वालों को कमतर नज़र से देखा जाता है। उनका सवाल है कि अगर कोई पठान पकौल पहनता है या कोई पंजाबी पगड़ी पहनता है तो उसके पहनावे पर सवाल नहीं उठता, फिर मज़दूर वर्ग से जुड़े इस पहनावे को अलग नज़र से क्यों देखा जाए? मुरेठा पहनना उनके लिए इसी सोच को बदलने की एक छोटी-सी कोशिश है।
क्यों बिहार में दरभंगा है सबसे ख़ास
बिहार की पसंदीदा जगह पूछने पर उत्पल का जवाब है दरभंगा। इसकी एक वजह उनका मिथिला से जुड़ाव है, लेकिन दरभंगा उन्हें अपने रिच कल्चर की वजह से भी पसंद है। वहां का खानपान, मखाना और मैथिली भाषा उन्हें बेहद पसंद है। ख़ासकर मैथिली बोलने का तरीका उन्हें बहुत प्यारा लगता है। उनके मुताबिक वहां लोग जिस अपनापन और प्यार से बात करते हैं, वो अपने आप में ख़ास एक्सपीरियंस है।
अगर संगीत उनकी ज़िंदगी में नहीं आता तो वो क्या करते? इस सवाल पर उत्पल कहते हैं कि उन्होंने बहुत कम उम्र में तय कर लिया था कि उन्हें संगीत ही करना है। लेकिन अगर संगीत नहीं होता तो शायद वो वकील बनते। हालांकि उनका सफ़र देखकर लगता है कि संगीत उनके लिए कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था। बचपन का हारमोनियम, अलग-अलग शहरों की यात्राएं, लोक भाषाओं से मुलाक़ात और गांवों में सुने गीत इन सबने मिलकर उन्हें उसी रास्ते पर ला खड़ा किया, जहां आज Folk Music उनकी पहचान बन चुका है।
कचौड़ी गली के बाद अब क्या?
‘कचौड़ी गली’ के बाद फैंस के मन में अगला सवाल यही है कि अब नया क्या आने वाला है। उत्पल और ख्वाब मिलकर कई नए Folk Songs पर काम कर रहे हैं। नए projects पर काम चल रहा है और बहुत जल्द नए गाने लोगों के सामने आने वाले हैं। सहरसा से शुरू हुआ। ये सफ़र अब सिर्फ़ एक सिंगर की personal journey नहीं है। ये उन लोक आवाज़ों की सफ़र भी है जो गांवों, खेतों और आम लोगों की ज़िंदगी से निकलकर बड़े मंच तक पहुंच रही हैं। और शायद Utpal Udit (उत्पल उदित) के सफ़र की सबसे खूबसूरत बात यही है लोक संगीत को दुनिया तक ले जाना, लेकिन उसकी मिट्टी और उसकी आत्मा को वहीं रहने देना।
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