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अमेरिका छोड़ पंजाब के गांवों में मुफ़्त AI सिखा रहे Dr. Sandeep Sandha: बच्चों को बना रहे ‘Creators’

आज का दौर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का है। स्मार्टफोन से लेकर रोज़मर्रा के कामों तक, हर जगह AI का इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन इस पूरी दुनिया में ज़्यादातर लोग सिर्फ़ AI के Users बनकर रह गए हैं, जबकि इसके क्रिएटर्स बहुत कम हैं। पंजाब के फिरोज़पुर ज़िले के सरहदी गांव से आने वाले AI एक्सपर्ट Dr. Sandeep Sandha (डॉ. संदीप सिंह संधा) ने इस सोच को बदलने की पहल की है। वो अमेरिका की अच्छी-ख़ासी ज़िंदगी छोड़कर पंजाब के गांवों में स्कूली बच्चों को मुफ़्त AI के बारें में पढ़ा रहे हैं।

गांव से IIT और UCLA तक का सफ़र

Dr. Sandeep Sandha (डॉ. संदीप सिंह संधा) बताते हैं कि उन्होंने साल 2010 में IIT से कंप्यूटर साइंस में B.Tech की पढ़ाई शुरू की थी। उस वक़्त गांवों में कंप्यूटर बहुत कम देखने को मिलते थे और इसे लेकर मन में थोड़ा डर भी रहता था। लेकिन कुछ नया जानने की जिज्ञासा उन्हें इस तरफ़ ले गई।

B.Tech के बाद उन्होंने भारत में Oracle और IBM Research में काम किया। साल 2014 के आसपास, जब AI तेज़ी से आगे बढ़ रहा था, तब उन्होंने इस फील्ड को और गहराई से समझने का फ़ैसला किया। इसके लिए उन्होंने अमेरिका की मशहूर पब्लिक यूनिवर्सिटी UCLA से अपनी PhD पूरी की।

Source: Sadda Punja

अमेरिका छोड़ गांव लौटने का फैसला

Dr. Sandeep Sandha (डॉ. संदीप सिंह संधा) बताते हैं कि अमेरिका में अपने बेहतरीन रिसर्च काम की वजह से उन्हें ‘EB-1A’ कैटेगरी के तहत ग्रीन कार्ड मिला था। ये ग्रीन कार्ड आम तौर पर अपने फील्ड में ख़ास पहचान बनाने वाले लोगों को दिया जाता है। करीब 10 साल अमेरिका में रहने, बड़ी कंपनियों की टीमों की अगुवाई करने और बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम करने के बाद उन्होंने पंजाब लौटने का फैसला किया।

वो कहते हैं कि जब आपके पास अच्छा हुनर हो, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप दुनिया के किस हिस्से में बैठे हैं। इंटरनेट ने काम के लिए किसी एक जगह पर निर्भर रहने की ज़रूरत काफी कम कर दी है। आज भी वो अमेरिका की कंपनियों के लिए AI कंसल्टेंट के तौर पर काम करते हैं, लेकिन उनका ठिकाना अब उनका अपना गांव है।

मेहनत और दसवंध के तौर पर शिक्षा

Dr. Sandeep Sandha (डॉ. संदीप सिंह संधा) ने अपनी कमाई और सेवा के बारे में बताते हैं कि वो सोमवार से शुक्रवार तक अमेरिकी कंपनियों के लिए AI सिस्टम बनाने और रिसर्च का काम करते हैं। वो कहते हैं, “हमने अपनी मेहनत नहीं छोड़ी, लेकिन इस मेहनत से ऊपर उठकर अपना समय लोगों की भलाई के लिए दसवंध के तौर पर देते हैं।”

इसी वजह से उन्हें शिक्षा देकर पैसे कमाने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं होती। उनके मुताबिक, शिक्षा एक ऐसी अनमोल चीज़ है, जिसकी कीमत पैसे से तय नहीं की जा सकती। जब शिक्षा को बिना किसी लालच के लोगों तक पहुंचाया जाता है, तो उसका दायरा अपने आप बढ़ता जाता है।

आंगन से शुरू हुई मुफ़्त पढ़ाई

गांव लौटने के बाद डॉ. संदीप ने देखा कि सरहदी इलाकों के स्कूलों में टेक्नोलॉजी की पढ़ाई की काफी कमी है। शाम को अपना ऑफ़िस का काम ख़त्म करने के बाद उन्होंने गांव के 3-4 बच्चों को शौक के तौर पर पढ़ाना शुरू किया।

धीरे-धीरे बच्चों की गिनती इतनी बढ़ गई कि उनके घर का पूरा आंगन बच्चों से भरने लगा। दूर-दराज़ के गांवों से भी बच्चे आने लगे। इसमें काफी वक़्त लगने लगा, इसलिए उन्होंने इस पढ़ाई को ऑनलाइन शुरू कर दिया। आज 500 से ज़्यादा स्कूलों और पंजाब की बड़ी यूनिवर्सिटीज़ के हज़ारों स्टूडेंट्स ‘पंजाब AI एक्सीलेंस प्रोग्राम’ के ज़रिए इस मुहिम से जुड़े हुए हैं।

Source: Sadda Punjab

पंजाबी में मोबाइल से पढ़ाई

कैलिफ़ॉर्निया के 100 से ज़्यादा स्कूलों में AI प्रोग्राम चलाने का Dr. Sandeep Sandha (डॉ. संदीप सिंह संधा) का तजुर्बा पंजाब में काफी काम आया। यहां की हक़ीक़त ये थी कि 70% से ज़्यादा बच्चों के पास लैपटॉप या कंप्यूटर नहीं थे। साथ ही, अंग्रेज़ी भाषा भी उनके लिए एक बड़ी रुकावट थी। इसी को देखते हुए उन्होंने पूरा सिलेबस आसान पंजाबी भाषा में तैयार किया, ताकि बच्चे मोबाइल फोन के ज़रिए कोडिंग सीख सकें और AI मॉडल बना सकें। ये कोर्स सरकारी स्कूलों, SGPC और अकाल अकादमियों के बच्चों के लिए बिल्कुल मुफ़्त है। वहीं, ऐसे प्राइवेट स्कूलों के बच्चों को भी मुफ़्त पढ़ाया जाता है, जो इसकी फीस देने में सक्षम नहीं हैं।

गांवों की मुश्किलों का हल गांवों के बच्चे निकालेंगे

Dr. Sandeep Sandha (डॉ. संदीप सिंह संधा) बताते हैं कि अब आठवीं-नौवीं क्लास के बच्चे खुद AI ऐप्स बना रहे हैं। उन्होंने ऐसे मॉडल तैयार किए हैं, जो गाय-भैंस की पहचान करते हैं और फसलों में होने वाली बीमारियों का पता लगाते हैं। डॉ. संधा के मुताबिक, बड़ी कंपनियों को गांवों और किसानों की असली ज़रूरतों का उतना अंदाज़ा नहीं होता। जब किसानों के बच्चे टेक्नोलॉजी में माहिर होंगे, तो वो अपनी मुश्किलों का हल खुद तलाश सकेंगे। उनका कहना है, “हमारा मक़सद बच्चों को सिर्फ़ नौकरी ढूंढने वाला नहीं, बल्कि मुश्किलों का हल निकालने वाला लीडर बनाना है।”

डेटा प्राइवेसी और AI की गलतियां

यूज़र्स की प्राइवेसी के बारे में Dr. Sandeep Sandha (डॉ. संदीप सिंह संधा) बताते हैं कि जब हम मुफ़्त ऐप्स इस्तेमाल करते हैं, तो कई बार हमारा डेटा ही उस ऐप का असली प्रोडक्ट बन जाता है। कंपनियां हमारी उम्र, पसंद और आदतों के बारे में जानकारी जुटाकर हमारी सोच और पसंद पर असर डाल सकती हैं।

वो सावधान करते हैं कि AI कोई जादू नहीं है, बल्कि ये इंसानों के दिए डेटा से ही सीखता है। अगर डेटा गलत होगा, तो AI भी गलत नतीजे दे सकता है। उनका मानना है कि जब तक हमारे लोग AI को सिर्फ़ इस्तेमाल करने वाले नहीं, बल्कि AI बनाने वाले नहीं बनेंगे, तब तक वो अपनी भावनाओं और अधिकारों की पूरी तरह हिफाज़त नहीं कर पाएंगे।

भविष्य की चुनौतियां

AI की वजह से नौकरियां जाने के डर पर बात करते हुए Dr. Sandeep Sandha (डॉ. संदीप सिंह संधा) कहते हैं कि जिस तरह कभी बैलगाड़ियों की जगह ट्रकों और ट्रेनों ने ले ली थी, उसी तरह पुराने कामों में भी बदलाव आना तय है। आने वाले समय में एक ही शख़्स AI की मदद से कई अलग-अलग फील्ड की जानकारी रख सकेगा। उनका कहना है कि आगे चलकर दुनिया में किसी देश की ताकत इस बात से भी तय होगी कि वो AI की दौड़ में कहां खड़ा है।

भारत को सिर्फ़ AI इस्तेमाल करने वाला बाज़ार बनने के बजाय अपनी रिसर्च और टेक्नोलॉजी की बुनियाद मज़बूत करनी होगी। इसके साथ ही, जो भी AI सीखना चाहता है, वो YouTube पर ‘Punjab AI Excellence’ या ‘Dr. Sandeep Singh Sandha’ सर्च करके मुफ़्त में रिकॉर्ड किए गए लेक्चर देख सकता है। इसके अलावा, लाइव बैच में Google Meet के ज़रिए जुड़ने के लिए ऑनलाइन फॉर्म भरकर रजिस्ट्रेशन किया जा सकता है। Dr. Sandeep Sandha (डॉ. संदीप सिंह संधा) का ख़्वाब है कि पंजाब के नौजवान टेक्नोलॉजी की इस नई क्रांति में पीछे न रहें, बल्कि अपने गांव में बैठकर दुनिया के स्तर पर काम करने और आगे बढ़ने के काबिल बनें।

लेख: मनमीत कौर

इस लेख को पंजाबी में पढ़ें

ये भी पढ़ें: गरीब बच्चों को प्लास्टिक के बदले मुफ़्त शिक्षा दे रहा नीरजा फुटपाथ स्कूल

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