सिराज उद्दीन अली ख़ान- जिन्हें अदब की दुनिया “आरज़ू” के तख़ल्लुस से जानती है सिर्फ़ एक शाइर नहीं थे, बल्कि उर्दू-फ़ारसी के बहुत बड़े आलिम, ज़बानशनास (linguist), नक़्क़ाद (आलोचक), लुग़त-निगार (शब्दकोश लेखक) और तज़्किरा-निगार भी थे। उनकी अज़मत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मसनवी “सह्र-उल-बयान” के मशहूर लेखक मीर हसन ने अपने तज़्किरे में लिखा। अमीर ख़ुसरो के बाद हिंदुस्तान में आरज़ू जैसा साहब-ए-कमाल शख़्स पैदा ही नहीं हुआ। मुहम्मद हुसैन आज़ाद तो और आगे जाकर तमाम उर्दू वालों को गोया “ख़ान आरज़ू के ख़ानदान” का हिस्सा मानते हैं।
पैदाइश और शुरुआती ज़िंदगी
आरज़ू साहब की पैदाइश को लेकर मुख्तलिफ़ रिवायतें मिलती हैं कहीं इसे 1687 बताया जाता है और आगरा से जोड़ा जाता है, तो कुछ हवालों में यह ग्वालियार से भी जोड़ा गया है। उनके वालिद शेख़ हिसाम उद्दीन मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के दरबार से जुड़े एक फ़ौजी ऑफ़िसर थे, जो कई बड़े ओहदों पर रहे। बचपन से ही आरज़ू को फ़ारसी और अरबी में महारत हासिल हो गई थी, और आगे चलकर उन्होंने उर्दू और संस्कृत भी सीखी। शाइरी की शुरुआत महज़ 14 साल की उम्र में हो गई थी
जवानी में वो आगरा पहुंचे, जहां उन्हें इज़्ज़त और मुक़ाम मिला। कुछ अरसे बाद वो दिल्ली आ गए, जहां उन्होंने अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा गुज़ारा। यहीं आनंद राम मुख़्लिस के ज़रिए उनकी मुलाक़ात नवाब क़मर उद्दीन ख़ान से हुई, जो उस वक़्त के वज़ीर-ए-आज़म (प्राइम मिनिस्टर) थे और उन्होंने आरज़ू को एक मुनासिब ओहदा दिया। दिल्ली में रहते हुए आरज़ू ने बारह बादशाहों का उतार-चढ़ाव अपनी आंखों से देखा, और मुहम्मद शाह के दरबार में एक अहम मनसबदार के तौर पर काम किया। ज़िंदगी के आख़िरी बरसों में वो लखनऊ और फिर फ़ैज़ाबाद चले गए, जहां 1756 में उनका इंतक़ाल हुआ। बाद में उनकी मैयत दिल्ली लाई गई और वकीलपुरा इलाक़े में सुपुर्द-ए-ख़ाक की गई।
एक उस्ताद, जिसने कई उस्ताद बनाए
आरज़ू की सबसे बड़ी ख़ूबी यह थी कि उनकी सोहबत और तर्बियत (मार्गदर्शन) से कई बड़े-बड़े शाइर निकले। मज़हर जान-ए-जानां, मीर तक़ी मीर, मुहम्मद रफ़ी सौदा और मीर दर्द जैसे नाम उनकी शागिर्दी या संगत से फ़ैज़याब हुए।
दिलचस्प बात यह है कि मीर तक़ी मीर उनके सौतेले भांजे (भतीजे) थे। पिता के इंतक़ाल के बाद कुछ अरसा उन्होंने आरज़ू के पास ही गुज़ारा, और मीर के कलाम में आरज़ू की तालीम के असरात जगह-जगह नज़र आते हैं।
मिर्ज़ा रफ़ी सौदा का क़िस्सा भी बड़ा दिलचस्प है वो आरज़ू के बाक़ायदा शागिर्द नहीं थे, मगर उनकी सोहबत से बहुत फ़ायदा उठाया। पहले सौदा फ़ारसी में शेर कहा करते थे। एक दिन आरज़ू ने उनसे कहा- मिर्ज़ा, फ़ारसी अब तुम्हारी मादरी ज़बान नहीं रही, इसमें तुम कभी वो मुक़ाम हासिल नहीं कर पाओगे। तुम्हारा मिज़ाज उर्दू के लिए मौज़ूं है, अगर उर्दू में शाइरी करो तो अपने ज़माने में बेमिसाल बन जाओगे। यही मशवरा आगे चलकर सौदा को उर्दू के अज़ीम शाइरों में शुमार करा गया।
जब फ़ारसी के मुक़ाबले उर्दू को हल्का समझा जाता था
आरज़ू के दौर में फ़ारसी शाइरी के मुक़ाबले उर्दू को कमतर और मामूली समझा जाता था। आरज़ू ने ख़ुद बुनियादी तौर पर फ़ारसी में लिखा, और उनका कोई मुकम्मल उर्दू दीवान मौजूद नहीं है उनके उर्दू अशआर तज़्किरों में बिखरे हुए मिलते हैं, तादाद में सिर्फ़ पंद्रह-बीस के क़रीब। लेकिन उनकी असली ख़िदमत तादाद में नहीं, बल्कि उस असर में है जो उन्होंने अपने साथियों और शागिर्दों पर डाला। उन्होंने उर्दू को वो इज़्ज़त दिलाई, जिसके बग़ैर यह ज़बान महज़ एक “लश्करी बोली” ही रह जाती।
दरअसल, आरज़ू ही वो पहले शख़्स थे जिन्होंने दिल्ली में बोली जाने वाली खड़ी बोली को “उर्दू” नाम दिया। इससे पहले “उर्दू” का मतलब सिर्फ़ लश्कर (फ़ौजी छावनी) होता था, और शाहजहांआबाद को भी “उर्दू” कहा जाता था। आरज़ू ने पहली बार इस लफ़्ज़ को उस ख़ास ज़बान के लिए इस्तेमाल किया जो दिल्ली की गलियों में बोली जाती थी यानी आज जिसे हम उर्दू कहते हैं, उसका नाम ही आरज़ू की देन है।
अली हज़ीं से मशहूर मुबाहसा(विवाद)
अली हज़ीं ईरान से आकर दिल्ली में बस गए एक मग़रूर शाइर थे, जो हिंदुस्तानी शाइरों का मज़ाक़ उड़ाया करते थे। एक बार उन्होंने हिंदुस्तानियों के चहेते फ़ारसी शाइर “बेदिल” का मज़ाक़ बनाते हुए कहा कि अगर बेदिल के शेर इस्फ़हान (ईरान का एक शहर) में पढ़े जाएं तो कोई समझ ही नहीं पाएगा। यह सुनकर बाक़ी हिंदुस्तानी शाइर तो ख़ामोश रह गए, मगर आरज़ू ने डटकर बेदिल का दिफ़ाअ (बचाव) किया और हज़ीं की 400 अशआर की ग़लतियां गिना-गिनाकर उनकी बख़िया उधेड़ दी। नतीजा यह हुआ कि हज़ीं को शर्मिंदा होकर दिल्ली छोड़नी पड़ी।
ग़ालिब से भी जुड़ा एक दिलचस्प वाक़िया
आरज़ू ने मीर अब्दुल वासे हांसवी की मशहूर लुग़त “ग़राइब-उल-लुग़ात” की ख़ामोशी से इस्लाह (सुधार) करके उसे नया नाम दिया। “नवादिर-उल-अलफ़ाज़”। दिलचस्प बात यह है कि आगे चलकर मिर्ज़ा ग़ालिब ने भी उसी मीर अब्दुल वासे की एक ग़लती पकड़ी थी। मीर साहब ने “ना-मुराद” को ग़लत और “बे-मुराद” को सही बताया था। ग़ालिब ने अपने ख़त में बड़े तीखे अंदाज़ में इस ग़लती की ख़बर ली, यह समझाते हुए कि दोनों लफ़्ज़ों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है। यह वाक़िया इस बात की मिसाल है कि एक आलिम (आरज़ू) और एक शाइर (ग़ालिब) की सोच में कितना फ़र्क़ होता है।
ज़बान की तहक़ीक़ में एक बड़ा कारनामा
आरज़ू का एक और बहुत बड़ा कारनामा यह है कि उन्होंने अपनी फ़ारसी किताब “मुज़मिर” में यह बात कही कि संस्कृत और फ़ारसी दरअसल आपस में जुड़वां ज़बानें हैं यह दावा उन्होंने जर्मन भाषाशास्त्रियों (जिन्होंने बाद में इंडो-यूरोपियन ज़बान-ख़ानदान का नज़रिया पेश किया) से भी बहुत पहले किया था। इस लिहाज़ से आरज़ू को भाषाई तहक़ीक़ (linguistic research) के मैदान में एक अग्रणी (पायनियर) माना जाता है।
आरज़ू आज के मायनों में एक सच्चे वतन-परस्त भी थे। उनका कहना था कि जब ईरान के फ़ारसीदां अरबी और दूसरी ज़बानों के लफ़्ज़ फ़ारसी में शामिल कर सकते हैं, तो हिंदुस्तान के फ़ारसीदां हिंदी लफ़्ज़ों को फ़ारसी में शामिल क्यों नहीं कर सकते।
आरज़ू ने अपनी ज़िंदगी का ज़्यादातर हिस्सा लिखने-पढ़ने और पढ़ाने में गुज़ारा। उस दौर में उनका शुमार इतने बड़े उस्तादों में होता था कि कोई भी तालिब-ए-इल्म ख़ुद को उस वक़्त तक आलिम नहीं मानता था, जब तक वो आरज़ू के शागिर्दों की सफ़ में शामिल न हो जाए। उनके दोस्तों में बिंद्राबन ख़ुशगो, टेकचंद बहार और आनंद राम मुख़्लिस जैसे नाम अहम हैं।
आख़िर में – एक वास्तुकार की हैसियत
उर्दू के फ़रोग़ (विकास) में आरज़ू का दर्जा एक वास्तुकार (architect) जैसा है। फ़ारसी के दबदबे के सामने उर्दू शाइरी की शमा रौशन करना उनका सबसे बड़ा कारनामा माना जाता है। उन्हें यह पहले से अंदाज़ा था कि इस ज़बान में कितनी सलाहियत और मुस्तक़बिल छुपा है, और उनकी यह दूरअंदेशी बिल्कुल सही साबित हुई। जिस पौधे की बुनियाद उन्होंने दिल्ली में रखी थी, वह आगे चलकर एक बड़ा, फलदार दरख़्त बन गया, जिसका साया आज भी उर्दू अदब पर मौजूद है।
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