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हज़रत शाह नियाज़ अहमद बरेलवी: इश्क़, तसव्वुफ़ और रूहानी फ़िक्र के अज़ीम बुज़ुर्ग

हज़रत शाह नियाज़ अहमद बरेलवी भारतीय सूफ़ी परंपरा के उन बुज़ुर्गों में शुमार होते हैं, जिनकी ज़िंदगी इल्म, इबादत, इश्क़-ए-हक़ीक़ी और रूहानी तालीम का ख़ूबसूरत संगम थी। उन्होंने न सिर्फ़ अपनी रूहानी तालीम से लोगों की ज़िंदगियों को रोशन किया, बल्कि ख़ानक़ाह-ए-नियाज़िया की बुनियाद रखकर एक ऐसी रूहानी रवायत को आगे बढ़ाया, जिसका असर हिंदुस्तान से लेकर अफ़ग़ानिस्तान, समरकंद, शीराज़, बदख़्शां और अरब के कई इलाक़ों तक दिखाई दिया। 

शाह नियाज़ अहमद की पैदाइश 1155 हिजरी, मुताबिक़ 1742 ईस्वी में पंजाब के सरहिंद में हुई। उनका बचपन ऐसे घराने में गुज़रा, जहां इल्म और रूहानियत दोनों की गहरी रवायत मौजूद थी। उनके वालिद शाह मुहम्मद रहमतुल्लाह दिल्ली में क़ाज़ी-उल-क़ुज़्ज़ात यानी चीफ़ जस्टिस के ओहदे पर फ़ायज़ थे और उन्हें “हकीम-ए-इलाही” के ख़िताब से भी याद किया जाता था। उनकी वालिदा बीबी लाडो, जिन्हें हज़रत बीबी ग़रीब नवाज़ के नाम से भी जाना जाता था, ख़ुद एक साहिबा-ए-रूहानियत थीं।

कहा जाता है कि शाह नियाज़ अहमद की रूहानी तरबियत में उनकी वालिदा का ख़ास असर था। उन्हें क़ादिरी सिलसिले के बुज़ुर्ग हज़रत शाह मोहिउद्दीन दियासनामी से रूहानी फ़ैज़ हासिल था। इसी रूहानी माहौल ने बचपन से ही शाह नियाज़ अहमद के दिल में इल्म और तसव्वुफ़ की चाह पैदा कर दी।

दिल्ली में तालीम और रूहानी सफ़र

1748 ईस्वी के आसपास शाह नियाज़ अपने वालिदैन के साथ दिल्ली आए। यहां उन्होंने अपनी तालीम का सिलसिला आगे बढ़ाया और मदरसा फ़ख़रिया में क़ुरआन, हदीस, तफ़्सीर, फ़िक़्ह और उसूल की तालीम हासिल की।

कम उम्र में ही उनकी ज़ेहानत और इल्मी सलाहियत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि महज़ 15 से 17 साल की उम्र के बीच उन्होंने दीनी उलूम में ऐसी महारत हासिल कर ली थी कि बड़े-बड़े उलेमा भी उनकी क़ाबिलियत के कायल हो गए। उन्होंने मदरसे में बतौर उस्ताद ख़िदमत की और बाद में उसी इदारे की सरपरस्ती भी संभाली।

लेकिन शाह नियाज़ अहमद के लिए सिर्फ़ ज़ाहिरी इल्म ही काफ़ी नहीं था। वह उस इल्म की तलाश में थे जो इंसान को अपने रब की पहचान तक पहुंचाए। यही तलाश उन्हें हज़रत मौलाना फ़ख़रुद्दीन देहलवी चिश्ती, जिन्हें “फ़ख़्र-ए-जहां” भी कहा जाता है, की ख़ानक़ाह तक ले गई।

फ़ख़रुद्दीन देहलवी से उन्होंने न सिर्फ़ ज़ाहिरी बल्कि बातिनी इल्म भी हासिल किया। उन्होंने उनकी बैअत की और जल्द ही अपने मुर्शिद के ख़ास ख़ुलफ़ा में शुमार होने लगे। फ़ख़रुद्दीन देहलवी ने उन्हें रूहानी फ़ैज़ और हिदायत की ज़िम्मेदारी सौंपते हुए बरेली जाने की हिदायत दी।

बरेली और ख़ानक़ाह-ए-नियाज़िया की बुनियाद

मुर्शिद की हिदायत पर शाह नियाज़ अहमद बरेली पहुंचे। यहीं उन्होंने ख़ानक़ाह-ए-नियाज़िया की बुनियाद रखी। देखते ही देखते यह ख़ानक़ाह इल्म, तसव्वुफ़, ज़िक्र और रूहानी तालीम का एक अहम मरकज़ बन गई।

बरेली शाह नियाज़ अहमद की रूहानी ज़िंदगी का ऐसा मरकज़ बना जहां दूर-दूर से लोग फ़ैज़ हासिल करने आते थे। उनके मुरीद और ख़ुलफ़ा हिंदुस्तान के अलग-अलग इलाक़ों के अलावा अफ़ग़ानिस्तान, समरकंद, शीराज़, बदख़्शां और अरब के कई हिस्सों में मौजूद थे।

उनकी तालीम का बुनियादी पैग़ाम इंसान को अपने अंदर झांकने, नफ़्स की इस्लाह करने और इश्क़-ए-हक़ीक़ी की राह पर चलने का था।

कई सूफ़ी सिलसिलों से रूहानी निस्बत

शाह नियाज़ अहमद को कई सूफ़ी सिलसिलों से रूहानी फ़ैज़ हासिल हुआ। उन्हें क़ादिरी सिलसिले में हज़रत सैयद अब्दुल्लाह बग़दादी से बैअत का शर्फ़ मिला, जिनका सिलसिला हज़रत गौस-ए-आज़म शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी तक पहुंचता था।

रिवायत के मुताबिक़, हज़रत फ़ख़्र-ए-जहां ने एक ख़्वाब में हज़रत गौस-ए-पाक की ज़ियारत की। इस ख़्वाब के बाद उन्हें इशारा मिला कि एक बुज़ुर्ग दिल्ली आएंगे जो शाह नियाज़ अहमद को क़ादिरी सिलसिले में दाख़िल करेंगे। कुछ दिनों बाद हज़रत सैयद अब्दुल्लाह बग़दादी दिल्ली पहुंचे और जामा मस्जिद में शाह नियाज़ अहमद को अपनी रूहानी निस्बत से मुशर्रफ़ किया गया।

इसके अलावा शाह नियाज़ अहमद को चिश्ती-निज़ामी, सुहरवर्दी, चिश्ती-साबरी और नक़्शबंदी सिलसिलों से भी रूहानी फ़ैज़ मिलने का ज़िक्र मिलता है। इस तरह उनकी रूहानी शख़्सियत में मुख़्तलिफ़ सूफ़ी रवायतों की ख़ूबसूरत आमेज़िश दिखाई देती है।

शायरी में इश्क़ और तौहीद का रंग

शाह नियाज़ अहमद सिर्फ़ सूफ़ी बुज़ुर्ग ही नहीं, बल्कि एक साहिब-ए-दिल शायर भी थे। उनकी शायरी में इश्क़, तौहीद, फ़ना, बक़ा और हक़ की तलाश के रंग गहरे दिखाई देते हैं।

“यार को हमने जा-ब-जा देखा
कहीं ज़ाहिर, कहीं छुपा देखा”

इस शेर में सूफ़ी फ़िक्र का वह गहरा एहसास मिलता है, जिसमें आशिक़ को हर जगह अपने महबूब-ए-हक़ीक़ी की जल्वानुमाई महसूस होती है।

“कहीं मुमकिन हुआ, कहीं वाजिब
कहीं फ़ानी, कहीं बक़ा देखा”

यानी इस कायनात के हर रंग में उसी एक हक़ीक़त का जलवा दिखाई देता है। कहीं वह मुमकिन की सूरत में है, कहीं वाजिब की हैसियत से, कहीं फ़ना का मंज़र है तो कहीं बक़ा का राज़।

“इश्क़ में तेरे कोह-ए-ग़म सर पे लिया, जो हो सो हो
ऐश-ओ-निशात-ए-ज़िंदगी छोड़ दिया, जो हो सो हो।”

यहां आशिक़ अपने महबूब की राह में हर तकलीफ़ को ख़ुशी से क़ुबूल करता है। दुनिया की आराम-ओ-आसाइश पीछे छूट जाती है और इश्क़ की मंज़िल ही उसकी पूरी कायनात बन जाती है।

दीवान-ए-नियाज़ और अदबी विरासत

शाह नियाज़ अहमद की अदबी और रूहानी विरासत भी उनकी शख़्सियत का अहम हिस्सा है। प्रोफ़ेसर ख़ालिक़ अहमद निज़ामी ने अपनी किताब “तारीख़-ए-मशाइख़-ए-चिश्त” में उनसे मंसूब उर्दू, फ़ारसी और अरबी की कई तसानीफ़ का ज़िक्र किया है।

इनमें “दीवान-ए-नियाज़” को ख़ास अहमियत हासिल है। उनके कलाम में सूफ़ी फ़िक्र, इश्क़-ए-इलाही, तौहीद और फ़ना-ओ-बक़ा जैसे विषय बार-बार सामने आते हैं।

उनकी शायरी की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि वह मुश्किल सूफ़ियाना फ़लसफ़े को भी इश्क़ की ज़बान में बयान करती है। उनके यहां महबूब कभी यार है, कभी हक़ीक़त और कभी वह नूर है जो हर ज़र्रे में दिखाई देता है।

एक रूहानी विरासत

शाह नियाज़ अहमद बरेलवी की ज़िंदगी इस बात की मिसाल है कि ज़ाहिरी इल्म और बातिनी इल्म जब एक साथ चलते हैं तो इंसान की शख़्सियत में एक अलग ही नूर पैदा होता है।

उन्होंने इल्म हासिल किया, उसे आगे बढ़ाया, मुर्शिद की ख़िदमत की, रूहानी सिलसिलों से फ़ैज़ पाया और फिर बरेली में एक ऐसी ख़ानक़ाह कायम की जो सदियों बाद भी उनकी रूहानी विरासत की याद दिलाती है।

77 साल की उम्र में उनका इंतिक़ाल बरेली में हुआ, लेकिन उनकी तालीमात, उनकी शायरी और ख़ानक़ाह-ए-नियाज़िया की रवायत आज भी उनके नाम को ज़िंदा रखे हुए है।

शाह नियाज़ अहमद का पैग़ाम दरअसल इश्क़, इंसानियत और अपने रब की पहचान का पैग़ाम है। उनके कलाम में यही एहसास बार-बार उभरता है कि जब दिल इश्क़ से भर जाए तो दुनिया की हर शै उसी एक हक़ीक़त का आईना नज़र आने लगती है।

ये भी पढ़ें: नवाज़ देवबंदी: मोहब्बत, जज़्बात और इंसानियत के शायर

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