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ज़ियाउद्दीन अहमद: दक्कन के इतिहास और अदब का रौशन नाम

मोहम्मद ज़ियाउद्दीन अहमद शाकेब, जिन्हें एम.जे.ए. शाकेब के नाम से जाना जाता है, दक्कन के मशहूर मुअर्रिख़ (इतिहासकार), कला के जानकार, सूफ़ियाना मिज़ाज के दानिशवर और उर्दू-फ़ारसी अदब के नक़्क़ाद (आलोचक) थे। उनकी पैदाइश 21 अक्टूबर 1933 को हुई और इंतिक़ाल 20 जनवरी 2021 को। उनका बचपन और जवानी हैदराबाद और औरंगाबाद में गुज़री, जहां की मिली-जुली तहज़ीब ने उनकी सोच को गहराई दी।

तालीम और शुरुआती ख़िदमात

शाकेब ने उस्मानिया यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में बी.ए. किया और 1956 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से एम.ए. की डिग्री ली। 1976 में डेक्कन कॉलेज से उन्होंने गोलकोंडा और ईरान के आपसी रिश्तों पर पी.एच.डी. हासिल की। यह विषय दक्कन की सल्तनतों और फ़ारसी तहज़ीब के गहरे ताल्लुक़ को समझने की कोशिश थी।

वसंत कुमार बावा के साथ मिलकर उन्होंने हैदराबाद शहरी विकास प्राधिकरण की बुनियाद रखी, जो आज हैदराबाद महानगर विकास प्राधिकरण कहलाता है। 1962 में वे आंध्र प्रदेश राज्य अभिलेखागार के प्रमुख बने और वहीं मुग़ल अभिलेख कक्ष क़ायम किया। 1977 में छपी उनकी किताब “मुग़ल अभिलेखागार, खंड 1” में शाहजहां के दौर के दस्तावेज़ों की तफ़्सीली फ़ेहरिस्त है। इंडो-फ़ारसी में सरकारी काग़ज़ात पढ़ना सीखने वालों के लिए यह आज भी अहम मानी जाती है।

लंदन का सफ़र

1980 से 1987 तक शाकेब ने लंदन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ ओरिएंटल एंड अफ़्रीकन स्टडीज़ (SOAS) में भारतीय इतिहास और भारत-इस्लामी कला व संस्कृति पढ़ाई। इसके बाद क्रिस्टीज़ के इस्लामिक और इंडियन आर्ट विभाग में तक़रीबन 30 साल तक फ़ारसी और अरबी पांडुलिपियों के माहिर सलाहकार रहे। पांडुलिपियां यानी हाथ से लिखी हुई पुरानी किताबें और दस्तावेज़, जो बीते ज़माने की सबसे सच्ची गवाही होते हैं। उन्होंने ब्रिटिश लाइब्रेरी में भी ऐसे कई नुस्ख़ों की फ़ेहरिस्त तैयार की, जैसे 1990 में मुग़ल दस्तावेज़ों का “बटाला संग्रह” (1527-1757)। वे 1998 तक मिडलसेक्स यूनिवर्सिटी में उर्दू शिक्षकों की तरबियत के निदेशक भी रहे। इन बरसों में उन्होंने कई शोधार्थियों को मुग़ल इतिहास, दक्कन अध्ययन और उर्दू-फ़ारसी अदब में रहनुमाई दी।

मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी में हारून ख़ान शेरवानी दक्कन अध्ययन केंद्र की स्थापना में उनका अहम किरदार रहा और वे उसके पहले सलाहकार बोर्ड के सदस्य थे। उन्हें दक्कन अध्ययन की बुनियाद रखने वालों में गिना जाता है। शायरों पर भी उनकी गहरी नज़र थी। उन्होंने बेदिल, अमीर ख़ुसरो, इक़बाल, ग़ालिब और रूमी पर किताबें लिखीं और कई अदबी सम्मेलनों में तक़रीरें कीं।

शायरी की झलक

दीवाना-ए-जुस्तुजू हो गया चांद
बादल से गिर के खो गया चांद

चांद तलाश के जुनून में बादल से फिसलकर कहीं खो गया, जैसे कोई आशिक़ अपनी धुन में खो जाए। 

 मुख़्तसर बात-चीत अच्छी है
लेकिन इतना भी इख़्तिसार न कर

यानी कम बोलना अच्छा है, मगर इतना भी कम नहीं कि सामने वाला तरसता रह जाए। एक और शेर में शिकायत भरी मुहब्बत है।

पड़ती नहीं है दिल पे तिरे हुस्न की किरन
किस सम्त मेरे चांद दरख़्शां है आज-कल

शायर पूछता है कि ऐ मेरे चांद, तेरे हुस्न की रौशनी मेरे दिल तक नहीं पहुंच रही, आजकल तू किस तरफ़ चमक रहा है? 

आरिज़ से तिरे सुब्ह की तोहमत न उठेगी
ज़ुल्फ़ों पे तिरी शाम का इल्ज़ाम रहेगा

तेरे रुख़सार सुब्ह की तरह रौशन हैं और तेरी ज़ुल्फ़ें शाम की तरह स्याह, इसलिए सुब्ह और शाम की तोहमत तुझ पर ही रहेगी। यह ख़ूबसूरती की तारीफ़ का बहुत नाज़ुक अंदाज़ है।

शाकेब 87 साल की उम्र में लंदन में इस दुनिया से रुख़्सत हुए। उनके पीछे बीवी फ़रहत अहमद, दो बेटियां, एक बेटा और नौ पोते-पोतियां हैं। उन्हें 2016-17 में रामपुर रज़ा लाइब्रेरी का नवाब फ़ैज़ुल्लाह ख़ान इनाम मिला और 1983 में वे रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के फ़ेलो बने। उनकी ज़िंदगी बताती है कि इतिहास की खोज और शायरी का जज़्बा एक ही इंसान में साथ-साथ जी सकते हैं।

ये भी पढ़ें: सत्यपाल आनंद: चार ज़बानों में अपनी रूह की आवाज़ लिखने वाला शख़्स  

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