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जूनियर चैंपियन से Asian Games तक: हैमर थ्रोअर Damneet Singh का सफ़र

कुछ बच्चे खेलों के माहौल में बड़े होते हैं, लेकिन Damneet Singh (दमनीत सिंह) की परवरिश जैसे खेलों के बीच ही हुई। जब वो मुश्किल से तीन-चार साल के थे, तब उनके पिता बलदेव सिंह उन्हें NIS पटियाला लेकर जाते थे। बलदेव खुद नेशनल लेवल के पोल वॉल्टर थे और उन्हें अपनी ट्रेनिंग करनी होती थी। वहीं Damneet Singh (दमनीत सिंह) का ज़्यादातर वक़्त एथलेटिक्स कॉम्प्लेक्स में गुज़रता।

वो बड़े खिलाड़ियों को ट्रेनिंग करते देखते, ट्रैक पर दौड़ते खिलाड़ियों के जूतों की आवाज़ सुनते और खेलों के माहौल को महसूस करते हुए बड़े होते गए। उस उम्र में उन्हें शायद ये अंदाज़ा भी नहीं था कि एक दिन खेल ही उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बन जाएगा। सालों बाद, बरनाला का वही बच्चा अब कुछ ही दिनों में जापान में होने वाले एशियन गेम्स में भारतीय जर्सी पहनकर मैदान में उतरेगा। लेकिन उनकी कहानी में एक दिलचस्प मोड़ भी है।

हैमर थ्रो उनका पहला करियर ऑप्शन नहीं था। बचपन में Damneet Singh (दमनीत सिंह) स्प्रिंटर थे। उन्हें फुटबॉल खेलना भी बहुत पसंद था। लेकिन 2012-13 के आसपास उनके पिता और बचपन के कोच सुखराज सिंह को लगा कि Damneet Singh (दमनीत सिंह) का मज़बूत शरीर थ्रो वाले खेल के लिए ज़्यादा बेहतर है। आख़िरकार, यही फैसला उनकी ज़िंदगी बदलने वाला साबित हुआ। Damneet Singh (दमनीत सिंह) ने एक बार मज़ाक में कहा था, “मुझे हैमर थ्रो इसलिए पसंद आने लगा, क्योंकि इसमें स्प्रिंट की तरह बार-बार दौड़ना नहीं पड़ता!” लेकिन हैमर थ्रो चुनना उनके लिए बेहद अहम साबित हुआ।

अब कई सालों की मेहनत और इंतज़ार के बाद Damneet Singh (दमनीत सिंह) पुरुषों के हैमर थ्रो में एशियन गेम्स में भारत का रिप्रेज़ेंट करने के लिए तैयार हैं। ये इस इवेंट के लिए भी एक अहम वापसी है। भारत की तरफ़ से आख़िरी बार पुरुष हैमर थ्रोअर चंद्रोदय नारायण सिंह ने 2014 के इंचियोन एशियन गेम्स में हिस्सा लिया था। इसलिए Damneet Singh (दमनीत सिंह) के लिए नागोया सिर्फ़ एक और मुकाबला नहीं है। ये उस सफ़र का एक बड़ा पड़ाव है, जो उस वक़्त शुरू हुआ था जब वो एक छोटे से बच्चे के तौर पर ट्रेनिंग ग्राउंड के किनारे बैठकर खिलाड़ियों को देखा करते थे।

पंजाबी एथलीट, जिसे अपना इवेंट मिला

Damneet Singh (दमनीत सिंह) एक ऐसे परिवार से आते हैं, जहां एथलेटिक्स हमेशा से ज़िंदगी का हिस्सा रहा है। उनके पिता बलदेव सिंह नेशनल लेवल के पोल वॉल्टर रहे हैं, जबकि उनके बड़े भाई गुरमीत डेकाथलॉन में हिस्सा ले चुके हैं। यानी घर में खेलों की बातें होना आम बात थी। लेकिन Damneet Singh (दमनीत सिंह) की परवरिश का एक और पहलू भी था। उनकी मां स्कूल टीचर थी और उनका मानना था कि खेलों की वजह से पढ़ाई को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। Damneet Singh (दमनीत सिंह) ने भी पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन किया और 10वीं की बोर्ड परीक्षा में 9 CGPA हासिल किया। वहीं मैदान पर उनकी कद-काठी और ताक़त धीरे-धीरे साफ़ दिखाई देने लगी थी।

NIS पटियाला से थ्रो इवेंट्स में PhD कर चुके कोच सुखराज सिंह और उनके पिता बलदेव ने उन्हें धीरे-धीरे हैमर थ्रो की तरफ़ लाना शुरू किया। उस वक़्त दमनीत की उम्र करीब 10 साल ही थी। इस फैसले का पहला बड़ा नतीजा 2014 Junior Nationals में देखने को मिला, जहां दमनीत ने मेडल जीता। यहीं से उन्हें लगा कि हैमर थ्रो सिर्फ़ एक और खेल नहीं, बल्कि उनका अपना इवेंट बन सकता है।

इसके तीन साल बाद उन्होंने इंटरनेशनल लेवल पर अपनी पहचान बना ली। 2017 में नैरोबी में हुए IAAF World U18 Athletics Championships में दमनीत ने 5 किलो के यूथ हैमर से 74.20 मीटर का थ्रो किया और सिल्वर मेडल जीता। ये एक ऐतिहासिक कामयाबी थी। Damneet Singh (दमनीत सिंह) हैमर थ्रो में किसी ग्लोबल प्रतियोगिता में मेडल जीतने वाले पहले भारतीय बने। इसके बाद 2018 Asian Junior Athletics Championships में गिफू में उन्होंने एक और सिल्वर मेडल अपने नाम किया। लेकिन इसके बाद उनके सफ़र का सबसे मुश्किल दौर शुरू हुआ।

Pic Credit: Social Media

सात साल का इंतज़ार

जूनियर लेवल से सीनियर हैमर थ्रो तक का सफ़र इतना आसान नहीं होता। सीनियर पुरुषों का हैमर 7.26 किलो का होता है, जबकि जूनियर लेवल पर 5 किलो का हैमर इस्तेमाल होता है। यानी सीनियर हैमर 2.26 किलो ज़्यादा भारी होता है। दमनीत के लिए इस बदलाव के साथ तालमेल बैठाना एक लंबा सफ़र साबित हुआ। करीब सात साल तक उनकी कामयाबी का सिलसिला उसी तरह आगे नहीं बढ़ सका, जैसा लोग एक उभरते हुए खिलाड़ी से उम्मीद करते हैं। एक ऐसा खिलाड़ी, जिसने कम उम्र में इंटरनेशनल मेडल जीत लिया था, अब सीनियर लेवल पर अपनी बड़ी कामयाबी का इंतज़ार कर रहा था।

इस दौरान चोटें आई, प्रदर्शन में ठहराव आया और सबसे बड़ी बात, दमनीत को उस कामयाबी का इंतज़ार करना पड़ा, जिसकी उम्मीद उनसे कई साल पहले ही की जाने लगी थी।
इस दौर के बारे में दमनीत ने अपनी भावनाओं को कुछ यूं बयां किया था “करीब सात साल के इंतज़ार, चोटों और उन ख़ामोश सुबहों के बाद, जिन्हें किसी ने नहीं देखा, दोबारा भारत को रिप्रेज़ेंट करने का मौक़ा मिला तो मैं अपने आंसू नहीं रोक सका।” आख़िरकार 2025 और 2026 में उनके इंतज़ार का दौर बदलना शुरू हुआ।

दमनीत सिंह — आंकड़ों में सफ़र

Damneet Singh (दमनीत सिंह) के सफ़र को उनके आंकड़ों से भी समझा जा सकता है। 2017 World U18 Championships में उन्होंने 74.20 मीटर का थ्रो कर सिल्वर मेडल जीता। 2018 में Asian Junior Championships में उनका थ्रो 74.08 मीटर रहा और उन्होंने एक बार फिर सिल्वर अपने नाम किया। इसके बाद 2025 में Indian Open Athletics Meet में उन्होंने 69.87 मीटर, जबकि National Inter-State Championships में 69.25 मीटर का थ्रो किया। साल 2026 में उन्होंने Indian Open Throws Competition में 70.64 मीटर का अपना अहम प्रदर्शन दिया। इसके बाद National Inter-State Championships में 69.72 मीटर का थ्रो कर गोल्ड मेडल जीता और इसी प्रदर्शन के साथ Asian Games के लिए क्वालिफाई किया।

लेकिन इन सभी आंकड़ों में सबसे खास नंबर था 70.64 मीटर। मार्च 2026 में पटियाला में हुए Indian Open Throws Competition में दमनीत ने पहली बार 70 मीटर का आंकड़ा पार किया। ये उनके लिए एक बड़ा मुकाम था और इसने दिखाया कि सीनियर हैमर के साथ लंबे वक़्त तक की गई मेहनत अब रंग लाने लगी है। इसके दो महीने बाद संगरूर में उन्होंने 68.37 मीटर का थ्रो कर गोल्ड जीता।

फिर रांची में Federation Cup में 67.62 मीटर का थ्रो कर सिल्वर मेडल अपने नाम किया। इसके बाद जून में चेन्नई में हुए National Inter-State Championships में दमनीत ने 69.72 मीटर का थ्रो किया। उन्होंने गोल्ड जीता और इसी प्रदर्शन के साथ Asian Games के लिए क्वालिफाई किया। अब उनके आंकड़े एक नई कहानी बता रहे थे—सात साल के इंतज़ार के बाद दमनीत एक बार फिर बड़े मंच की तरफ़ बढ़ रहे थे।

स्टीव लेम्के के साथ नया अध्याय

इन आंकड़ों के पीछे एक और बड़ा बदलाव था। 2024 में दमनीत सिंह Reliance Foundation Sports Programme से जुड़े। यही उनकी मुलाक़ात अमेरिकी कोच स्टीव लेम्के से हुई। उनके साथ काम करने के बाद दमनीत ने हैमर थ्रो की एक बिल्कुल अलग टेक्नीक पर काम शुरू किया। ये बदलाव रातों-रात नहीं आया। दमनीत को नई टेक्नीक के साथ तालमेल बैठाने में करीब डेढ़ साल लगे। दमनीत ने बताया, “उनकी टेक्नीक उस टेक्नीक से बिल्कुल अलग थी, जिसका मैं पहले इस्तेमाल करता था। इसे अपनाने में मुझे करीब डेढ़ साल लग गया।”

इस बदलाव में उनके सेटअप और हैमर को थ्रो के दौरान घुमाने के तरीके में भी फर्क आया। Damneet Singh (दमनीत सिंह) के मुताबिक, “नई टेक्नीक से मुझे हैमर को ज़्यादा आज़ादी से स्विंग करने में मदद मिलती है और मैं उसे ज़्यादा गहरी ग्रिप के साथ पकड़ पाता हूं।” हैमर थ्रो ऐसा इवेंट है, जहां फ़ासला कुछ सेंटीमीटर से भी बदल सकता है। इसलिए टेक्नीक में छोटा सा बदलाव भी नतीजे पर बड़ा असर डाल सकता है। दमनीत मानते हैं कि उनके लिए ये बदलाव बेहद ज़रूरी था।

उन्होंने कहा, “मैं 2024 में Reliance से जुड़ा और कोच स्टीव लेम्के से मिलने के बाद मैं बिल्कुल अलग लेवल पर पहुंचा। जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं कि मैंने कहां से शुरुआत की थी, तो लगता है कि अगर मैंने अपना सेटअप और टेक्नीक नहीं बदली होती, तो आज मैं इस मुकाम पर नहीं होता।” शायद यही उनके सफ़र का सबसे बड़ा सबक है। एशियन गेम्स के लिए क्वालिफाई करने वाले Damneet Singh (दमनीत सिंह) वही खिलाड़ी नहीं हैं, जिन्होंने नौ साल पहले वर्ल्ड जूनियर मेडल जीता था। सीनियर लेवल पर अपनी जगह बनाने के लिए उन्हें खुद को नए सिरे से तैयार करना पड़ा।

पंजाब की मिट्टी से जुड़ा रिश्ता

एलीट एथलेटिक्स में टेक्नीक और ट्रेनिंग कितनी भी हाई लेवल की क्यों न हो, दमनीत का पंजाब से रिश्ता आज भी उतना ही सीधा है। उनके पिता ने उन्हें एथलेटिक्स से मिलवाया। जब उनका सफ़र आसान नहीं था और कामयाबी मिलने में वक़्त लगा, तब भी उनका परिवार उनके साथ खड़ा रहा। उनकी पसंद का खाना भी किसी बड़े एथलीट की बहुत सोच-समझकर बनाई गई डाइट से ज़्यादा एक आम पंजाबी घर की रसोई जैसा लगता है। तंदूरी चिकन, भैंस का दूध और सरसों का साग। उन्हें बहुत ज़्यादा फैंसी डाइट में दिलचस्पी नहीं है।

शायद इससे भी ज़्यादा अहम बात ये है कि उनकी पहचान एक एथलीट के तौर पर और पंजाब से उनके रिश्ते के बीच कोई फ़ासला नहीं है। भारतीय टीम में जगह मिलने के बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “एक छोटे से गांव से निकलकर इंटरनेशनल स्टेज पर भारतीय जर्सी पहनने तक—ये उन सभी सपने देखने वालों के लिए है, जो घर पर मेरा इंतज़ार कर रहे हैं।” यही एहसास बताता है कि Asian Games के लिए क्वालिफाई करना उनके लिए सिर्फ़ टीम की लिस्ट में नाम आने की बात नहीं है। कई सालों तक ये ख़्वाब उन ट्रेनिंग सेशंस में ज़िंदा रहा, जिन्हें बहुत कम लोगों ने देखा। अब भारतीय जर्सी उस ख़्वाब को सबके सामने लाएगी।

अब नागोया की बारी

Asian Games में Damneet Singh (दमनीत सिंह) का सामना एशिया के कुछ मज़बूत हैमर थ्रोअर्स से होगा। चीन के वांग क़ी ने 2023 Asian Games में गोल्ड जीता था और 2024 में उनका बेस्ट थ्रो 75.40 मीटर रहा। जापान के शोता फुकुदा 74.57 मीटर तक पहुंच चुके हैं, जबकि उज़्बेकिस्तान के सुखरोब खोडयायेव का अब तक का सबसे लंबा थ्रो 78.22 मीटर है। दमनीत का बेस्ट 70.64 मीटर है। ये आंकड़े मुकाबले की तस्वीर ज़रूर बताते हैं, लेकिन सर्कल के अंदर क्या होगा, ये सिर्फ़ आंकड़े तय नहीं करते।

दमनीत पहले ही सीख चुके हैं कि हैमर थ्रो में कामयाबी का सफ़र हमेशा एक जैसा सीधा नहीं होता। उनके सफ़र में वर्ल्ड जूनियर मेडल रहा, सीनियर लेवल पर लंबा इंतज़ार रहा, चोटें आई, टेक्नीक बदली और फिर इंटरनेशनल स्टेज पर वापसी हुई। अब उनका मक़सद बहुत सीधा है। “मेरी सबसे बड़ी उम्मीद है कि मैं भारत के लिए घर एक मेडल लेकर लौटूं।” जिस बच्चे ने कभी अपने पिता के साथ NIS पटियाला जाना शुरू किया था, उसे उस वक़्त ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि वो सुबहें उसे कहां तक ले जाएंगी।

जिस उन्होंने मज़ाक में कहा था कि उसे हैमर थ्रो इसलिए पसंद है क्योंकि इसमें स्प्रिंटर की तरह दौड़ना नहीं पड़ता, उसे ये नहीं पता था कि सर्कल के बाहर अपने ख़्वाब के लिए कितना दौड़ना, कितना खुद को बदलना और कितना इंतज़ार करना पड़ेगा। और 2017 में वर्ल्ड जूनियर सिल्वर जीतने वाले उस नौजवान को सीनियर Asian Games में अपना मौक़ा पाने के लिए करीब एक दशक इंतज़ार करना पड़ा। अब वो इंतज़ार ख़त्म हो चुका है।

हैमर थ्रो में असली मुकाबला कुछ ही सेकंड में पूरा हो जाता है। हैमर तेज़ी पकड़ता है, एथलीट घूमता है, हैमर छोड़ता है और फिर सबकी नज़र उस नंबर पर टिक जाती है। Damneet Singh (दमनीत सिंह) के लिए ये इंतज़ार सात साल लंबा रहा है। और Asian Games में किसी भारतीय पुरुष हैमर थ्रोअर को भारत का रिप्रेज़ेंट करते हुए देखने के लिए 12 साल का इंतज़ार करना पड़ा है।

नागोया में स्कोरबोर्ड पर आने वाला नंबर उनकी कहानी का अगला हिस्सा लिखेगा। लेकिन कहानी का एक बड़ा हिस्सा पहले ही लिखा जा चुका है—बरनाला में, NIS पटियाला में, अनगिनत ट्रेनिंग सेशंस में, चोटों के बीच, टेक्नीक में बदलाव के दौरान और उन “ख़ामोश सुबहों” में, जिन्हें किसी ने नहीं देखा। अब वही बच्चा, जिसे दौड़ना पसंद नहीं था, अपनी मेहनत को रंग देने, पंजाब का नाम रोशन करने और भारत के लिए अपना नाम बनाने के लिए तैयार है। Aichi-Nagoya 2026 Asian Games में Men’s Hammer Throw Final शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 को होना तय है।

लेख: गौरव एस. करीर

इस लेख को अंग्रेज़ी और पंजाबी में पढ़ें

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