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शाह मोहसिन दानापुरी: सूफ़ियाना फ़िक्र और रूहानी शायरी की रोशन शख़्सियत

शाह मोहसिन दानापुरी की पैदाइश 9 मई 1881 को पटना ज़िले के गोलखपुर में हुयी। आपके वालिद हज़रत शाह अकबर दानापुरी अपने दौर के मशहूर आलिम, सूफ़ी बुज़ुर्ग और शायर थे। आपका ख़ानदान इल्म, तसव्वुफ़ और दीन की ख़िदमत के लिए पूरे हिंदुस्तान में जाना जाता था।

बचपन से ही आपका माहौल दीन और इल्म से भरा हुआ था। आपने 5 साल की उम्र में तालीम शुरू की और आगे चलकर मदरसा इह्या-उल-उलूम, इलाहाबाद से दर्स-ए-निज़ामी की तालीम हासिल की। वालिद की सोहबत और ख़ानक़ाही माहौल ने आपकी शख़्सियत को और निखार दिया।

क़ैस रुख़्सत हुआ दुनिया से तो फ़रहाद आया
एक नाशाद गया दूसरा नाशाद आया

शाह मोहसिन दानापुरी ने अपने वालिद से सिलसिला-ए-नक़्शबंदिया में बैअत की और कम उम्र में ही इजाज़त – ख़िलाफ़त से भी नवाज़े गए। साल 1909 में आप ख़ानक़ाह-ए-सज्जादिया अबुलउलाइया, दानापुर के दूसरे सज्जादा-नशीन बने और करीब 37 साल तक दीन, तसव्वुफ़ और इंसानियत की ख़िदमत करते रहे।

वो बख़्शे या न बख़्शे उसे इख़्तियार है
अपना जो काम है वो किए जा रहा हूं मैं

आप सिर्फ़ एक सूफ़ी बुज़ुर्ग ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन शायर भी थे। आपकी शायरी में इश्क़-ए-हक़ीक़ी, तसव्वुफ़, इंसानियत और रूहानियत की झलक साफ़ दिखाई देती है। आपने कई बड़े मुशायरों की सदारत की और हिंदुस्तान के मशहूर शायरों के साथ अदबी महफ़िलों में हिस्सा लिया। आपकी महफ़िलों में अहसन मारहरवी, साएल देहलवी, नूह नारवी और डॉक्टर मुबारक अज़ीमाबादी जैसे नामवर शायर शामिल होते थे।

आईना सामने रख कर ये तमाशा देखा
अपनी सूरत में तिरे हुस्न का जल्वा देखा

साल 1927 में आपने “इख़्वानुस्सफ़ा” की बुनियाद रखी, जिसके ज़रिए अदब और शायरी को नई पहचान मिली। आपकी शायरी पर अल्लामा इक़बाल का असर भी नज़र आता है और आपने उनकी ग़ज़लों पर मुखम्मस भी लिखे।

आपने तसव्वुफ़ के साथ-साथ समाजी और मिल्ली ख़िदमत में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। देश की एकता, अमन और लोगों की बेहतरी के लिए हमेशा आवाज़ उठाई। आपने हिंदुस्तान के कई हिस्सों के अलावा अरब का भी सफ़र किया और आपके मुरीद बिहार से लेकर कराची, लाहौर, ढाका और कश्मीर तक फैले हुए थे।

आपकी मशहूर किताबों में “फ़ुग़ान-ए-दरवेश”, “बुर्हानुल-आशिक़ीन” और “कुल्लियात-ए-मोहसिन” शामिल हैं, जो आज भी सूफ़ियाना अदब की अहम धरोहर मानी जाती हैं।

मरने की थी सबील, जिए जा रहा हूं मैं
साक़ी पिला रहा है, पिए जा रहा हूं मैं।

9 जनवरी 1945 को आपका विसाल हुआ। आपका मज़ार आस्ताना-ए-मख़दूम सज्जाद शाह टोली, दानापुर (पटना) में है, जहां आज भी अकीदतमंद हाज़िरी देते हैं।

हज़रत शाह मोहसिन दानापुरी ने अपनी इल्मी, रूहानी और अदबी ख़िदमत से ऐसा विरसा छोड़ा, जो आज भी सूफ़ी अदब और उर्दू शायरी की दुनिया में पूरी इज़्ज़त और एहतराम के साथ याद किया जाता है।

ये भी पढ़ें:अमीर हसन सिज्ज़ी: हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के अज़ीज़ मुरीद और सूफ़ी शायर 

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