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खादी-कुचाई सिल्क : Global Stage पर छा रही है झारखंड की शान

झारखंड (Jharkhand) के गोड्डा, दुमका, खूंटी और रांची के कोकर में जो खादी का कुचाई सिल्क तैयार होता है, वो तो कमाल का है। ये भागलपुरी तसर सिल्क से भी बेहतर है, क्योंकि भागलपुरी तसर सिल्क ‘डुओपनी’ होता है, जो रफ़ होता है। खादी-कुचाई सिल्क (Khadi-Kuchai Silk) की क्वालिटी इतनी बेहतरीन है कि इसकी विदेशों में ज़बरदस्त मांग है और ख़ास बात ये कि ये पूरी तरह से ऑर्गेनिक है। इसे बनाने में किसी भी तरह के केमिकल या हानिकारक रंगों का इस्तेमाल नहीं होता, इसलिए पर्यावरण के लिए भी यह बेहद मुफीद है।

बड़ी उपलब्धि: जीआई टैग

झारखंड की कुचाई सिल्क, भगैया सिल्क, मुंडा ज्वैलरी और बांस क्राफ्ट को जीआई (GI) टैग मिला है। ये टैग इन उत्पादों की ओरिजनालिटी की गारंटी है। इससे बाज़ार में नकली माल की बिक्री तो रुकेगी ही, साथ ही कारीगरों को उनके हुनर का सही दाम मिल सकेगा।

NABARD के अनुसार, ये उपलब्धि झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक ज्ञान को सम्मानित करती है और युवा पीढ़ी को इन हुनरों से जोड़ने का काम करेगी।

खादी-कुचाई सिल्क (Image-Social Media)

खादी के साथ मुश्किलें

हालांकि, इंटरनेशनल मार्केट में खादी की पॉपुलैरिटी के बावजूद, झारखंड के युवाओं में इसको लेकर ख़ास दीवानगी नहीं है। इसकी कुछ वजहें भी हैं:

  • मेंटेनेंस: खादी को संभाल कर रखना पड़ता है, जिसमें थोड़ी मेहनत लगती है।
  • क़ीमत: यह थोड़ा महंगा है।
  • आर्म (कपड़े की माप) : खादी का आर्म थोड़ा कम होता है, जिससे दूसरे कपड़ों की तुलना में ज़्यादा मीटर की ज़रूरत पड़ती है।
खादी-कुचाई सिल्क (Image-Social Media)

आत्मनिर्भर झारखंड की ओर

इन चुनौतियों के बावजूद, खादी और कुचाई सिल्क झारखंड के लिए बड़ी उम्मीद है। ये इको-फ्रेंडली और कंफर्टेबल है। ये दो तरह से अर्थव्यवस्था को मज़बूत करती है, एक तो एक्सपोर्ट के ज़रिए विदेशी मुद्रा आती है, और दूसरा हैंडमेड होने की वजह से लाखों लोगों को रोज़गार मिलता है।  गोड्डा के भगैया इलाके में अकेले 20,000 से ज़्यादा बुनकर इससे जुड़े हैं।

ये ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ का सच्चा उदाहरण है। जीआई टैग ने इसे ग्लोबल पहचान दी है, और अब ये झारखंड की पहचान बनता जा रहा है।

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