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प्राचीन प्रम्बानन मंदिर: PM मोदी की इंडोनेशिया यात्रा का ऐतिहासिक पहलू

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का क़ाफ़िला इंडोनेशिया पहुंचा, तो ये कोई सियासी मुलाक़ात नहीं थी , ये एक हज़ार साल पुरानी मोहब्बत का ताज़ा होना था। कोई संधि नहीं, कोई करार नहीं, बल्कि पत्थरों पर उकेरी गई रामकथा फिर से ज़िंदा हो रही थी। क्योंकि यहां पर जिस मंदिर की बात हो रही है, वो सिर्फ ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि उस दौर की आत्मा है, जब समंदर भी भारत-इंडोनेशिया के बीच कोई रुकावट नहीं था।

जब इतिहास ख़ुद को पढ़े

सोचिए-
एक मंदिर, जो 1170 साल पुराना है। जिसकी दीवारों पर रामायण की हर कड़ी पत्थर पर लिखी है। जहां एक तरफ़ शिव की गरिमा है, तो दूसरी तरफ़ दुर्गा का पराक्रम। और ये मंदिर न काशी में है, न उज्जैन में बल्कि जावा द्वीप पर, जहां आज दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी बस्ती है वो है प्रम्बानन मंदिर (Prambanan Tample)।

लेकिन इंडोनेशिया ने कभी अपने हिंदू-बौद्ध अतीत को नकारा नहीं। उसने अपने माथे पर उस ताज को सलामत रखा, और आज भारत उसी ताज को चमकाने जा रहा है।

Image-wikipedia

ये सिर्फ़ मरम्मत नहीं, ये रिश्तों की बहाली है

क्योंकि जब ASI की टीम प्रम्बानन मंदिर (Prambanan Tample) के उन बिखरे पत्थरों को जो सदियों से ज़मीन पर पड़े थे, जोड़-तोड़कर फिर से खड़ा करेगी, तो वो सिर्फ एक इमारत नहीं उठा रही होगी।

वो उस सभ्यता को उठा रही होगी, जिसकी जड़ें तमिलनाडु के बंदरगाहों से निकलकर समुद्र पार जावा के राजदरबारों तक पहुंची थीं। वो उन व्यापारियों को सलाम कर रही होगी, जो मसालों के साथ-साथ शिव-विष्णु की कथाएं, संस्कृत के मंत्र और राजा को भगवान मानने की परंपरा ले गए थे।

इतिहास गवाह है: हम कभी अजनबी नहीं थे

क्या आप जानते हैं? जब भारत में राजा-महाराजा अपने राज्य सजा रहे थे, उसी समय जावा में हिंदू संजय वंश के राजा राकै पिकातन ने ये विशाल प्रम्बानन मंदिर बनवाना शुरू किया था। उनके बाद उनके जानशीं राजा लोकपाल ने 856 ईस्वी में मुख्य शिव मंदिर का उद्घाटन किया।

दिलचस्प बात ये है कि ये सिर्फ एक मंदिर नहीं बल्कि ये तिमुर्ति मंदिर है, क्योंकि ये ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों देवताओं को समर्पित है। 47 मीटर ऊंचा शिव मंदिर बीच में है, उसके दाएं-बाएं विष्णु और ब्रह्मा के मंदिर हैं, और चारों तरफ़ करीब 240 छोटे-बड़े मंदिर बिखरे हैं।

और सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि इसकी दीवारों पर पूरी रामायण, हर कड़ी के साथ, पत्थरों पर उकेरी गई है। 

Image-wikipedia

हिंदू धर्म कैसे पहुंचा इंडोनेशिया?

ये वो सवाल है जो हर सोचने वाले के ज़हन में कौंधता है।  क्या भारतीय राजाओं ने आक्रमण करके ये धर्म फैलाया?

बिल्कुल नहीं! करीब 2000 साल पहले, दक्षिण भारत (ख़ासकर आज का तमिलनाडु) के व्यापारी अपने जहाज़ों पर मसाले, कपड़ा, सोना-चांदी और अपनी संस्कृति लेकर इंडोनेशिया पहुंचे।

वहां के राजाओं को ये बात सबसे ज़्यादा भाई, कि भारत में राजा को भगवान का अवतार माना जाता था। इससे उनकी हुकूमत मज़बूत होती थी। फिर उन्होंने भारत से ब्राह्मण बुलवाए, जो उन्हें वेद, पुराण, रामायण-महाभारत और मंदिर निर्माण की कला सिखाते थे। ये फैलाव  सोच से हुआ। 

 जब आफ़त ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया

मगर क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। मंदिर को बने भी 100 साल नहीं हुए थे, कि पास के मेरापी ज्वालामुखी ने भीषण विस्फोट किया और कई भूकंप आए। ठीक वैसे ही, जैसे आज भी इंडोनेशिया में ज्वालामुखी फटने पर उड़ानें रद्द हो जाती हैं। लोग पूर्व की ओर पलायन कर गए। बाली द्वीप पर हिंदू धर्म जीवित रहा, लेकिन जावा के ये खूबसूरत मंदिर सदियों तक खंडहर बने रहे। 13वीं सदी में जब फारस और अरब के व्यापारियों के साथ इस्लाम आया, तो इन मंदिरों को और भी भुला दिया गया।

Image-wikipedia

 जब खंडहरों ने अपनी पहचान वापस पाई

19वीं और 20वीं सदी में खुदाई हुई तो संस्कृत और प्राचीन जावानीस भाषा के शिलालेख मिले। एक पर “शिवगृह” लिखा था और तारीख 856 अंकित थी। यही वो सुराग था, जिसने बताया कि ये एक शिव मंदिर है।

डच सरकार ने ”Anastylosis’ technique से मरम्मत शुरू की। यानी बिखरे पत्थरों को उनकी असली जगह पर फिर से जोड़ा गया। इंडोनेशिया की आज़ादी के बाद भी काम जारी रहा और 1953 में मुख्य शिव मंदिर पूरी तरह बहाल हो गया।

1991 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर घोषित किया। हालांकि 2006 में भूकंप से फिर से नुक़सान हुआ, लेकिन मरम्मत हो चुकी है।

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 आख़िर भारत क्यों कर रहा है ये काम?

ये कोई सामान्य बात नहीं।

भारत सरकार की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ और सांस्कृतिक कूटनीति का ये हिस्सा है। ASI की टीम पहले ही मौका-मुआयना कर चुकी है। फिर से एनास्टाइलोसिस तकनीक से काम होगा — पुराने पत्थरों को जोड़ा जाएगा, नए पत्थर सिर्फ़ ज़रूरत पड़ने पर लगाए जाएंगे। पहले एक-दो छोटे मंदिरों पर पायलट प्रोजेक्ट शुरू होगा, ताकि निर्माण शैली की पूरी समझ बन सके।

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