भारत में कई शहर अपनी अलग पहचान रखते हैं। कोई अपनी इमारतों के लिए मशहूर है, कोई अपने खानपान के लिए और कोई अपने इतिहास के लिए। लेकिन भोपाल एक ऐसा शहर है, जहां इतिहास, तहज़ीब, स्वाद, शायरी और इंसानियत एक साथ सांस लेते नज़र आते हैं। ये सिर्फ़ मध्य प्रदेश की राजधानी नहीं, बल्कि सदियों पुरानी ऐसी विरासत है, जिसे चार बेगमों ने अपने हुनर, दूरअंदेशी और इंसाफ से संवारकर दुनिया के सामने पेश किया।
भोपाल की गलियों में आज भी नवाबी दौर की ख़ुशबू महसूस होती है। यहां की मीठी ज़ुबान, पुराने महल, मस्जिदें, बड़ी झील, मुशायरे और लोगों का अपनापन इस शहर को बाकी शहरों से बिल्कुल अलग बना देता है। यही वजह है कि जो भी एक बार भोपाल आता है, वो सिर्फ़ इसकी ख़ूबसूरती नहीं, बल्कि इसकी रूह को भी महसूस करके लौटता है।
भोपाल की पहचान सिर्फ़ इमारतों से नहीं, उसकी तहज़ीब से है
भोपाल की सबसे बड़ी पहचान उसकी गंगा-जमुनी तहजीब है। यहां अलग-अलग मज़हब, ज़बान और संस्कृति के लोग बरसों से एक साथ रहते आए हैं। यही वजह है कि इस शहर की फिज़ा में मोहब्बत, अदब और इज़्ज़त साफ महसूस होती है। अलीम बज़मी कहते हैं कि भोपाल की उर्दू को ‘गुलाबी उर्दू’ कहा जाता है। ये ऐसी उर्दू है जिसमें नफासत है, मिठास है, लेकिन कोई बनावट नहीं।

इसमें मुश्किल अल्फाज़ कम और अपनापन ज़्यादा मिलता है। यहां लोग बातचीत में भी ऐसा अदब दिखाते हैं कि सामने वाला ख़ुद-ब-ख़ुद उनका कायल हो जाता है। इसी सिलसिले में अलीम बज़मी मुल्ला रमूजी का भी ज़िक्र करते हैं। वो बताते हैं कि भोपाल की ‘गुलाबी उर्दू’ को पहचान दिलाने में मुल्ला रमूजी का बड़ा योगदान था। उन्होंने कठिन उर्दू को आसान, मीठा और आम लोगों के करीब लाने का काम किया।
चार बेगमों ने बदली भोपाल की तकदीर
भारत के इतिहास में बहुत कम ऐसी रियासतें रही हैं, जहां लगातार चार महिलाओं ने शासन किया हो। भोपाल उन चुनिंदा रियासतों में शामिल है। कुदसिया बेगम, सिकंदर जहां बेगम, शाहजहां बेगम और सुल्तान जहां बेगम ने लगभग एक सदी तक भोपाल को नई सोच और नई पहचान दी। इन बेगमों ने सिर्फ़ महल और मस्जिदें ही नहीं बनवाई, बल्कि शिक्षा, महिलाओं सशक्तिकरण, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और शहर की तरक्की पर भी बराबर ध्यान दिया। यही वजह है कि आज भी भोपाल का इतिहास इन चार बेगमों के बिना अधूरा माना जाता है।
कुदसिया बेगम: जिन्होंने विकास की नींव रखी
कुदसिया बेगम भोपाल की पहली महिला शासक थी। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती रियासत को संभालने की थी, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने गौहर महल का निर्माण कराया, महिलाओं की सुरक्षा पर ख़ास ध्यान दिया और लोगों की शिकायतें सुनने के लिए जन सुनवाई की शुरुआत की। उन्होंने फतेहगढ़ किले को मज़बूत कराया ताकि रियासत हर खतरे से महफूज़ रह सके। उस दौर में साधन कम थे, लेकिन उनकी सोच बड़ी थी। यही वजह है कि उन्हें भोपाल के विकास की बुनियाद रखने वाली शासिका माना जाता है।

सिकंदर जहां बेगम: जिन्होंने साबित किया कि औरत किसी से कम नहीं
सिकंदर जहां बेगम अपने दौर की सबसे बहादुर और दूरअंदेश शासकों में गिनी जाती हैं। उन्होंने पूरे भोपाल रियासत का नक्शा तैयार कराया और उसकी सीमाएं तय कराई। उनके समय में पहली बार नागरिक पुलिस की शुरुआत हुई। इससे पहले सेना ही लोगों की सुरक्षा करती थी। सिकंदर जहां बेगम घुड़सवारी करती थी, तलवार और बंदूक चलाना जानती थी। कहा जाता है कि वो अकेले कई लोगों का मुकाबला कर सकती थी। उन्होंने उस सोच को बदलने की कोशिश की, जिसमें माना जाता था कि औरत सिर्फ़ घर तक सीमित है। उन्होंने महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने की कोशिश की और ये संदेश दिया कि अगर मौक़ा मिले, तो औरत हर ज़िम्मेदारी निभा सकती है।
शाहजहां बेगम: जिन्होंने शिक्षा और शहर दोनों को नई दिशा दी
अगर भोपाल को आधुनिक सोच की तरफ ले जाने का श्रेय किसी एक शासक को दिया जाए, तो उनमें शाहजहां बेगम का नाम सबसे ऊपर आता है। उन्होंने भोपाल में रेल लाई, एलोपैथिक इलाज की शुरुआत कराई और महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए सिलाई, कढ़ाई, ज़री और ज़रदोज़ी जैसे हुनर सिखाने वाले स्कूल खुलवाए। सबसे ख़ास बात ये थी कि उन्होंने शिक्षा में कभी मज़हब के आधार पर फर्क नहीं किया। मुस्लिम लड़कियों के साथ-साथ हिंदू लड़कियों के लिए भी अलग स्कूल खुलवाया और उन्हें अपनी परंपराओं के मुताबिक पढ़ने की आजादी दी। उनके दौर में ताजमहल पैलेस, ताजुल मसाजिद और कई खूबसूरत इमारतें बनी, जो आज भी भोपाल की शान हैं।

सुल्तान जहां बेगम: जिनकी सोच अपने दौर से बहुत आगे थी
सुल्तान जहां बेगम ने महिलाओं की शिक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य पर सबसे ज़्यादा काम किया। उन्होंने नर्सिंग स्कूल शुरू कराया और गांव-गांव जाकर दाइयों को ट्रेनिंग देने की व्यवस्था बनाई। जब शुरुआत में कोई महिला नहीं आई, तो उन्होंने वजीफा देना शुरू किया, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा महिलाएं आगे आएं। उनके दौर में फिंगरप्रिंट जांच की शुरुआत हुई, पुलिस व्यवस्था मज़बूत हुई और छात्राओं के लिए स्कूल बसों का इंतज़ाम किया गया। उन्होंने सांची स्तूप के संरक्षण के लिए भी आर्थिक मदद दी और आगे चलकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की पहली महिला चांसलर बनी। ये उस दौर के हिसाब से बेहद बड़ी बात थी।
भोपाल का स्वाद, जो सिर्फ़ पेट नहीं, दिल भी भर देता है
अगर भोपाल की बात हो और खाने का ज़िक्र न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। यहां पोहा और जलेबी तो मशहूर है ही लेकिन यहां की यखनी वाली बिरयानी अपनी खुशबू और स्वाद के लिए मशहूर है। इसके साथ शीरमाल, शामी कबाब, सुलेमानी चाय, रवे का हलवा, रसावल और पुराने दौर का टुकड़े, सूखड जैसे व्यंजन आज भी भोपाल की पहचान बने हुए हैं। ख़ास बात ये है कि इन व्यंजनों में सिर्फ़ स्वाद नहीं, बल्कि इतिहास भी छिपा हुआ है। कई रेसिपियां बेगमों के दौर से चली आ रही हैं और आज भी पुराने भोपाली परिवार उन्हें उसी अंदाज़ में बनाते हैं।
मुशायरे और कव्वाली, भोपाल की रूह हैं
भोपाल का नाम आते ही सिर्फ़ महलों की तस्वीर नहीं बनती, बल्कि मुशायरों की महफिल भी आंखों के सामने आ जाती है। करीब 300 साल पुरानी मुशायरों की परंपरा आज भी यहां जिंदा है। बैतबाज़ी, चारबैत और सूफ़ियाना कव्वाली ने इस शहर की पहचान को और मज़बूत किया। भोपाल की मशहूर कव्वाल शकीला बानो भोपाली ने इस कला को दुनिया भर में पहचान दिलाई। वहीं बशीर बद्र, राहत इंदौरी और कई बड़े शायरों ने भी भोपाल की अदबी दुनिया को नई बुलंदियां दी।

नए साल की शुरुआत कैसे हुई? भोपाल की एक अनसुनी कहानी
आज भोपाल में नए साल का जश्न बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भोपाल में नए साल का जश्न मनाने की परंपरा आज की नहीं, बल्कि नवाबी दौर की देन है। सीनियर पत्रकार और लेखक अलीम बज़मी बताते हैं कि इस परंपरा की शुरुआत भोपाल के आख़िरी नवाब हमीदुल्लाह ख़ान के शासनकाल में हुई थी। ये वो समय था, जब भोपाल रियासत और ब्रिटिश हुकूमत के बीच अच्छे रिश्ते थे।
अलीम बज़मी के मुताबिक, उस दौर में सीहोर, भोपाल रियासत का सैन्य मुख्यालय हुआ करता था। वहीं ब्रिटिश अधिकारियों का पहला चर्च भी बनाया गया था। अंग्रेज़ अफ़सर वहीं रहते थे और नवाब हमीदुल्लाह ख़ान हर साल नए साल के मौक़े पर उन्हें मुबारकबाद भेजते थे।
नवाब ख़ास तौर पर कोलकाता में छपे ग्रीटिंग कार्ड मंगवाते थे। इनके साथ मुंबई और कोलकाता से चॉकलेट्स भी मंगाई जाती थी। फ़िर ये ग्रीटिंग कार्ड और चॉकलेट अंग्रेज़ अधिकारियों को तोहफ़े के तौर पर भेजे जाते थे।
बज़मी बताते हैं कि सिर्फ़ अंग्रेज़ अफ़सर ही नहीं, बल्कि उस दौर के दूसरे बड़े राजा-महाराजा और रियासतों के शासक, जो प्रिंसेज़ ऑफ चैंबर के सदस्य थे, उन्हें भी नए साल पर यही तोहफे भेजे जाते थे। इस तरह नए साल की बधाई देना भोपाल की एक ख़ास नवाबी परंपरा बन गई।
उन्होंने यह भी बताया कि उस दौर में नए साल के खास आयोजन यॉट क्लब, लाल कोठी (जिसे आज लोक भवन के नाम से जाना जाता है) और सीहोर के चर्च में हुआ करते थे। शाम को यॉट क्लब में महफिल सजती थी, जबकि दिन में लाल कोठी में मेहमानों का इस्तकबाल किया जाता था।
जब भोपाल के नवाबों के पास थे पांच हवाई जहाज़
अलीम बज़मी बताते हैं कि अगर कोई ये सुने कि एक छोटी-सी रियासत के नवाबों के पास पांच हवाई जहाज़ थे, तो शायद यकीन करना मुश्किल हो। लेकिन ये सच है। उनके मुताबिक, भोपाल रियासत क्षेत्रफल और आमदनी के लिहाज से भले ही दूसरी बड़ी रियासतों जितनी विशाल नहीं थी, लेकिन उसकी पहचान और असर बहुत बड़ा था।
भोपाल के आखिरी नवाब हमीदुल्लाह ख़ान बेहद पढ़े-लिखे शासक थे। वो ग्रेजुएट थे और दो बार प्रिंसेज़ ऑफ चैंबर के चेयरमैन भी चुने गए थे। बज़मी बताते हैं कि नवाब के पास पांच हवाई जहाज़ थे। यही नहीं, भोपाल एयरपोर्ट का विकास भी उनके दौर में हुआ। इसके अलावा चिकलोद में, जहां नवाब का फार्म हाउस था, वहां भी एक हवाई पट्टी बनाई गई थी। कई बार नवाब भोपाल से सीधे हवाई जहाज़ से अपने फार्म हाउस पहुंच जाते थे। उस दौर में ये किसी अजूबे से कम नहीं था।

गांधी, इकबाल, गालिब भोपाल से जुड़ी हैं कई ऐतिहासिक शख्सियतें
अलीम बजमी कहते हैं कि भोपाल सिर्फ़ बेगमों और नवाबों का शहर नहीं रहा, बल्कि ये देश की कई बड़ी शख्सियतों से भी गहराई से जुड़ा रहा है। वो बताते हैं कि महात्मा गांधी नवाब हमीदुल्लाह खान के निमंत्रण पर भोपाल आए थे और करीब एक सप्ताह तक यहां ठहरे थे। वहीं, नवाब भी लंदन में गांधी जी के साथ भारत के हितों की पैरवी करने पहुंचे थे।
इसी तरह अल्लामा इकबाल भी करीब 1930 से 1932 के बीच भोपाल आए। अलीम बज़मी बताते हैं कि इकबाल ने भोपाल में रहते हुए कई नज़्में लिखीं और नवाब ने उनके लिए वजीफा भी तय किया था। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उस दौर में भोपाल सिर्फ़ राजनीतिक नहीं, बल्कि अदबी और इल्मी दुनिया का भी अहम केंद्र था।
बज़मी एक और दिलचस्प बात बताते हैं। उनके मुताबिक, मिर्ज़ा गालिब के 13 प्रमुख शागिर्दों में से करीब सात का संबंध भोपाल से था। इतना ही नहीं, अगर कोई अपनी गज़ल लेकर गालिब के पास इस्लाह कराने जाता, तो वो अक्सर कहते थे “भोपाल जाइए।” ये बात बताती है कि उस दौर में भोपाल की उर्दू, शायरी और अदबी माहौल की कितनी बड़ी पहचान थी।
बज़मी एक और अहम नाम का ज़िक्र करते हैं “बरकतुल्ला भोपाली”। उनके मुताबिक, बरकतुल्ला भोपाली विदेश में बनी भारत की अंतरिम सरकार के पहले प्रधानमंत्री थे। उन्होंने राजा महेंद्र प्रताप सिंह के साथ मिलकर विदेश में रहते हुए भारत की आजादी के लिए काम किया। ये भी भोपाल के गौरवशाली इतिहास का एक अहम हिस्सा है।
जब इमारतें सिर्फ़ दीवारें नहीं, बल्कि इंजीनियरिंग का करिश्मा थी
अलीम बजमी का मानना है कि भोपाल की ऐतिहासिक इमारतें सिर्फ पत्थर और चूने से बनी इमारतें नहीं हैं, बल्कि वो उस दौर की अक्ल, हुनर और दूरअंदेशी की जीती-जागती मिसाल हैं। उनके मुताबिक, गौहर महल, ताजमहल पैलेस, शौकत महल, इस्लामनगर के महल और दूसरी विरासती इमारतें आज भी ये बताती हैं कि सदियों पहले बिना किसी आधुनिक मशीन या तकनीक के ऐसी शानदार इमारतें कैसे खड़ी की गई।
इन महलों का नक्शा इस तरह तैयार किया जाता था कि हर कमरे में हवा और रोशनी आसानी से पहुंच सके और गर्मियों में भी अंदर ठंडक बनी रहे। महिलाओं की निजता और सुरक्षा का भी ख़ास ख्याल रखा जाता था। महलों के भीतर गहनों को सुरक्षित रखने के लिए अलग जगह और मजबूत इंतजाम किए जाते थे। अलीम बजमी तीन सीढ़ी तालाब का जिक्र करते हुए कहते हैं कि ये सिर्फ़ पानी का तालाब नहीं, बल्कि उस दौर की बेहतरीन वॉटर इंजीनियरिंग का नमूना है, जो बताता है कि तब पानी को जमा करने और उसका सही इस्तेमाल करने की कितनी गहरी समझ थी।
वहीं ताजमहल पैलेस के ‘सावन-भादों’ हिस्से में ऐसा अनोखा इंतज़ाम था कि बिना बारिश के भी महल के अंदर बैठे लोग बरसात का एहसास कर सकें। गर्मियों में पानी की बूंदें तय मात्रा में गिरती थी और मौसम को खुशनुमा बना देती थी। बज़मी कुदसिया बेगम के कमरे का भी जिक्र करते हैं, जहां छत पर ख़ास तरह का कांच लगाया गया था। उस दौर में बिजली नहीं थी, लेकिन जैसे ही एक छोटा-सा दीया जलाया जाता, उसकी रोशनी पूरे कमरे में फैल जाती थी।
ऐतिहासिक इमारतें सिर्फ़ पत्थर नहीं, हमारी पहचान हैं
अलीम बज़मी कहते हैं कि आज भोपाल तेजी से बदल रहा है। मेट्रो बन रही है, नए मॉल खुल रहे हैं और शहर मॉर्डन हो रहा है। लेकिन इसके साथ-साथ ये भी ज़रूरी है कि पुराने महल, मस्जिदें, किले और ऐतिहासिक इमारतें भी महफूज़ रहें। अगर इन्हें नहीं बचाया गया, तो आने वाली नस्लें सिर्फ किताबों में ही भोपाल की असली पहचान पढ़ पाएंगी। जब कोई भोपाल की गलियों में चलता है, बड़ी झील के किनारे शाम बिताता है, किसी पुराने मुशायरे में शिरकत करता है या किसी बुजुर्ग भोपाली से दो बातें करता है।
तब उसे एहसास होता है कि यह शहर सिर्फ नक्शे पर बनी एक जगह नहीं, बल्कि एक जिंदा तहजीब है। शायद यही वजह है कि भोपाल को देखने वाले लोग उसकी खूबसूरती ज़रूर याद रखते हैं, लेकिन उसे महसूस करने वाले उसकी तहजीब, उसकी जुबान और उसके लोगों को कभी नहीं भूलते। यही भोपाल की असली पहचान है और यही उसकी सबसे बड़ी विरासत भी।
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