उर्दू अदब में कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने लोगों को सिर्फ़ हंसाया नहीं, बल्कि हंसी के पर्दे में समाज की सच्चाइयां भी दिखाईं। ऐसे ही फ़नकार थे दिलावर फ़िगार। उन्हें उर्दू दुनिया में “शहंशाह-ए-ज़राफ़त” और “अकबर-ए-सानी” के ख़िताब से नवाज़ा गया। उनकी शायरी में लतीफ़ा भी था, तंज़ भी था, और ज़िंदगी का गहरा फलसफ़ा भी।
बदायूं से शुरू हुआ सफ़र
दिलावर फ़िगार का असली नाम दिलावर हुसैन था। उनकी पैदाइश 8 जुलाई 1929 को उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक शहर बदायूं में हुयी। बचपन से ही उन्हें पढ़ने-लिखने का शौक़ था। शुरुआती तालीम अपने शहर में हासिल करने के बाद उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में एम.ए. किया। यही नहीं, उन्होंने अंग्रेज़ी और अर्थशास्त्र में भी स्नातकोत्तर डिग्रियां हासिल कीं।
उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने अध्यापन को अपना पेशा बनाया। लेकिन उनके भीतर का शायर लगातार लफ़्ज़ों के ज़रिए दुनिया को देखने और दिखाने में लगा रहा।
14 साल की उम्र में शुरू हुई शायरी
दिलावर फ़िगार ने महज़ 14 साल की उम्र में शायरी लिखना शुरू कर दिया था। उस दौर के मशहूर उस्तादों मौलवी जाम नवाए बदायूनी और मौलाना जामी बदायूनी की सोहबत ने उनकी अदबी समझ को और निखारा।
धीरे-धीरे उन्होंने अपनी अलग पहचान बना ली। उन्होंने यह साबित कर दिया कि हास्य कविता सिर्फ़ मनोरंजन नहीं होती, बल्कि समाज का आईना भी हो सकती है।
पाकिस्तान का सफ़र
साल 1968 में वे भारत से पाकिस्तान चले गए और कराची में बस गए। वहां उन्होंने अब्दुल्ला हारून कॉलेज में उर्दू साहित्य पढ़ाया। उस समय कॉलेज के प्रधानाचार्य मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ थे। यह अपने आप में उर्दू अदब के दो बड़े नामों का एक ख़ूबसूरत संगम था।
बाद में उन्होंने कराची डेवलपमेंट अथॉरिटी (KDA) में सहायक निदेशक (टाउन प्लानिंग) के पद पर भी काम किया। नौकरी के साथ-साथ उनकी शायरी का सफ़र भी बराबर जारी रहा।
तंज़ का ऐसा अंदाज़, जो दिल तक पहुंच जाए
दिलावर फ़िगार की सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि वे किसी पर सीधा हमला नहीं करते थे। उनकी शायरी मुस्कुराते हुए सोचने पर मजबूर कर देती थी।
औरत को चाहिए कि अदालत का रुख़ करे,
जब आदमी को सिर्फ़ ख़ुदा का ख़याल हो।
यह शेर घरेलू ज़िम्मेदारियों और सामाजिक सोच पर बड़ा नर्म लेकिन गहरा तंज़ है।
जूते के इंतिख़ाब को मस्जिद में जब गए,
वो जूतियां पड़ीं कि ख़ुदा याद आ गया।
इस शेर में इंसानी लापरवाही और हमारी सामाजिक आदतों पर बेहद दिलचस्प अंदाज़ में तंज़ किया गया है।
उनका एक और शेर साहित्यिक दुनिया पर हल्की-सी चुटकी लेता है।
वहां जो लोग अनाड़ी हैं वक़्त काटते हैं,
यहां भी कुछ मुतशाइर दिमाग़ चाटते हैं।
दिलावर फ़िगार ने ग़ज़लों, हास्य कविता और पैरोडी की दुनिया को कई यादगार किताबें दीं। उनकी प्रमुख रचनाओं में शामिल हैं—
- हदीसे (ग़ज़लों का संग्रह)
- सितम ज़रीफ़ी
- शामत-ए-आमाल
- असर-ए-नौ
- उंगलियां फ़िगार अपनी
- मतला अर्ज़ है
- ख़ुदा झूठ न बुलवाए
इन किताबों में समाज, राजनीति, इंसानी फ़ितरत और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर ऐसा तंज़ मिलता है जो आज भी उतना ही ताज़ा महसूस होता है।
अपनी मौत का किस्सा ख़ुद सुनाया
दिलावर फ़िगार की ज़िंदगी का एक दिलचस्प वाक़िया आज भी अदबी महफ़िलों में सुनाया जाता है।
31 जनवरी 1993 को कराची आर्ट्स काउंसिल की एक महफ़िल में उन्होंने मज़ाक़िया अंदाज़ में अपनी काल्पनिक मौत का पूरा क़िस्सा सुनाया। उन्होंने कहा कि जब वे जन्नत पहुंचे तो फ़रिश्तों ने कहा कि अभी आपकी बारी नहीं आई है, 5 साल बाद आइए, और उन्हें वापस दुनिया में भेज दिया गया।
उस वक़्त महफ़िल ठहाकों से गूंज उठी। लेकिन हैरत की बात यह रही कि लगभग पांच साल बाद, 25 जनवरी 1998 को उनका इंतिक़ाल हो गया। लोगों ने बाद में इस वाक़िए को उनकी ज़िंदगी का सबसे अनोखा और यादगार किस्सा माना।
उर्दू अदब का मुस्कुराता हुआ चेहरा
दिलावर फ़िगार ने यह साबित किया कि शायरी सिर्फ़ इश्क़ और ग़म की बात नहीं करती। वह समाज की कमियों पर भी मुस्कुराते हुए रोशनी डाल सकती है।
उन्होंने तंज़ को तल्ख़ नहीं होने दिया और हास्य को हल्का नहीं होने दिया। यही वजह है कि उनकी शायरी पढ़ते हुए होंठों पर मुस्कान आती है और दिमाग़ सोचने पर मजबूर हो जाता है।
आज भी जब उर्दू हास्य और व्यंग्य का ज़िक्र होता है, तो दिलावर फ़िगार का नाम सबसे आगे लिया जाता है। उन्होंने अपने क़लम से यह साबित किया कि एक सच्चा शायर लोगों को हंसाते-हंसाते समाज का आईना भी दिखा सकता है।
दिलावर फ़िगार भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी ज़राफ़त, उनका तंज़ और उनके लफ़्ज़ आज भी उर्दू अदब की महफ़िलों में उसी ताज़गी के साथ गूंजते हैं।
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