आज पूरे देश में पासपोर्ट को लेकर जंग छिड़ी हुई है। हर चैनल, हर अख़बार, हर चाय की दुकान पर यही बात हो रही है कि “पासपोर्ट किसका? पासपोर्ट क्यों? पासपोर्ट कैसे?” लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये बहस 4000 साल पुरानी है? जी हां! आज जिस कागज़ की किताब के लिए पूरा देश गरमाया हुआ है, उसकी जड़ें हमारी सिंधु घाटी सभ्यता में (Indus Valley ‘Passport Seals’) छिपी हैं।
इमेजिन-कोई पासपोर्ट नहीं, कोई वीज़ा नहीं, कोई पेपर नहीं… फिर भी लोग सफर करते थे।
सोचिए – आज अगर आपको विदेश जाना है तो पासपोर्ट, वीज़ा, टिकट, इमिग्रेशन… कितनी रस्में!
लेकिन 4000 साल पहले सिंधु-सरस्वती सभ्यता के लोग बिना कागज़ के सुमेर (इराक) और मिस्र तक जाते थे, व्यापार करते थे, और अपनी पहचान साबित करते थे
कन्मेर से मिली चौंकाने वाली खोज
गुजरात के कन्मेर (धोलावीरा के पास) में एक जापानी टीम ने तीन असामान्य गोल मिट्टी के पेंडेंट खोजे। हर पेंडेंट के बीच में छेद है और उस पर गैंडे जैसे जानवर (यूनिकॉर्न) की छाप है। सबसे खास बात – तीनों पेंडेंट पर एक जैसी मुहर लगी है, लेकिन पीछे की तरफ अलग-अलग सिंधु लिपि के चिह्न हैं।
प्रोफेसर टोशिकी ओसाडा का सुझाव है कि “ये शायद अलग-अलग क्षेत्रों के बीच यात्रा करने वालों के लिए पासपोर्ट का काम करते थे।”

मुहरें सिर्फ मुहरें नहीं थीं
ब्रिटिश पुरातत्वविद् अर्नेस्ट मैके (British archaeologist Ernest Mackay) ने लिखा कि सिंधु घाटी (Indus Valley) के ज़्यादातर निवासी किसी न किसी तरह के ताबीज़ पहनते थे। उनके अनुसार,’इस प्रकार की वस्तुएं सभी के पास होती थीं, जिसके लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन ज़रूरी था।’
सोचिए-अगर किसी चीज़ का बड़े पैमाने पर उत्पादन हो रहा है, तो वो शायद पहचान या अधिकार दिखाने के काम आती होगी।ये मुहरें सिर्फ़ सजावटी वस्तु या व्यापारिक टोकन नहीं थीं,ये शायद पहचान,पहुंच और आवाजाही के प्रतीक थे।
क्या पासपोर्ट की ज़रूरत इतनी पुरानी है?
हड़प्पा सभ्यता विशाल क्षेत्र में फैली थी और उसका व्यापार सुमेर (Mesopotamia) और नील क्षेत्र की सभ्यताओं तक था।ऐसे विशाल व्यापारिक नेटवर्क में लोगों की पहचान और अनुमति की व्यवस्था होना स्वाभाविक था। मोहनजोदड़ो से भी ऐसी ही वस्तुएं मिली हैं। एक तरफ धातु की मुहर और दूसरी तरफ सिंधु मुहर के निशान वाले ‘पासपोर्ट’।
एक दिलचस्प किस्सा
1845 में ऑस्ट्रियाई यात्री बैरन चार्ल्स वॉन हुगेल (Austrian traveler Baron Charles von Hügel in 1845) ने बॉम्बे (अब मुंबई) के दक्षिण में विजादुर्ग बंदरगाह का दौरा किया। वहां के स्थानीय प्रमुख लिखने-पढ़ने में असमर्थ थे। वे अपने साथियों को मुलायम मिट्टी का टुकड़ा देते थे,जिस पर वे लकड़ी की मुहर लगाते थे।द्वारपालों को यही मिट्टी दिखाकर वे गुज़रने की अनुमति पाते थे।

युगों-युगों से चली आ रही ज़रूरत
मुगल काल में बाहर से आने वालों को ‘सनद’ जारी की जाती थी। मौर्य काल में ‘मुद्राध्यक्ष’ यात्रा (Chairman of the Currency’ Tour), प्रवासन और प्रवेश पर नज़र रखते थे।
हड़प्पा की मुहर, मौर्य यात्रा व्यवस्था, फ़ारसी सुरक्षा-पत्र, मुगल सनद, और पश्चिमी भारत के बंदरगाह पर मिट्टी की मुहर-ये सब एक ही व्यवस्था के हिस्से नहीं हैं, लेकिन इनकी कहानी एक है:
आप कौन हैं, आप कहां के हैं, और क्या आपको आगे बढ़ने की अनुमति है,ये साबित करने की ज़रूरत बहुत पुरानी है।
आधुनिक पासपोर्ट शायद हाल का आविष्कार है, लेकिन अपनी पहचान साबित करने की ज़रूरत 4000 साल पुरानी है।
सिंधु घाटी सभ्यता की ये मुहरें हमें बताती हैं कि मानव सभ्यता ने हमेशा पहचान और आवाजाही के लिए कोई न कोई व्यवस्था बनाई। कागज़ के पासपोर्ट से पहले मिट्टी के पेंडेंट थे, और उससे पहले भी कुछ था। पहचान की ज़रूरत बदलती रही, लेकिन कभी खत्म नहीं हुई।
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